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Monday, April 28, 2014

जीवन रोशनी
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लौट जाती है, होठों तक आकर वो हर मुस्कुराहट,
जो तुम्हारे नाम होती है,
जो कभी तुम्हारी याद आते ही कई इंच चौडी हो जया करती थी,
उन्मुक्त हँसी, बेपरवाह और बेबाक बातें,
करना तो शायद मैं अब, भूल ही चुका हूँ,
बार-बार जाता हूँ, उस घास में मैदान में,
और ढुन्ढता हूँ, अपने जीवन की वो तमाम स्वच्छंदता,
जो तुमसे मिलते ही पुरे महौल में फै़ल जाया करती थी,
मेरी आँखें चमकने लगती थी रोशनी से,
और ज़ुबां पर ना जाने कहाँ से आ जाते थे,
वो तमाम किस्से,मेरे जीवन के,
जो तुम्हे बताने को आतुर रहता था मैं अक्सर,
हर अंग में स्फूर्ति जग जाती थी,
जैसे पंख मिल गये हो,
मुझे अनंत आसमान में उड़ने के लिये......
अब नहीं होता कुछ भी ऐसा,
जैसे जंग लग गये हो, मेरे हर अंग में,
ज़ुबां पर कुछ आते ही ठहर जाता हूँ,
तुम अक्सर कहा करती थी ना की,
बोलने से पहले सोचा करो,
सिर्फ यही एक इच्छा पूरी की है मैने, तुम्हारी,
अब जबकि तुम साथ नहीं हो,
आँखों की चमक और रोशनी गुम होने लगी है,
अनजाने डर व आशंकाओं की परछाइयों में उलझ कर,
अब उड़ने को पंख नहीं, पैरों से चलता हूँ,
अपने ही अस्तित्वा का भार उठाये,
मेरे कंधे झुक जाते है,
जैसे सहन नहीं कर पा रहे है, जीवन का भार,
आँखें हर व़क्त,जमीं में गड़ी रहती है,
जैसे ढून्ढ रही हो, कोई निसां,
जो उन राहों पर चलते हुए,हमने कभी छोड़ा था,
अब धूप में, चेहरे की रंगत उड़ जाने का डर नहीं होता,
और छाया भी दे नहीं पाती ठंडक तन को,
कानों में कभी तुम्हारी अवाज़ गूँज जाती है,
जैसे पुकार रही हो तुम, मुझे पीछे से,
ठहर जाता हूँ कुछ पल के लिये,
देखता हूँ, मुड कर पीछे, मगर वहाँ कोई नहीं होता,
दूर, बहुत दूर जहाँ मेरी आँखों की रोशनी
बमुश्किल पहुँच पाती है,
एक अस्पष्ट सी छाया नज़र आती है,
देखती है मुझे और ठठाकर हँसती है,
जैसे व्यंग कर रही हो मुझ पर,
फिर अचानक रुक जाती है,
पोछती है अपने आँचल से वे आँसू के बूँदे,
जो उसके गालों पर लुडक आते है,
फिर गुम हो जाती है वो छाया भी,
जैसे गुम हो गयी थी तुम कभी.............. मनोरंजन






Friday, April 18, 2014

एक लब्ज़ विदा लिखन
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रूमानियत हो, तख़्ती भी,
जो दिल में जगा दे भक्ति भी,
जीने की कला सिखलाए जो,
चेहरा बन कर मुस्कुराये जो,
ऐसी कोई शब्द मुझे लिख दो,
जिसमें हो पीड़ा की अभिव्यक्ति भी,
एक लब्ज़ विदा लिखना,
दुखदायी है, नाम तेरा, ख़ुद से ही जुदा लिखना,
कोई चाह नहीं मुझको तुमसे,
कोई दाह नहीं मुझको तुमसे,
मन खिन्‍न हो जाता है सबसे,
तब चीख उठती है दिल से,
कहना चाहता हूँ, कुछ तुमसे,
एक गीत भेजो, मेरी खातीर,
जिस गीत के बोल में तुम हो बसी,
जिसमें हो तुमसे विरक्ति भी,
एक लब्ज़ विदा लिखना,
दुखदायी है नाम तेरा,
ख़ुद से ही ज़ुदा लिखना............मनोरंजन
         


Thursday, April 17, 2014

रंगे सियार
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फिर एक बार चुनाव का मौसम गया है,
सारे सियार अलग-अलग रंग में रंग चुके है
जनकल्याण, न्यायपुर्ण शासन, व्यवस्था परिवर्तन,
सुशासन और प्रजा के लिए मार-मिटने की क़समें खाई जाने लगी है,
सभा, गोश्ठि, मान-मनौवत का दौड़ जरी है,
दिन-रात एक कर मासूम भेड़ों को अपनी तरफ़ करने की कशमकश जारी है
कमाल की बात है की,
पिछले 65 साल से सबक ना लेते हुए,
भेड़ें भी फिर एक बार नए उत्साह, उमंग और उम्मीद से,
प्रजातंत्र के इस महा-पर्व का बड़े बेसब्रि से इंतज़ार कर रहे है...
भेड़ों को उम्मीद है की,भेड़ों को इस बार न्यायपुर्ण शासन मिलेगा,
इस बार जरुर व्यवस्था परिवर्तन होगा,
भेड़ें अब भय-मुक्त, न्यायपुर्ण समाज में अपना जीवन जी सकेंगे,
मादा भेड़ अब भय- मुक्त होकर जंगल में कही भी, कभी भी - जा सकेंगी,
उन्हें कोई भेडिया अपना शिकार नही बनायेगा,
हर तरफ़ रामराज्य होगा, हर तरफ़ शान्ति, उन्नति और खुश्हाली होगी.............
पर क्या सच में भेड़ों की ये उम्मीद पूरा होगा?
पर क्या सच में भेड़ों का सपना पूरा होगा?
या दो-तीन महीने बाद आने वाले बरसात में,
सियारो के चेहरे का रंग बारिश के पानी में धुल कर असली चेहरा सामने जयेगा?.......... मनोरंजन


