मैं पागल नही हूं
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अक्सर सपने मे देखता हूं,
एक बेहद दुबला-पतला सा लड़का,
पहाड के सबसे उंची चोटी पर चढ,
अपनी बांहों को फुफकारता हुआ,
ज़ोर-ज़ोर से कुछ कहता है,
चिल्लाता है, जैसे अपनी आवाज सुनाना चाहता है सबको,
फिर अपने पास पड़े पत्थर के टुकडों को,
इधर- उधर फेंकता है,
चेहरे पर चमक, आँखो मे गुस्सा,
पसीने से तर-बतर ना जाने क्या कहना चाहता है?
आस-पास ना तो कोई उसकी अवाज को सुनने वाला है,
ना उसके कही बातों पर अमल करने वाला है,
सब अपने-अपने बोझ को उठाये भागे जा रहे है,
अन्त मे थक-हार कर मयूस होकर वही पर बैठ जाता है,
फिर बड़े ही निरीह भाव से कहता है,
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