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Saturday, September 20, 2014

ख्वाबों में भी शर्माते हो तुम
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ख्वाबों में भी शर्माते हो तुम,
निंद से बोझिल मेरी आँखों पर,
लोटते यादों का करवां,
वहीं पलकों के झुरमुट से,
झांक कर छुप जाते हो तुम,
ख्वाबों में भी शर्माते हो तुम।
व्याकुल हो, आँखों को मलता हूँ,
ढुंढता हूँ तुम्हे इधर-उधर तो देखता हूँ,
दरवाजे के दरारों से झंकते हुए मुस्कुरते हो तुम,
ख्वाबों में भी शर्माते हो तुम।
मैं पसीने से तर-बतर,
भारी दुपहरी में कहीं जाने को उद्दत,
लम्बा-लंबा डग भरते,
अपने गाँव के पीछे वाले बगीचे से गुजरता हूँ,
तभी पाता हूँ की,
वक्त के हर सवाल से अनजान,
पेड़ के ओट में खडी आज भी खिलखिलाते हो तुम,
ख्वाबों में भी शर्माते हो तुम। 
नहीं खर्चना चाहता मैं,
अपने यादों के संजोये खजाने को,
बंद कर लेता हूँ अपनी आँखों को,
ताकी छुपा कर रखे रहूँ तुम्हे,
अपने पलकों के पिछे,
पर अंासुओं के बुंदों संग,
बह कर बिखर जाते हो तुम,
ख्वाबों में भी शर्माते हो तुम।................मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/


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