पुरइन के पोखरा
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चलो रुखसत हुए,
चैन-ओ-सुकून के गीने--चुने कुछ दिन,
मेरे अपने कहे जाने वाले लोगों के साथ,
और अपने है भी मगर,उतने नहीं,
जीतना अपना था वो अमरूद का पेड़,
जीस पर भर दोपहरी बैठ कर खाया करता था,
कच्चे-कच्चे-पक्के अमरूद,
अब वो अमरूद का पेड़ रहा नहीं,
उखाड़ कर फेंक दिया,
मेरे ही किसी अपनो ने,
ना जाने क्यों हर वो चीज़,
अब लुप्त होने लगे है,जो मुझे अपना समझते है,
या असहज, असमर्थ और बेबस सा हो गये है,
बिल्कुल माँ की तरह,
मेरे गांव का पुरइन का पोखरा,
जीसके पास जाते ही लगता है,
जैसे आ गया हूँ मैं अपने माँ के गोद में,
अब वो पोखरा भी सूख गया है,
जीस में, गर्मियों के छूटियों में,
पूरे दोपहर पड़े रहते थे,
उसके शीतल जल के आँचल में,
बगीचे का वो महुआ का पेड़,
अब ठूंठ रह गया है,
जीसके खुश्बू भरे फूलों को,
चुनने की चाह बाकी रह गई है अब भी,
छू लिया उस चबूतरे को भी,
जहां बैठ कर सुरेश चाचा ने खिलाई थी,
पचास पैसे की दालमोट और लेमन चूस मुझे,
तीसरी कक्षा में प्रथम आने के इनाम के रूप में,
अब बड़ी से बड़ी तरक्की, उपहार और पुरस्कार भी,
दे नहीं पाते वैसी खुशी,
जैसी खुशी सुरेश चाचा के पचास पैसे के दालमोट से मिली,
सुनारिन आम्मा के गोद में बैठ खाई गई लिट्टी,
और गोरा माइया के सर्दी के रातों की गर्म रजाई,
और रजाई में दुबके सुनना वो अनन्त किस्से,
राजा और रानी के, राजकुमारी और राक्षस के,
घूरे पर बैठ कर आग तापना,
और लख्खा बाबा के बड़बोलापन पर खूब हसना,
तब हर कोई अपना था,
अब ढूंढना पड़ता है वो चेहरा,
जिसमें अपनापन दिखे,
चलो, भर लिया अपने बाहों में,
उस आम के पेड़ को,
जीस पर चड़ कर खाये होंगे ना जाने कितने आम,
और डालों पर खेली थी दोल्हा-पाती,
छू लिया उस जामुन को भी,
जीसके कोटर से निकलने के लिए सुग्गा का बच्चा,
चड़ जाते थे बिल्कुल उपर तक,
भर लिया अपने आँखों में उस बगीचे को,
जीसमें पानी भर जाने पर फिसलने के लिए दौड़ा करते थे,
अब सबसे मिल लिया,छू लिया अपने हाथों से,
भर लिया अपने आँखों में,
छुपा लिया खुश्बू अपने मिट्टी की,
अपने दिल में,अब जाना होगा उस शहर को,
जहाँ की हवाओं में एक अजीब सी अजनबीपन घुला हुआ है,
हाँ कुछ चेहरे जाने पहचाने से है,
जिनके आँखों में अपने लिये,
स्नेह और अपनापन तलासते रहा हूँ सालों से,
और इस कोशिश में,
हर पल भीड़ में अकेला पाया है खुद को,
जनता हूँ, मृगमरिचका ही है,
मगर बड़ी शिद्धत से जुटा हूँ,
रेत को निचोड़ कर शीतल जल के कुछ बूंदें निकालने में। @मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
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