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Monday, September 29, 2014

जीवन क्या है
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जीवन क्या है,
बस ख्वाबों, ख्वाहिसों,
अभावों व असंतोषों का पिटारा,
जलते हुए शब्दों में,
तलती हुई कविता,
शह-मात का खेल,
और जीत कर अट्ठाहास करती,
विद्रूप और कलुषित मानसिकता,
हार कर विरूपित होते एहसास,
संकुचित होती आंचल,
अवसाद और पीड़ा के नीला पड़ते निशान,
जीवन क्या है,
बस स्वार्थ और आत्ममुग्धता से,
उलझते धागों का बंधन,
अविश्वास और प्रतिघात के लिए,
सजते चेहरों पर मुखौटों का आवरण,
कमर के खींसे में खोसे हुए खंजर,
जीवन क्या है,
प्रकृति के नियमों से खेलना,
आने वाली पीढ़ियों को खाई में धकेलना,
सोने की सेज़ के लिए,
चिड़ियों के घोसलों को रौंदना,
औरों के घरौंदों को उजाड़ना,
जीवन क्या है
................................मनोरंजन
 

Friday, September 26, 2014

तुम्हारी चाहत
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जाना तो तुम्हे था ही,
बस एक बहाने के लिये रुके रहे अब तक,
बचा ही नहीं एक कतरा भी मैं,
तुम्हारे अंदर,
स्वार्थ और विरक्ति,
अवाज़ में,
घर्षण पैदा कर देते है,
छिटक कर दूर चली जाती है,
मन के अंदर की सारी कोमल भावनायें,
सब ठीक है,
जताने की कोशिश तो बहुत हुई,
पर लब्‍जों में तख़्ती,
तुम्हारे मुक्त होने की चाह को,
प्रखर कर देते थे,
अब तुम चले गये हो उस राह पर,
जहाँ मिल ना सके,
हम-तुम कभी...........
पर मैं ऐसा नहीं चाहता था,
मैं चाहता था की,
मिले हम, कभी, कहीं,
किसी राह में वर्षों बाद ही सही,
और जब मिलें तो हमारी नजरें झुकें नहीं,
चमक आ जाये हमारी आँखों में,
जैसे ढूंढ रहे थे हम दोनों एक- दूसरे को सदियों से..................manoranjan
http://manoranjan234.blogspot.in/

Wednesday, September 24, 2014

यादों के झरोखें
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अब शायद जिन्दगी में,
होगी ना फुरसत इतनी,
की तुम्हे देख सकूँ,
यादों के झरोखों से,
नज़र धूमिल सी होने लगी है,
की अब ख्वाब नहीं आते इन आँखों में,
पलकें बोझिल सी रहती है,
की अब शायद इन पलकों पर,
ना तैर सकेंगें सतरंगी सपने,
जो देखे थे हमने साथ-साथ,
उन अभावों से जर्जर वक्त के अगोश में,
वे जर्जर वक्त भी आज से कितने बेहतर थे,
कुछ नहीं था हमारे पास सिवा तुम्हारे,
आज हम दोनों ना जाने कितने लोगों के,
क्या-क्या लगते है,
सिवा एक-दूसरे के,
अब शायद लौट ना सकेंगे वे वक्त कभी,
जब हम दोनों थे सिर्फ एक-दूसरे के।......................मनोरंजन

