जीवन साथी
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माँ के रुग्णावस्था से,
दुःखी तो शायद सभी है घर में,
मगर एक शख़्स ऐसे है जिनकी,
जिंदगी ठहर गई है माँ के बिस्तर के आस-पास,
हाँ, मैं बाबा की बात कर रहा हूँ,
बाबा ने कभी सिखा ही नहीं माँ के बिना जीना,
हर छोटे-बड़े काम के लिए,
माँ के साथ वाकयुद्ध के लिए अभ्यस्त बाबा,
सुन्न बैठे रहते है शायद इस इन्तजार में,
की कब माँ आकर बड़बड़ाएगी,
तो वे उठ कर खड़े होंगे,
बाहर दालान में सोते हुए रात में कई बार,
माँ के कमरे के खिड़की पर जाकर आवाज़ लगते है,
माँ अंदर से आवाज़ दे देती है तो,
"जिंदा है" ये अश्वस्थ होकर फिर सो जाते है,
आँगन में खुलने वाले गेट को,
बंद करने की कई बार हिदायद देने वाले बाबा,
इधर कुछ दिनों से इसे खुला छोड़ देने को कह रखे है,
जब खिड़की से आवाज़ देने पर जबाब नहीं देती माँ,
तो अंदर जाकर माँ के नाक के नीचे अपनी अँगुली रखते है,
फिर धड़कनों को सुनते है,
हाथों को अपने हाथों में लेकर बैठे रहते है काफी देर तक,
क्या अब घर में चोर के घुस आने का,
या घर के लूट जाने का कोई परवाह नहीं होता होगा उन्हें?
जिसकी पुरी दुनिया ही लूटी जा रही हो उनके आँखों के सामने,
उन्हें नींद आती भी होगी? संदेह है मुझे,
बेअसर होती दवाईयों के पुर्जे को उलटते-पुलटते,
अपने आप से ही कुछ कहते है,
दिन भर में कई लोगों से फोन पर,
माँ के मर्ज और दवाईयों के चर्चे करते,
बड़े ही कातर स्वर में कहते है,
"एक बार डॉक्टर से कह के देखो ना,
कोई फायदा नहीं हो रहा है उनके दवाईयों का,
बाबा अब गुस्सा नहीं होते,
जैसे माँ अपने साथ उनके गुस्से को लिए जा रही है,
बाबा अच्छी तरह जानते है की माँ को बचाया नहीं जा सकता,
पर फिर भी उनकी कोशिशों में कोई कमी नहीं कहीं,
माँ तो एक दिन मौत के नींद सोयेगी,
पर उसके साथ रोज हजार मौत मरते बाबा को देख कर लगता है,
इसे ही जीवन साथी कहते है शायद। @ मनोरंजन
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माँ के रुग्णावस्था से,
दुःखी तो शायद सभी है घर में,
मगर एक शख़्स ऐसे है जिनकी,
जिंदगी ठहर गई है माँ के बिस्तर के आस-पास,
हाँ, मैं बाबा की बात कर रहा हूँ,
बाबा ने कभी सिखा ही नहीं माँ के बिना जीना,
हर छोटे-बड़े काम के लिए,
माँ के साथ वाकयुद्ध के लिए अभ्यस्त बाबा,
सुन्न बैठे रहते है शायद इस इन्तजार में,
की कब माँ आकर बड़बड़ाएगी,
तो वे उठ कर खड़े होंगे,
बाहर दालान में सोते हुए रात में कई बार,
माँ के कमरे के खिड़की पर जाकर आवाज़ लगते है,
माँ अंदर से आवाज़ दे देती है तो,
"जिंदा है" ये अश्वस्थ होकर फिर सो जाते है,
आँगन में खुलने वाले गेट को,
बंद करने की कई बार हिदायद देने वाले बाबा,
इधर कुछ दिनों से इसे खुला छोड़ देने को कह रखे है,
जब खिड़की से आवाज़ देने पर जबाब नहीं देती माँ,
तो अंदर जाकर माँ के नाक के नीचे अपनी अँगुली रखते है,
फिर धड़कनों को सुनते है,
हाथों को अपने हाथों में लेकर बैठे रहते है काफी देर तक,
क्या अब घर में चोर के घुस आने का,
या घर के लूट जाने का कोई परवाह नहीं होता होगा उन्हें?
जिसकी पुरी दुनिया ही लूटी जा रही हो उनके आँखों के सामने,
उन्हें नींद आती भी होगी? संदेह है मुझे,
बेअसर होती दवाईयों के पुर्जे को उलटते-पुलटते,
अपने आप से ही कुछ कहते है,
दिन भर में कई लोगों से फोन पर,
माँ के मर्ज और दवाईयों के चर्चे करते,
बड़े ही कातर स्वर में कहते है,
"एक बार डॉक्टर से कह के देखो ना,
कोई फायदा नहीं हो रहा है उनके दवाईयों का,
बाबा अब गुस्सा नहीं होते,
जैसे माँ अपने साथ उनके गुस्से को लिए जा रही है,
बाबा अच्छी तरह जानते है की माँ को बचाया नहीं जा सकता,
पर फिर भी उनकी कोशिशों में कोई कमी नहीं कहीं,
माँ तो एक दिन मौत के नींद सोयेगी,
पर उसके साथ रोज हजार मौत मरते बाबा को देख कर लगता है,
इसे ही जीवन साथी कहते है शायद। @ मनोरंजन
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