एक सिलसिला जो थमता नहीं
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अब मुझे अपनी स्वीकृति में,
हाँ कहना ही होगा,
अपने अस्तित्व और स्वभिमान को बचाने के लिए,
जब तुम पूछोगी,
की मैं तुम्हे भूल गया ना,
पता नहीं क्यों मैं खुद अपनी ही नजरों में,
कमजोर और तुच्छ सा लगाने लगता हूँ,
तुम्हे ना भुल पाने का दर्द,
मेरे चेहरे को जर्द पीला कर देता है,
अब ना कहने में मेरे शब्द अजीब से,
असहाय और बेबस से लगने लगते है,
और तुम्हारे चेहरे की जीत की चमक,
मेरी अंखों को चौंधिया देते है,
और हर बार तुमसे मिलते वक्त जो रोमांच होता है,
उसकी कीमत, मुझे अश्कों से आदा करना होता है,
विदा होते वक्त, ऐसा लगता है,
जैसे मैं अपने लाश को,
अपने कमजोर कंधे पर घसिटते हुए,
लिए जा रहा हूँ।@मनोरंजन
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