Tuesday, September 23, 2014

लगता है सब सो गए है
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आज फिर शायद वो पीकर घर आया है,
बच्चों के चीखने- चिल्लाने का शोर,
और बर्तनों के पटकने, चूडियों के टूटने की आवाजें,
और  बिल्कुल निरीह आवाज में,
सिसकने की आवाज कानों में फिर से,
किसी पिघले हुए धातु की तरह रिसता चला जा रहा है,
कोई नहीं आता, कुछ भी पुछने के लिये,
लगता है सब सो गए है।
लोग तब भी सो रहे थे,
जब एक चलती हुई बस से,
दरिंदों ने फेंक दी थी एक लड़की को,
भरे बाज़ार में उसका सब कुछ लूट कर,
सरकार सो रही थी,
पुलिस वाले सो रहे थे,
और सारा बाज़ार सोया हुआ था,
नींद में बेसुध पड़े लोग कई दिनों के बाद जगे,
जब वो लड़की अपनी अंतिम साँसे गिन रही थी,
लोगों की ये बेरहम नींद टूटती नहीं,
बस लुटती जा रही है, कई जिंदगियां,
इस नींद के आगोश में,
और ये सिलसिला चलता जा रहा है,
कभी पेड़ से लटका देते है,
कभी किसी शोरूम में,
सिसकियों को दफ़न करने का,
सिलसिला यूं ही चलते जा रहा है,
मगर नींद नहीं टूटती है,
भयानक अंधेरा पसरा हुआ है चारों तरफ़,
किस्म-किस्म की हवाएं तेज़ बह रही है,
सब अपने -अपने टिमटिमाते दिये को बचने में लगे हुए है,
तभी कहीं से कोई अंधेरे का दूत आता है,
और फूंक मर कर दिया बूझा देता है,
फिर अंधेरा पसर जाता है,
मगर आस-पास वालों को कोई फर्क नहीं पड़ता,
किसी और के घर में अंधेरा हो जाने से,
किसी के पास वक्त नहीं है,
किसी और के आँखों की नमी,
अपने आँखों में महसुस करने की,
और सबकी बारी आती है,
क्योंकि हवाएँ किस्म-किस्म की है,
और बहुत तेज़ बह रही है,
दूर कहीं-कहीं से सजग करने की आवाजें आ जाती है,
मगर ये आवाजें किसी के कानों तक नहीं पहुँच पाती है,
लगता है सब सो गए है।................मनोरंजन
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Saturday, September 20, 2014

ख्वाबों में भी शर्माते हो तुम
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ख्वाबों में भी शर्माते हो तुम,
निंद से बोझिल मेरी आँखों पर,
लोटते यादों का करवां,
वहीं पलकों के झुरमुट से,
झांक कर छुप जाते हो तुम,
ख्वाबों में भी शर्माते हो तुम।
व्याकुल हो, आँखों को मलता हूँ,
ढुंढता हूँ तुम्हे इधर-उधर तो देखता हूँ,
दरवाजे के दरारों से झंकते हुए मुस्कुरते हो तुम,
ख्वाबों में भी शर्माते हो तुम।
मैं पसीने से तर-बतर,
भारी दुपहरी में कहीं जाने को उद्दत,
लम्बा-लंबा डग भरते,
अपने गाँव के पीछे वाले बगीचे से गुजरता हूँ,
तभी पाता हूँ की,
वक्त के हर सवाल से अनजान,
पेड़ के ओट में खडी आज भी खिलखिलाते हो तुम,
ख्वाबों में भी शर्माते हो तुम। 
नहीं खर्चना चाहता मैं,
अपने यादों के संजोये खजाने को,
बंद कर लेता हूँ अपनी आँखों को,
ताकी छुपा कर रखे रहूँ तुम्हे,
अपने पलकों के पिछे,
पर अंासुओं के बुंदों संग,
बह कर बिखर जाते हो तुम,
ख्वाबों में भी शर्माते हो तुम।................मनोरंजन
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एक छोटी सी बात-15
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दुख, तुम्हे क्या तोड़ेगा,
तुम दुख के बांह मरोड दो,
सिर्फ अपनी नज़र,
किसी के सपनों से जोड़ दो।
जब तक आप सिर्फ अपने बारे में सोचाते है,
अपने स्वार्थ, अकांक्षाओं को पुरा करने में,
दिन-रात लगे रहते है,
आप हमेशा परेशान, दुखी, और उदास रहते है,
गुस्सा, इर्श्या,प्रतिशोध और,
अनेक नकारात्मक विचारों से आपका मन भरा रहता है।
जैसे ही आप किसी के लिए निस्वार्थ भाव से,
कुछ करने के लिए अपना हाथ बढाते है,
आपके मन में खुशी और संतुष्टि के भाव भर जाते है,
और आपका जीवन नित नई खुशियों से,
उत्साह और उमंग से चाहकाने लगता है,
हर तरफ खूबसूरती नज़र आने लगती है,
जीवन रोशनी से दग्ध और खुशबू से महकने लगता है,
यही जिन्दगी जीने का सर्वोतम तरिका है।................................मनोरंजन
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Friday, September 19, 2014

