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Tuesday, November 25, 2014

पुरइन के पोखरा
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चलो रुखसत हुए,
चैन-ओ-सुकून के गीने--चुने कुछ दिन,
मेरे अपने कहे जाने वाले लोगों के साथ,
और अपने है भी मगर,उतने नहीं,
जीतना अपना था वो अमरूद का पेड़,
जीस पर भर दोपहरी बैठ कर खाया करता था,
कच्चे-कच्चे-पक्के अमरूद,
अब वो अमरूद का पेड़ रहा नहीं,
उखाड़ कर फेंक दिया,
मेरे ही किसी अपनो ने,
ना जाने क्यों हर वो चीज़,
अब लुप्त होने लगे है,जो मुझे अपना समझते है,
या असहज, असमर्थ और बेबस सा हो गये है,
बिल्कुल माँ की तरह, 
मेरे गांव का पुरइन का पोखरा,
जीसके पास जाते ही लगता है,
जैसे आ गया हूँ मैं अपने माँ के गोद में,
अब वो पोखरा भी सूख गया है,
जीस में, गर्मियों के छूटियों में,
पूरे दोपहर पड़े रहते थे,
उसके शीतल जल के आँचल में,
बगीचे का वो महुआ का पेड़,
अब ठूंठ रह गया है,
जीसके खुश्बू भरे फूलों को,
चुनने की चाह बाकी रह गई है अब भी,
छू लिया उस चबूतरे को भी,
जहां बैठ कर सुरेश चाचा ने खिलाई थी,
पचास पैसे की दालमोट और लेमन चूस मुझे,
तीसरी कक्षा में प्रथम आने के इनाम के रूप में,
अब बड़ी से बड़ी तरक्की, उपहार और पुरस्कार भी,
दे नहीं पाते वैसी खुशी,
जैसी खुशी सुरेश चाचा के पचास पैसे के दालमोट से मिली,
सुनारिन आम्मा के गोद में बैठ खाई गई लिट्टी,
और गोरा माइया के सर्दी के रातों की गर्म रजाई,
और रजाई में दुबके सुनना वो अनन्त किस्से,
राजा और रानी के, राजकुमारी और राक्षस के,
घूरे पर बैठ कर आग तापना,
और लख्खा बाबा के बड़बोलापन पर खूब हसना,
तब हर कोई अपना था,
अब ढूंढना पड़ता है वो चेहरा,
जिसमें अपनापन दिखे,
चलो, भर लिया अपने बाहों में,
उस आम के पेड़ को,
जीस पर चड़ कर खाये होंगे ना जाने कितने आम,
और डालों पर खेली थी दोल्हा-पाती,
छू लिया उस जामुन को भी,
जीसके कोटर से निकलने के लिए सुग्गा का बच्चा,
चड़ जाते थे बिल्कुल उपर तक,
भर लिया अपने आँखों में उस बगीचे को,
जीसमें पानी भर जाने पर फिसलने के लिए दौड़ा करते थे,
अब सबसे मिल लिया,छू लिया अपने हाथों से,
भर लिया अपने आँखों में,
छुपा लिया खुश्बू अपने मिट्टी की,
अपने दिल में,अब जाना होगा उस शहर को,
जहाँ की हवाओं में एक अजीब सी अजनबीपन घुला हुआ है,
हाँ कुछ चेहरे जाने पहचाने से है,
जिनके आँखों में अपने लिये,
स्नेह और अपनापन तलासते रहा हूँ सालों से,
और इस कोशिश में,
हर पल भीड़ में अकेला पाया है खुद को,
जनता हूँ, मृगमरिचका ही है,
मगर बड़ी शिद्धत से जुटा हूँ,
रेत को निचोड़ कर शीतल जल के कुछ बूंदें निकालने में। @मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/