सुकून

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मेरी उम्र गुजर जायेगी तुम्हे खुश करने की कोशिश करते-2
तुम्हारी उम्र गुजर जायेगी,मुझे कुछ बूरा ना लग जाए इसके लिए,
दिखावा, औपचारिकता, और झूठी तारीफ् करते-2
मगर ना मै, तुम्हे खुश कर पाऊँगा कभी,
ना तुम, मेरे दिल को सुकून दे पाओगी,
हम अपने रिश्ते के पहचान में, और उलझते जाएँगे.....
चलो, ऐसा करते है, इस सिलसिले को ही खत्म करते है
कुछ और करते है, कुछ नया सोचते है
शायद तुम, तुम्हारी खुशी ढूँढ सको मन में

और मै ढूँढ सकूँ अपना सुकून!................................ मनोरंजन

Wednesday, April 16, 2014


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कैसे कुछ भी वो सोच पाएगी मेरे बारे में,
रोज़ हादसे होते है, जिसके जीवन में!!
बेज़ार पड़ी है उल्फ़त से, रूशवाईयों से,
टूटे अरमान, अधूरे ख्वाब,बेवफ़ाइयों से,
दोस्तों ने कुछ ऐसी निभाई है दोस्ती,
करती है बातें अब, दरख़्त- दिवारों से!!
बहुत हौसला बाकी है परवाज़ों में,
दिखता है उसके हर कदम, हर आगजों में!!
उड़ कर दिखाएगी सबको, वो कहती है,
बेपरवाह नदी की तरह, हमेशा बहती है!!
भींगता रहता हूँ अक्सर, उसके उन अश्कों में,
देखा नहीं कभी किसी ने, जो उसके आँखों में!! .......मनोरंजन


तुम जब साथ होती हो तो,
हर चीज ख़ूबसूरत होती है,
धूप में तपती सीड़ियों पर भी,
ठंडक महसूस होती है,
तलवों के जलने का,
चेहरे के झुलसने का एहसास नहीं होता,
वो हर लम्हा खास होता है,
जब तुम मेरे पास होती हो,
वही गलियाँ, वही पार्क, वही चाय की दुकान,
बिल्‍कुल नीरस और उदास लगते है,
जब तुम साथ नहीं होती हो,
वो मेरे अनगिनित किस्से,
कहानियाँ जो तुम्हे देखते ही ना जाने कहाँ से,
मेरे जुबां पर आ जाया करते थे, 
अंतहीन, बेमतलब की बातों का दौर थम सा गया है,
जैसे मेरे सारे शब्द बिख़र कर गुम हो गये है,
ढूँढता हूँ उन शब्दों को वही घास के मैदान में,
अब जबकी तुम साथ नहीं हो,
हर पल नजरें ढूँढती रहती है तुम्हारी निसां,
हर जगह ढूंढता हूँ मैं तुम्हे, जैसे छुपी हो वहीं पास वाले पेड़ के पीछे,
उन कुर्सियों पर जहाँ बैठने के लिये तुम लडा करती थी,
उस घास के मैदान में,
जंहा बैठ चँदनी रात में आसमान को देखा करती थी,
ढूँढता हूँ तुम्हे उन सीढ़ियों पर भी,
जंहा धूप में खड़े होकर, एक बार खिलायी थी,
अपने हाथों से बनाई मैगी मुझे,
अब चाय की चुस्कियों में वो स्वाद नहीं,
मैगी भी कसैली लगती है,
अब जबकि तुम साथ नहीं हो………………….. मनोरंजन




 मैं पागल नही हूं
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अक्सर सपने मे देखता हूं,
एक बेहद दुबला-पतला सा लड़का,
पहाड के सबसे उंची चोटी पर चढ,
अपनी बांहों को फुफकारता हुआ,
ज़ोर-ज़ोर से कुछ कहता है,
चिल्लाता है, जैसे अपनी आवाज सुनाना चाहता है सबको,
फिर अपने पास पड़े पत्थर के टुकडों को,
इधर- उधर फेंकता है,
चेहरे पर चमक, आँखो मे गुस्सा,
पसीने से तर-बतर ना जाने क्या कहना चाहता है?
आस-पास ना तो कोई उसकी अवाज को सुनने वाला है,
ना उसके कही बातों पर अमल करने वाला है,
सब अपने-अपने बोझ को उठाये भागे जा रहे है,
अन्त मे थक-हार कर मयूस होकर वही पर बैठ जाता है,
फिर बड़े ही निरीह भाव से कहता है,

मैं पागल नही हूं.