खो गये सब कुछ,
चकाचौंध में खो गये,
चूल्हे से उठता धुँआ,
धुँए की बनती वो छाई,
धुएँ से जलती आँख पोछती,
ममतामयी परछाई,
अनजाने में जाने कैसे,
जलते आंगारों पर सो गये,
खो गये सब कुछ,
चकाचौंध में खो गये।
आईना तो कभी झूठ बोलता नहीं
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आईना तो कभी झूठ बोलता नहीं,
मैं वही हूँ, कहीं बदला तो नहीं,
फिर हुई क्या खाता, क्या हुई है गुनाह,
लोग घर में मुझे, क्यों पहचानते नहीं।
आँखें भी है वही, दिल भी ऐसा ही था,
है नज़र भी वही, ऐसा मंजर भी था,
है कयामत की, यहाँ सबको जनता हूँ मैं,
पर लोग मेरे नाम तक को जानते नहीं।
आईना तो कभी झूठ बोलता नहीं,
मैं वही हूँ कहीं बदला तो नहीं।...........................मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
तू है तो सब कुछ है,
तू नहीं तो कुछ भी नहीं है,
बंजर सी जिंदगी है,
वीराना सा सफर है,
अब तो सिर्फ दर्द ही,
जीवन में है।.....
दर्द को पीना है,
दर्द में जीना है,
दर्द की प्यास ज़ुबां पर है,
दर्द जेहन में है,
अब तो सिर्फ दर्द ही,
जीवन में है,......................मनोरंजन
कभी हम वक्त को टाल गये,
कभी वक्त हमें टाल गया,
जिंदगी बस इतनी सी है,
कभी हम वक्त पर हंसे,
कभी वक्त हमपर हंस गया.......
वो कहता है की, उसका कुछ ना बिगड़ा मुझसे दूर होकर,
और ये कहते हुए उसके चेहरे का रंगत बिगड़ गया.......मनोरंजन
बहुत मुश्किल है,
सीलन से बजबजाते दिवारों के,
अंदर बैठ कर धूप से मिलना,
सिर्फ रोटी की खातिर,
अपने सांसों को गिरवी रख,
उन्मुक्त साँस की कामना करना,
ये घुटन अपाहिज बना दे,
इसके पहले,
दिवारों को तोड़ना होगा,
भले ही छत ना रहे सर पर,
स्वच्छ हवा तो मिलेगी,
गुनगुने धूप का स्पर्श पाकर,
मन में ताजगी तो भरेगी,
हड्डियों में ताकत भी भरेगी,
स्वच्छंदता, अपने आप में एक वरदान है.................मनोरंजन
आज-कल महात्मा गाँधी जी को पढ़ रहा हूँ, महात्मा गाँधी का पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान पर एक लेख लिखा है।
आपलोग के नज़र करना चाहता हूँ, देखता हूँ, की आपको पसंद आती है या नहीं।
 .....................................................................................................................
महात्मा गाँधी और पत्रकारिता के लिये किये गये उनके कार्य
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महात्मा गाँधी का व्यक्तित्व बहु-आयामी था। वे ऐसे व्यक्ति थे जिन्होने राजनीति के नये मानक निर्धारित किये और जीवन भर उन मनकों पर डटे रहे। नागरिक स्वतंत्रता के लिये उनकी प्रतिबद्धता और जुनून की शुरुआत काफी पहले दक्षिण अफ्रीका में ही हो गयी थी। लेकिन उनके लिये नागरिक स्वतंत्रता के मायने अलग थे। वे उन रूढ़िवादी विचारों से भी देश और समाज को मुक्त करना चाहते थे, जिनके चंगुल में भारत देश सदियों से जकड़ा था। इसके लिये उन्होने महिलाओं की सामाजिक मुक्ति, जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव,छुआ-छूत के लिये एक बहुत संघर्ष शील लड़ाई लड़ी, जो उनके भारत देश के आजादी के लिये किये गये आंदोलनों से किसी भी तरह कमतर नहीं था। महात्मा गाँधी ने अपने मनकों को जन-जन तक पहुंचने के लिये पत्रकारिता का सहारा लिया। गाँधी के अनुसार, उनकी पत्रकारिता, पत्रकारिता के लिये नहीं है,बल्कि उनके जीवन का जो ध्येय है, उसके सहायक के रूप में है। महात्मा गाँधी ने दशकों तक कई समाचार पत्रों में लिखते रहे, कई समाचार पत्रों का संपादन किया। महात्मा गाँधी ने जीन समाचार पत्रों का प्रकाशन अथवा संपादन किया, वे पत्र अपने समय के सर्वाधिक लोकप्रिय पत्रों में माने गये। बहुत कम लोग महात्मा गाँधी के एक श्रेष्ट पत्रकार होने के बारे में पता है मगर  सही मायने में