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Wednesday, April 16, 2014


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कैसे कुछ भी वो सोच पाएगी मेरे बारे में,
रोज़ हादसे होते है, जिसके जीवन में!!
बेज़ार पड़ी है उल्फ़त से, रूशवाईयों से,
टूटे अरमान, अधूरे ख्वाब,बेवफ़ाइयों से,
दोस्तों ने कुछ ऐसी निभाई है दोस्ती,
करती है बातें अब, दरख़्त- दिवारों से!!
बहुत हौसला बाकी है परवाज़ों में,
दिखता है उसके हर कदम, हर आगजों में!!
उड़ कर दिखाएगी सबको, वो कहती है,
बेपरवाह नदी की तरह, हमेशा बहती है!!
भींगता रहता हूँ अक्सर, उसके उन अश्कों में,
देखा नहीं कभी किसी ने, जो उसके आँखों में!! .......मनोरंजन


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