Followers

Friday, November 14, 2014

परख
====
संवेदना और भावनाएं जैसी फिल्मों में दिखती है,
असल जिंदगी में वैसी नहीं दिखती,
एक अच्छी तरह से चित्रित फिल्म में,
जीस तरह एक प्रेमिका अपने प्रेमी को देखती है,
ना तो वैसी आँखें हमें देखने को मिलती है, ना वैसी संवेदना,
या शायद हममें से अधिकांश लोग अपने जीवन में उस साथी मिल ही नहीं पाते,
जिसके नज़रों में हमारे लिये गहरा प्रेम और संवेदना हो,
किसी और को दोष देने का कोई मतलब नहीं,
हम खुद भी अपने जीवन साथी के साथ, उस तरह नहीं जुड़ पाते,
जीवन की उबड़-खाबड़ राहें, जरूरतें और मजबूरियां,
हमारे अस्तित्व को भौतिक और भूगौलिक सीमाओं में बांध लेती है,
फिर संवेदनाएं, गौण हो जाती है, और जरूरतें हावी हो जाती है,
अक्सर संवेदनाएं, दर्द से जन्म लेती है,
जीन रिश्तों में दर्द होता है, वहाँ संवेदनाएं परिलक्षित होती है,
तो अगर सीधे-सरल शब्दों में कहें तो दर्द, रिश्तों में गहराई लता है,
और रिश्ते को सुदृढ़ करने,
भौतिक और भूगौलिक सीमाओं से परे जाकर प्रेम करने को उत्साहित करता है,
क्या ये सच नहीं है की,
ज्यादातर संवेदनशील लोग इसी दर्द को पाने और,
भौतिक और भूगौलिक सीमाओं से परे जाकर प्रेम करने की चाह में,
हर वक्त मन ही मन, कोई ऐसे शख्स को ढूंढते रहते है,
जो उनके इस चाहत को पूरा कर सके।@ मनोरंजन

No comments:

Post a Comment

Write here