जब भारत देश में पत्रकारिता अपने शैशव काल में थी तब  महात्मा गाँधी ने पत्रकारिता के नैतिक अवधारणा प्रस्तुत की थी। महात्मा गाँघी ने पत्रकारिता के मध्यम से सरोकारीय चेतना से जनमानस को लाभान्वित किया। महात्मा गाँधी, भारतीय पत्रकारिता के इतिहास के उन शिल्पी पुरुखों में से एक है जिन्होने पत्रकारिता में सरोकार भरे, संघर्षों का जज्बा पैदा किया, मर्यादा की लक्ष्मण रेखा खींची एवम् पत्रकारिता के अनेक मानी, मूल्य गढ़े। सत्य, अहिंसा,असहयोग और सविनय अवज्ञा को शास्त्र बना कर स्वाधीनता का संग्राम एक विलक्षण तरीके से लड़ने वाले गाँधी जी की पत्रकारिता के क्षेत्र में किये गये उनके कार्य, उनके व्यक्तित्व के आगे ओझल हो जाते है। एक प्रमाणिक तथ्य यह है की महात्मा गांधी के सभी अन्दोलनों और वैचारिक अनुष्ठानों के सफलता में उनके पत्रकारीय पक्ष का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।  2 अक्तूबर 1869 को गुजरात के पोरबन्दर में जन्में मोहनदास करमचंद गांधी ने अपनी पत्रकरिता की श्ुरुआत सन् 1888 में लंदन में ही कर डी थी। गंधीजी ने पत्रकारिता का उपयोग दो तरह से किया-इंगलैंड में प्रवास कल ( जुलाई 1888- जून 1891) और दक्षिन अफ्रिका में देशी-विदेशी समाचार पत्रों के मध्यम से गांधी जी ने अपने कार्यों और विचारों को पाठकों तक पहुंचाने का कार्य किया। महात्मा गांधी ने दक्षिन अफ्रिका से लेकर भारत तक में भारत और भारतियों के अधिकारों के लिये अवाज उठाई। महात्मा गांधी जब लंदन पहुँचे, तब वे समाचार पत्रों के दुनिया से ज्यादा परिचित नहीं थे। दलपतराम शुक्ला जी के कहने पर  उन्होने प्रत‍िद‍िन एक घंटा का समय विभिन्न समाचार पत्रों को पढने में लगाना शुरू किया। गांधी जी अपने माता के प्रभाव के कारण अन्नहारी थे, वे इंगलैंड में अन्नहार अन्दोलन से भी जुडे थे। अन्नहार को लेकर गंधीजी ने ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अखबार           " वेजिटेरियन" में लेख लिखना शुरू किया। ब्रिटेन के बाद अफ्रिका पहुँचने पर महात्मा गांधी जी ने      " इंडियन ओपिनियन" समाचार पत्र का सम्पादन किया। उन्होने "इंडियन ओपिनियन" के  मध्यम से दक्षिन अफ्रिकी और भरतीय लोगों को ब्रिटिश सम्राज्य के प्रति जागृत करने का कार्य शुरू किया। महात्मा गांधी ने 1903 को "इंडियन ओपिनियन" निकला, जिसमें महात्मा गांधी ने पत्रकरिता के उदेश्यों को स्पष्ट करते हुए लिखा था-1 पत्रकारिता का पहला काम जनभावनाओं को समझना और उन्हे अभिव्यक्ति देना है।  2 पत्रकारिता का दूसरा उदेश्य लोगों मेंवंक्षित भावनाओं को जागृत करना है।3 पत्रकारिता का तीसरा उदेश्य निर्भिक तरीके से गडबडियों को उजागर करना है।महात्मा गांधी बहुत कम उम्र में ही समाचार पत्रों के लिये महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गए थे। समाचार पत्रों में लेखन के मध्यम से गंधीजी पुरे दक्षिन अफ्रिका में लोकप्रिय हो गये थे। गांधीजी ने आर्थिक आभाव और सरकारी दबाव में भी " इंडियन ओपिनियन" का प्रकाशन जारी रखा। गोपाल कृष्ण गोखले को 25 अप्रिल 1909 को लिखे पत्र में गाँधी जी ने इंडियन ओपिनियन के संकट में होने की बात लिखी है। उन्होने लिखा है की " इंडियन ओपिनियन" पर 2500 पौंड का कर्ज़ हो गया है, मगर मैं अपने संघर्ष के लिये इसका प्रकाशन जारी रखने को बाध्य हूँ। भारत लौटने पर गाँधी जी ने " बांबे क्रानिकल" और सत्याग्रही समाचार पत्र निकले। लेकिन ये समाचार पत्र जल्द ही बंद हो गये। इन समाचार पत्रों के बंद होने के बाद गाँधी जी ने  "नवजीवन" और "यंग इंडिया" नाम से दो समाचार पत्र सितंबर 1919 में निकला मगर ये समाचार पत्र भी उनके 1932 में गिरफ्तार होकर जेल जाने के बाद बंद हो गये। इसके बाद भी महात्मा गाँधी ने अपने पत्रकारिता जीवन को जारी रखते हुए, जेल से छूटने के बाद " हरिजन" नामक सप्ताहिक समाचार पत्र निकला, जिसका प्रकाशन 11 फरवरी 1933 से प्रारंभ होकर महात्मा गाँधी के जीवित रहने तक जारी रहा।