कविता सी कुछ ---------
यह मेरे किताब की रफ़ पण्डुलिपि है
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Wednesday, April 16, 2014
औरत
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नदी
है
वह
,
बहते
जाती
है
,
अपनी
राह
खुद
बनाती
है
,
जहाँ
जाती
है
,
निर्मल
करती
है
सबको
,
सब
दर्द
,
गलीच
पिकर
भी
,
अपनी
आँसू
छुपा
लेती
है।
........................
मनोरंजन
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