Monday, November 24, 2014

खुश रहा करो बाबू
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खुश रहा करो बाबू,
अक्सर तुम्हारे मुखारबिंद से,
मेरे लिए निकले ये नायाब शब्द,
मेरे मन को जीतना शान्त नहीं करते,
उससे ज्यादा इस एहसास से भर देते है की,
मेरे खुश ना रहने की वजह और अवस्था को,
महसूस करती हो तुम शिद्धत से,
और तुम्हारा, इस एहसास को महसूस करना ही,
मेरे खुश ना रहने की वज़ह बनती है,
कई बार ऐसा लगता है की,
काश, मैं इस एहसास को छुपा पाता तो,
शायद इतनी तकलीफ नहीं होती,
आज भी शायद हम पहले की तरह,
खिलखिला रहे होते संग-संग,
तुम्हारी चहक और मेरे बेतुकी बातों से,
उठा ठहाकों के शोर में नहा रहा होता,
अपना कैम्पस का बगीचा,
तुम्हे ये जान कर शायद दुख ही होगा की,
अब नहीं होता वैसा कुछ भी वहां,
चाय की वो दुकान भी नहीं है अब,
कोई दूसरी दुकान खुली है थोड़ा आगे चल कर,
लेकिन सब बड़े शान्त, सौम्य और सलीके से बैठे होते है,
नए उम्र के शरीफ बच्चे खोये होते है,
प्रतियोगिता और अवसरों के दबाव में,
बिल्कुल शिष्टता, व्यवहारिकता और
औपचारिकता के आवरण में लिपटे हुए,
अब वहां दूसरों को कम पढाकू कह देने वाला कोई नहीं,
ना खुद को ज्यादा पढ़ने की शेख़ी बघारने वाला है कोई,
अब बच्चे, भले ही रात भर पढ़े हो,
पर नहीं बताते अपने दोस्तों को,
की शायद वो भी उसके देखा देखी रात भर ना पढ़ने लगे,
और ये सब देख कर मुझे तुम्हारी याद आ ही जाती है,
जब तुम्हे कम होशियार कहलाना बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होता था,
लड़ जाती थी तुम,
और अंत में मुझे ही हथियार डालना पड़ता था,
और ऐसे वक्त में तो चेहरे पर हंसी भी आती है,
तो तुम्हारा कहना सच हो जाता है,
पर वज़ह तो तुम ही होती हो,
एहसास भी वही होता है,
और शब्द भी वही होता है,
खुश रहा करो बाबू।@मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/





Friday, November 21, 2014

उसके एहसास से भरा रहता हूँ इसकदर,
की और कुछ भी एहसास नहीं होता,
आँखों के सामने से गुज़र जाता है समंदर,
पर होठों पर एक बूंद के लिये भी प्यास नहीं होता।@ मनोरंजन
दर्द का रिश्ता 
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चलो, खुशी का ना सही,
दर्द का रिश्ता कायम करते है,
आँसू बन कर, एक-दूसरे के,
आँखों से बहते है।
साथ चल पाते, इस राह में तो,
सफ़र आसान बहुत होता,
मुश्किलों से संवरता है जीवन,
इसको अपनाते है,
चलो खुशी का ना सही,
दर्द का रिश्ता कायम करते है।
सपने, आरमान और ख़्वाहिशे तो,
बहुतों के पूरे होते है,
पर अधूरे ख़्वाब वाले जीते है जैसे,
उस तरह जी कर देखते है,
चलो खुशी का ना सही,
दर्द का रिश्ता कायम करते है।
ये दर्द, उदासी भी तो जीवन का ही,
एक हिस्सा है,
सुना है, दर्द में मुस्कुराना अच्छा लगता है,
इस रंग में ख़ुद को रंग कर देखते है,
चलो खुशी का ना सही,
दर्द का रिश्ता कायम करते है।@मनोरंजन

Tuesday, November 18, 2014


तलाब और मछलियाँ
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तलाब की दोस्ती मछलियों से होती है,
मछुवारों से नहीं,
तलाब क्या कुछ नहीं करता मछलियों के लिये,
आश्रय, अपनापन व प्रेमभरा आंचल देता है,
स्नेह, सहभागिता और स्वच्छंदता देता है,
पोषण और जीवन भी देता है,
रक्षा भी करता है भरसक हर आपदा से,
शिकारी पंक्षियों से,
और अपनी क्षमता और गहराई की हद तक,
कोशिश करता है की डुबो दे उन मछुवारों को,
जो उसके दायरे में आकर,
फांसते है मासूम मछलियों को,
पर अक्सर मछुवारा शातीर होता है,
जनता है तैरना, और मिथ्या दोस्ती की हाथ बढ़ा कर,
मछलियों को फांसने का गूर जनता है,
मछलियाँ, अक्सर नासमझ होती है,
समझ नहीं पाती, मछुवारों की योजना,
ज़रा सी प्रलोभन से,
भुल जाती है, उस बेशुमार मोहब्बत को,
और अपनापन को,
जो तलाब देता रहा होता है,
अनन्त काल से,
और फंस जाती है,
मछुवारों के जाल में।@मनोरंजन
एक सिलसिला जो थमता नहीं
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अब मुझे अपनी स्वीकृति में,
हाँ कहना ही होगा,
अपने अस्तित्व और स्वभिमान को बचाने के लिए,
जब तुम पूछोगी,
की मैं तुम्हे भूल गया ना,
पता नहीं क्यों मैं खुद अपनी ही नजरों में,
कमजोर और तुच्छ सा लगाने लगता हूँ,
तुम्हे ना भुल पाने का दर्द,
मेरे चेहरे को जर्द पीला कर देता है,
अब ना कहने में मेरे शब्द अजीब से,
असहाय और बेबस से लगने लगते है,
और तुम्हारे चेहरे की जीत की चमक,
मेरी अंखों को चौंधिया देते है,
और हर बार तुमसे मिलते वक्त जो रोमांच होता है,
उसकी कीमत, मुझे अश्कों से आदा करना होता है,
विदा होते वक्त, ऐसा लगता है,
जैसे मैं अपने लाश को,
अपने कमजोर कंधे पर घसिटते हुए,
लिए जा रहा हूँ।@मनोरंजन