महात्मा गाँधी समाचार पत्रों को किसी भी आंदोलन अथवा सत्याग्रह का आधार मानते थे। उन्होने कहा था की "मेरा ये मानना है की ऐसी कोई भी लड़ाई, जिसका आधार आत्मबल हो, अखबार की सहायता के बिना नहीं चलाई जा सकती है। उन्होने कहा की, अगर मैने अखबार के मध्यम से दक्षिण अफ्रीका में बसे भारतीयों को उनकी स्थिति ना समझाई होती और सारी दुनिया में फैले हुए भारतीयों को दक्षिण अफ्रीका में क्या हो रहा है, इसे " इंडियन ओपिनियन" के मध्यम से अवगत ना कराया होता तो मैं अपने उदेश्यों में सफल नहीं हो सकता था।महात्मा गाँधी ने पत्रकारिता के मध्यम से सूचना ही नहीं फैलाई बल्कि जनशिक्षण और जनमत निर्माण का कार्य भी किया। गाँधी जी की पत्रकारिता पराधीन भारत की आवाज थी, उन्होने समाचार पत्रों के मध्यम से अपनी अवाज को जन-जन तक पहुँचाया और अंग्रेज़ों के विरुद्ध जनजागरण का कार्य किया। महात्मा गाँधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि " इंडियन ओपिनियन" निकलने के पहले ही महीने में मुझे ये अहसास हो गया था कि पत्रकारिता का मुख्य उदेश्य सेवा करना होना चाहिये। समाचार पत्र, प्रेस एक बहुत बड़ी शक्ति है, लेकिन जिस तरह पानी को नियंत्रित ना किया जाये तो तबाही मच जाती है, उसी तरह अनियंत्रित कलम तबाही लाती है। गाँधी ने लिखा है कि उनका उदेश्य सेवा करना, और शिक्षा एवम् स्वाभिमान में वृद्धि करना है। " इंडियन ओपिनियन" के द्वारा वे भारतीयों के कष्टों को दूर करने और उन्हे सुनीति कि शिक्षा देने कि कोशिश करते है। उन्होने कहा है कि पत्रकारिता का लक्ष्य आजीविका कमाना नहीं होना चाहिये, बल्कि लोक-शिक्षा ही पत्रकारिता का मुख्य कार्य है। इसी कारण गाँधी जी  " इंडियन ओपिनियन" को समाचार पत्र ना बता कर, विचार पत्र बताते थे। इस प्रकार " इंडियन ओपिनियन" की बुनियाद गाँधी की अपराजेय राष्ट्रीयता, देशभक्ति और भारतीयता पर टिकी थी। उनकी सन 1909 में लिखी पुस्तक "  " यंग इंडिया" के प्रकाशन के संदर्भ में गांधी जी लिखते है की, अंग्रेजी में अखबार निकालना उनके लिए कोई प्रसन्नता की बात नहीं है, लेकिन वे इसे छोड नहीं सकते,क्योंकी  विदेशों में रह रहे लोग और सरकार में बैठे अंग्रेज, अंग्रेजी भाषा को ही समझते है, इसतरह सरकार में बैठे लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए अंग्रेजी में लिखना जरूरी है। मगर उनके " यंग इंडिया" में जीन विचारों और अदर्शों की बात लिखी जाती थी वही उनके हिन्दी पत्र " नवजीवन" में भी लिखी जाती थी। गांधी ऐसे समाचार पत्रों को " रष्ट्रवादी अखबार" कहते थे और अपनी पत्रकारिता को स्वदेश-धर्म ,जो उन्हे भारत माता की सेवा का अधिकार देता है। गांधी ने " हरिजन" का सम्पादन-प्रकाशन सिमित रूप में किया, क्योंकी ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाये गए प्रतिबंध को उन्होने स्वीकार कर लिया था कि वे हरिजन सेवा तक सिमित रहेंगे और राजनीतिक विषायक समाग्री से दूर रहेंगे।  "हिन्द स्वराज्य", गांधी के स्वराज्य दर्शन का प्रतिबिम्ब है, जिसके मूल में भारत का राष्ट्रहित और संस्कृतिक उत्कर्ष है। गांधी की यह रष्ट्रीयता ही पराधीन भारत का मूलाधर है। पराधीन भारत में पत्रकारिता का यही एकमात्र प्रतिमान हो सकता था। भारतीय पत्रकारिता के दौर में, गांधी कि पत्रकारिता को निश्चित तौर पर सरोकारीय पत्रकारिता कह सकते है, क्योंकी महात्मा गांधी कि पत्रकारिता निरन्तर आमजन के हितों को रष्ट्रहित से जोडने वाली रही थी।Copyright@ Manoranjan Kumar Tiwari   http://manoranjan234.blogspot.in/

