पुरइन के पोखरा
.....................
एक लम्बी कविता का अंश
.................................
चलो रुखसत हुए,
चैन-ओ-सुकून के गीने--चुने कुछ दिन,
मेरे अपने कहे जाने वाले लोगों के साथ,
और अपने है भी मगर,
उतने नहीं, जीतना अपना था वो अमरूद का पेड़,
जीस पर भर दोपहरी बैठ कर खाया करता था कच्चे-कच्चे-पक्के अमरूद,
अब वो अमरूद का पेड़रहा नहीं,
उखाड़ कर फेंक दिया, मेरे ही किसी अपनो ने,
ना जाने क्यों हर वो शय, अब लुप्त होने लगे है,
जो मुझे अपना समझते है,
या असहज, असमर्थ और बेबस सा हो गये है,
बिल्कुल माँ की तरह,
.....
.........
..............
...................
अब सबसे मिल लिया,
छू लिया अपने हाथों से,
अब जाना होगा उस शहर को,
जहाँ की हवाओं में एक अजीब सी अजनबीपन घुला हुआ है,
हाँ कुछ चेहरे जाने पहचाने से है,
जिनके आँखों में अपने लिये,
स्नेह और अपनापन तलासते रहा हूँ सालों से,
और इस कोशिश में,
हर पल भीड़ में अकेला पाया है खुद को,
जनता हूँ, मृगमरिचका ही है,
मगर बड़ी शिद्धत से जुटा हूँ,
रेत को निचोड़ कर शीतल जल के कुछ बूंदें निकालने में।@मनोरंजन
.....................
एक लम्बी कविता का अंश
.................................
चलो रुखसत हुए,
चैन-ओ-सुकून के गीने--चुने कुछ दिन,
मेरे अपने कहे जाने वाले लोगों के साथ,
और अपने है भी मगर,
उतने नहीं, जीतना अपना था वो अमरूद का पेड़,
जीस पर भर दोपहरी बैठ कर खाया करता था कच्चे-कच्चे-पक्के अमरूद,
अब वो अमरूद का पेड़रहा नहीं,
उखाड़ कर फेंक दिया, मेरे ही किसी अपनो ने,
ना जाने क्यों हर वो शय, अब लुप्त होने लगे है,
जो मुझे अपना समझते है,
या असहज, असमर्थ और बेबस सा हो गये है,
बिल्कुल माँ की तरह,
.....
.........
..............
...................
अब सबसे मिल लिया,
छू लिया अपने हाथों से,
अब जाना होगा उस शहर को,
जहाँ की हवाओं में एक अजीब सी अजनबीपन घुला हुआ है,
हाँ कुछ चेहरे जाने पहचाने से है,
जिनके आँखों में अपने लिये,
स्नेह और अपनापन तलासते रहा हूँ सालों से,
और इस कोशिश में,
हर पल भीड़ में अकेला पाया है खुद को,
जनता हूँ, मृगमरिचका ही है,
मगर बड़ी शिद्धत से जुटा हूँ,
रेत को निचोड़ कर शीतल जल के कुछ बूंदें निकालने में।@मनोरंजन
No comments:
Post a Comment
Write here