एक बार फिर जन्म लेना चाहता हूँ
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एक बार फिर जन्म लेना चाहता हूँ,
और मिलना चाहता हूँ तुमसे,
मगर अंतरद्वंदों में उलझा किसी कवि की तरह नहीं,
बल्कि उस तरह मिलना चाहता हूँ,
जैसे दुष्यंत मिला था, शकुन्तला से,
नैसर्गिक भावनाओं और इच्छाओं के साथ,
नहीं रोकना चाहता,
अपने भावनाओं के आवेग को,
दुनियादारी की खातीर,
ये आवेग,
जो वर्जनाओं, मर्यादाओं,और परंपराओं से बने दीवार को,
तोड़ देना चाहती है,
और तोड़ती भी है, मगर सहजता से नहीं,
बल्कि एक विध्वंस का रूप लेकर,
डूबो देती है अपने आस-पास फैले जन-जीवन को,
सब तरफ निर्जनता और वीराना पसर जाता है,
जैसे पसर गया है घना अंधेरा मेरे इस जीवन में,
पर इस बार जो जन्म लिया तो,
बहना चाहता हूँ मैं, तुममे,
निर्बाध्य, निर्मल धारा बन कर,
पोषित करना चाहता हूँ, तुम्हारे किनारों का,
अपने उपजायूपन से,
सिंचना चाहता हूँ, तुम्हारे जीवन को,
अपने मधुर जलधारा से,
ये अथाह जलधारा,
जो इस जीवन में यूं ही बर्बाद हो गयी,
लोगों के जीवन में तबाहियाँ, दुःख और शोक लाने में,
अब सोचता हूँ, मूकदर्शक बने,
स्वयम् में अथाह मगर अकेला हूँ,
कोई नहीं आता मेरे पास,
सिवा कुछ मांसभक्षि पंक्षियों के,
कुछ मृतप्राय तैरते जन्तुओं के,
मेरी जलधाराएँ, अभिशाप बन गयी है,
मेरे ही अपने लोगों के लिये,
इसलिये मैं दुबारा जन्म लेना चाहता हूँ,
ताकि फैला सकूं खुशियाँ चहुँओर,
भर सकूं सुखद एहसास सभी लोगों के मन में,
जो बसते है मेरे तट के किनारे।......................................मनोरंजन
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एक बार फिर जन्म लेना चाहता हूँ,
और मिलना चाहता हूँ तुमसे,
मगर अंतरद्वंदों में उलझा किसी कवि की तरह नहीं,
बल्कि उस तरह मिलना चाहता हूँ,
जैसे दुष्यंत मिला था, शकुन्तला से,
नैसर्गिक भावनाओं और इच्छाओं के साथ,
नहीं रोकना चाहता,
अपने भावनाओं के आवेग को,
दुनियादारी की खातीर,
ये आवेग,
जो वर्जनाओं, मर्यादाओं,और परंपराओं से बने दीवार को,
तोड़ देना चाहती है,
और तोड़ती भी है, मगर सहजता से नहीं,
बल्कि एक विध्वंस का रूप लेकर,
डूबो देती है अपने आस-पास फैले जन-जीवन को,
सब तरफ निर्जनता और वीराना पसर जाता है,
जैसे पसर गया है घना अंधेरा मेरे इस जीवन में,
पर इस बार जो जन्म लिया तो,
बहना चाहता हूँ मैं, तुममे,
निर्बाध्य, निर्मल धारा बन कर,
पोषित करना चाहता हूँ, तुम्हारे किनारों का,
अपने उपजायूपन से,
सिंचना चाहता हूँ, तुम्हारे जीवन को,
अपने मधुर जलधारा से,
ये अथाह जलधारा,
जो इस जीवन में यूं ही बर्बाद हो गयी,
लोगों के जीवन में तबाहियाँ, दुःख और शोक लाने में,
अब सोचता हूँ, मूकदर्शक बने,
स्वयम् में अथाह मगर अकेला हूँ,
कोई नहीं आता मेरे पास,
सिवा कुछ मांसभक्षि पंक्षियों के,
कुछ मृतप्राय तैरते जन्तुओं के,
मेरी जलधाराएँ, अभिशाप बन गयी है,
मेरे ही अपने लोगों के लिये,
इसलिये मैं दुबारा जन्म लेना चाहता हूँ,
ताकि फैला सकूं खुशियाँ चहुँओर,
भर सकूं सुखद एहसास सभी लोगों के मन में,
जो बसते है मेरे तट के किनारे।......................................मनोरंजन
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