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Thursday, November 13, 2014

यात्रा
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एक कमरे के घर में पांच सदस्यों के आपस में टकराती दिशाहीन बातों से बजबजाते घर में,
रहने से बेहतर उसने एक अनन्त यात्रा पर,
निकलने का फैसला किया,
पर पटना स्टेसन के यार्डमें लगी मगध एक्सप्रेस के साधारण डिब्बे के एक सीट पर बिना कुलियों को पैसा दिये बैठना और फिर कुल्ली द्वारा, 
एक झन्नाटेदार थापड़ ने,
उसे घर और बाहर का अंतर समझा दिया,
एक बार उसने कहा था,
की मैं जीस यात्रा पर निकल गया हूँ,
वहां, हर रोज मुझे ऐसे थपाड़ों का समना करना है,
मगर मैं वापस नहीं जौऊंगा,
मेरे आगे एक अनन्त समुन्द्र है, 
और पिछे सड़ांध से जकड़ा माहौल,
उसने बड़ी विश्वास 
से कहा की मैं, इस सागर में तैर कर खुश होता हूँ,
डूबता भी हूँ, मगर जब डुबकर वापस पानी की सतह पर आता हू तो लगता है,
ज़िंदगी कितनी स्वच्छंद, सुन्दर और सुवासित है,
और इसीतरह चलते रहता हूँ,
ताकि पूरी कर सकूँ अपनी यात्रा।

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