Friday, September 12, 2014

इश्क
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मिला नहीं कोई अभी तक,
जिससे इश्क करूँ मैं चोरी चोरी,
मिलूँ उससे छुप-छुप कर,
छुप-छुप कर ही मुस्काऊँ,
बातें करने को उससे,
तरस-तरस सा जाऊँ,
बात कर भी ले वो मुझसे तो,
ज़ुबां से बातें निकले कोरी-कोरी,
मिला नहीं कोई अभी तक,
जिससे इश्क करूँ मैं चोरी-चोरी।
सोचूँ उसको, उसकी बातें,
कट जाये आँखों में रातें,
तन-मन में एक मदहोशी हो,
जीवन में एक गर्मजोशी हो,
रोज मिले, कुछ रोज कहें,
कुछ कहने को बाकी भी रहे,
कोई नाज़ुक अंग छू जाये उसका,
भक्क चेहरा लाल हो जाये,
मैं दूर खड़ा डरा-सहमा,
वो धीरे से मुस्काये,
आँखों में अनन्त आकाश हो,
और वो हरकदम मेरे पास हो,
हर रोज हो प्यार थोरी-थोरी,
मिला नहीं अभी तक कोई,
जिससे इश्क करूँ मैं चोरी-चोरी।............................मनोरंजन
 http://manoranjan234.blogspot.in/

