रंगे सियार
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फिर
एक बार
चुनाव का मौसम
आ गया
है,
सारे
सियार अलग-अलग
रंग में
रंग चुके
है
जनकल्याण, न्यायपुर्ण शासन,
व्यवस्था परिवर्तन,
सुशासन और प्रजा
के लिए
मार-मिटने
की क़समें
खाई जाने
लगी है,
सभा,
गोश्ठि, मान-मनौवत
का दौड़
जरी है,
दिन-रात
एक कर मासूम भेड़ों को अपनी
तरफ़ करने
की कशमकश
जारी है
कमाल
की बात
है की,
पिछले
65 साल से सबक
ना लेते
हुए,
भेड़ें
भी फिर
एक बार
नए उत्साह,
उमंग और उम्मीद से,
प्रजातंत्र के इस महा-पर्व
का बड़े
बेसब्रि से इंतज़ार कर रहे
है...
भेड़ों को उम्मीद
है की,भेड़ों को इस बार
न्यायपुर्ण शासन
मिलेगा,
इस
बार जरुर
व्यवस्था परिवर्तन
होगा,
भेड़ें
अब भय-मुक्त,
न्यायपुर्ण समाज
में अपना
जीवन जी सकेंगे,
मादा
भेड़ अब भय-
मुक्त होकर
जंगल में
कही भी,
कभी भी आ-
जा सकेंगी,
उन्हें कोई भेडिया
अपना शिकार
नही बनायेगा,
हर
तरफ़ रामराज्य
होगा, हर तरफ़
शान्ति, उन्नति
और खुश्हाली
होगी.............
पर
क्या सच में
भेड़ों की ये
उम्मीद पूरा
होगा?
पर
क्या सच में
भेड़ों का सपना
पूरा होगा?
या
दो-तीन
महीने बाद
आने वाले
बरसात में,
सियारो के चेहरे
का रंग
बारिश के पानी
में धुल
कर असली
चेहरा सामने
आ जयेगा?..........
मनोरंजन
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