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खुश रहा करो बाबू,
अक्सर तुम्हारे मुखारबिंद से,
मेरे लिए निकले ये नायाब शब्द,
मेरे मन को जीतना शान्त नहीं करते,
उससे ज्यादा इस एहसास से भर देते है की,
मेरे खुश ना रहने की वजह और अवस्था को,
महसूस करती हो तुम शिद्धत से,
और तुम्हारा, इस एहसास को महसूस करना ही,
मेरे खुश ना रहने की वज़ह बनती है,
कई बार ऐसा लगता है की,
काश, मैं इस एहसास को छुपा पाता तो,
आज भी शायद हम पहले की तरह,
खिलखिला रहे होते संग-संग,
तुम्हारी चहक और मेरे बेतुकी बातों से,
उठा ठहाकों के शोर में नहा रहा होता,
अपना कैम्पस का बगीचा,
तुम्हे ये जान कर शायद दुख ही होगा की,
अब नहीं होता वैसा कुछ भी वहां,
चाय की वो दुकान भी नहीं है अब,
कोई दूसरी दुकान खुली है थोड़ा आगे चल कर,
लेकिन सब बड़े शान्त, सौम्य और सलीके से बैठे होते है,
नए उम्र के शरीफ बच्चे खोये होते है,
प्रतियोगिता और अवसरों के दबाव में,
बिल्कुल शिष्टता, व्यवहारिकता और
औपचारिकता के आवरण में लिपटे हुए,
अब वहां दूसरों को कम पढाकू कह देने वाला कोई नहीं,
ना खुद को ज्यादा पढ़ने की शेख़ी बघारने वाला है कोई,
अब बच्चे, भले ही रात भर पढ़े हो,
पर नहीं बताते अपने दोस्तों को,
की शायद वो भी उसके देखा देखी रात भर ना पढ़ने लगे,
और ये सब देख कर मुझे तुम्हारी याद आ ही जाती है,
लड़ जाती थी तुम,
और अंत में मुझे ही हथियार डालना पड़ता था,
और ऐसे वक्त में तो चेहरे पर हंसी भी आती है,
तो तुम्हारा कहना सच हो जाता है,
पर वज़ह तो तुम ही होती हो,
एहसास भी वही होता है,
और शब्द भी वही होता है,
खुश रहा करो बाबू।@मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/


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