Thursday, September 11, 2014

एक बार फिर जन्म लेना चाहता हूँ 
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एक बार फिर जन्म लेना चाहता हूँ,
और मिलना चाहता हूँ तुमसे,
मगर अंतरद्वंदों में उलझा किसी कवि की तरह नहीं,
बल्कि उस तरह मिलना चाहता हूँ,
जैसे दुष्यंत मिला था, शकुन्तला से,
नैसर्गिक भावनाओं और इच्छाओं के साथ,
नहीं रोकना चाहता,
अपने भावनाओं के आवेग को,
दुनियादारी की खातीर,
ये आवेग,
जो वर्जनाओं, मर्यादाओं,और परंपराओं से बने दीवार को,
तोड़ देना चाहती है,
और तोड़ती भी है, मगर सहजता से नहीं,
बल्कि एक विध्वंस का रूप लेकर,
डूबो देती है अपने आस-पास फैले जन-जीवन को,
सब तरफ निर्जनता और वीराना पसर जाता है,
जैसे पसर गया है घना अंधेरा मेरे इस जीवन में,
पर इस बार जो जन्म लिया तो,
बहना चाहता हूँ मैं, तुममे,
निर्बाध्य, निर्मल धारा बन कर,
पोषित करना चाहता हूँ, तुम्हारे किनारों का,
अपने उपजायूपन से,
सिंचना चाहता हूँ, तुम्हारे जीवन को,
अपने मधुर जलधारा से,
ये अथाह जलधारा,
जो इस जीवन में यूं ही बर्बाद हो गयी,
लोगों के जीवन में तबाहियाँ, दुःख और शोक लाने में,
अब सोचता हूँ, मूकदर्शक बने,
स्वयम् में अथाह मगर अकेला हूँ,
कोई नहीं आता मेरे पास,
सिवा कुछ मांसभक्षि पंक्षियों के,
कुछ मृतप्राय तैरते जन्तुओं के,
मेरी जलधाराएँ, अभिशाप बन गयी है,
मेरे ही अपने लोगों के लिये,
इसलिये मैं दुबारा जन्म लेना चाहता हूँ,
ताकि फैला सकूं खुशियाँ चहुँओर,
भर सकूं सुखद एहसास सभी लोगों के मन में,
जो बसते है मेरे तट के किनारे।......................................मनोरंजन

Thursday, September 4, 2014

तुम्हारा पत्र
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जीवन से जुड़ी कई बातों से मुख़ातिब,
अनवरत और अंतहीन बातों को तुम्‍हे बताने का,
सिलसिला अब पत्र के मध्यम से थम गया है,
पर अब भी सहेज रखा है मैने,
मेरे कई पन्नों के पत्रों के जबाब में,
आया तुम्हरा कुछ पंक्तियों में,
सिमित औपचारिक सा पत्र,
बार-बार पढ़ता हूँ, इसे अब भी,
ढूंढता हूँ उस शब्द को,
जो मेरे दिल को तसल्ली दिला सके,
की कभी हम दोनों,
एक-दूसरे के बेहद करीब थे,
जीवन का ये कैसा भ्रम है की,
हम जिस उम्र में होते है,
हमें लगता है की, हम समझदार है,
पर सच ऐसा नहीं होता,
कितनी बेवकूफियां, नादानियाँ,
लिपटी होती थी मेरे उन पत्रों के पुलिंदे में,
जिसे तुम तक पहुंचने के लिये,
उन कड़की के दिनों में,
मेरे जेब में शेष बचे बीस रुपयों में से,
पांच रुपया का डाक टिकट खरीद लेता था,
बिना इसकी परवाह किये की,
कल से कैसे रहूँगा, इस प्रदेश में,
और मुझे इस बात का भी कहाँ इल्म था,
की मेरे पत्रों का कैसा असर होता है तुम पर।...................मनोरंजन
 http://manoranjan234.blogspot.in/

Tuesday, September 2, 2014

कितने अच्छे लोग होते है वे,
जो सिर्फ दौलत, तरक्की और
अवसरों के बारे में सोचते है,
दिल और दिल के एहसासों ने तो,
हमेशा मिट्टी खराब ही किया है।
कहीं का नहीं रहता वो आदमी,
जिसे दिल से सोचने की लत लग जाती है,
भावनाओं, एहसासों और
जज्बातों की बात करने वाले लोग,
अक्सर कमजोर और दयनीय होते है,
जीवन का बिल्कुल सीधा सा फंडा है,
जो चाहो, वो हासील करो, किसी भी तरह,
क्योंकि किसी चीज़ को शिद्धत से चाहने के बाद,
अगर आप हासील नहीं करते,
तो अपने जीवन को दुख, दर्द और आँसुओं में,
डूबाने के लिये सिर्फ आप ही जिम्मेवार है,
आप कमजोर है, आपमें हिम्मत नहीं,
और आप कायर भी है।................मनोरंजन