Monday, November 17, 2014

गौरैया
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ओहो! कहाँ गई गौरैया रानी,
कितनी यादें जुड़ी है तुम संग,
तुम संग बनी कई कहानी,
कहाँ गई गोरैया रानी।
कैसे सुन्दर पंख रंगे थे,
सुन्दर सा घोसला बनवाया,
घर वालों से छुप-छुपा कर,
किताबों वाले दरख् में छुपाया,
खाने को दाना दी तुमको,
पीने को दी कटोरी में पानी,
कहाँ गई गौरैया रानी।
चीं-चीं कर बातें करती थी,
हर वक्त तिनका जोड़ते रहती थी,
कभी आंगन में, कभी मुँड़ेर पर,
चीं-चीं कर हमें बुलाती थी,
पास जाने पर फुर्र से उड़ जाती थी तुम सयानी,
कहाँ गई गौरैया रानी।
भरी दुपहरी में, दरवाज़े के पीछे,
माँ कपड़े सीला करती थी,
वहीं पास में तुम चीं-चीं करती,
दाना चुगने में मसगूल रहती थी,
माँ की गीत सुहानी बन जाती थी,
जब मिल जाती थी तुम्हारी वाणी,
कहाँ गई गौरैया रानी।
तुम बिन बचपन होता सुना,
तुम बिना उजड़ पड़ा घर का हर कोना,
सुना पड़ा है, किताबों की अलमारी,
सुना-सुना है खिड़की और चबुतरा,





Friday, November 14, 2014

परख
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संवेदना और भावनाएं जैसी फिल्मों में दिखती है,
असल जिंदगी में वैसी नहीं दिखती,
एक अच्छी तरह से चित्रित फिल्म में,
जीस तरह एक प्रेमिका अपने प्रेमी को देखती है,
ना तो वैसी आँखें हमें देखने को मिलती है, ना वैसी संवेदना,
या शायद हममें से अधिकांश लोग अपने जीवन में उस साथी मिल ही नहीं पाते,
जिसके नज़रों में हमारे लिये गहरा प्रेम और संवेदना हो,
किसी और को दोष देने का कोई मतलब नहीं,
हम खुद भी अपने जीवन साथी के साथ, उस तरह नहीं जुड़ पाते,
जीवन की उबड़-खाबड़ राहें, जरूरतें और मजबूरियां,
हमारे अस्तित्व को भौतिक और भूगौलिक सीमाओं में बांध लेती है,
फिर संवेदनाएं, गौण हो जाती है, और जरूरतें हावी हो जाती है,
अक्सर संवेदनाएं, दर्द से जन्म लेती है,
जीन रिश्तों में दर्द होता है, वहाँ संवेदनाएं परिलक्षित होती है,
तो अगर सीधे-सरल शब्दों में कहें तो दर्द, रिश्तों में गहराई लता है,
और रिश्ते को सुदृढ़ करने,
भौतिक और भूगौलिक सीमाओं से परे जाकर प्रेम करने को उत्साहित करता है,
क्या ये सच नहीं है की,
ज्यादातर संवेदनशील लोग इसी दर्द को पाने और,
भौतिक और भूगौलिक सीमाओं से परे जाकर प्रेम करने की चाह में,
हर वक्त मन ही मन, कोई ऐसे शख्स को ढूंढते रहते है,
जो उनके इस चाहत को पूरा कर सके।@ मनोरंजन