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Wednesday, April 16, 2014

तुम जब साथ होती हो तो,
हर चीज ख़ूबसूरत होती है,
धूप में तपती सीड़ियों पर भी,
ठंडक महसूस होती है,
तलवों के जलने का,
चेहरे के झुलसने का एहसास नहीं होता,
वो हर लम्हा खास होता है,
जब तुम मेरे पास होती हो,
वही गलियाँ, वही पार्क, वही चाय की दुकान,
बिल्‍कुल नीरस और उदास लगते है,
जब तुम साथ नहीं होती हो,
वो मेरे अनगिनित किस्से,
कहानियाँ जो तुम्हे देखते ही ना जाने कहाँ से,
मेरे जुबां पर आ जाया करते थे, 
अंतहीन, बेमतलब की बातों का दौर थम सा गया है,
जैसे मेरे सारे शब्द बिख़र कर गुम हो गये है,
ढूँढता हूँ उन शब्दों को वही घास के मैदान में,
अब जबकी तुम साथ नहीं हो,
हर पल नजरें ढूँढती रहती है तुम्हारी निसां,
हर जगह ढूंढता हूँ मैं तुम्हे, जैसे छुपी हो वहीं पास वाले पेड़ के पीछे,
उन कुर्सियों पर जहाँ बैठने के लिये तुम लडा करती थी,
उस घास के मैदान में,
जंहा बैठ चँदनी रात में आसमान को देखा करती थी,
ढूँढता हूँ तुम्हे उन सीढ़ियों पर भी,
जंहा धूप में खड़े होकर, एक बार खिलायी थी,
अपने हाथों से बनाई मैगी मुझे,
अब चाय की चुस्कियों में वो स्वाद नहीं,
मैगी भी कसैली लगती है,
अब जबकि तुम साथ नहीं हो………………….. मनोरंजन




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