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Friday, September 19, 2014

आज-कल महात्मा गाँधी जी को पढ़ रहा हूँ, महात्मा गाँधी का पत्रकारिता के क्षेत्र में योगदान पर एक लेख लिखा है।
आपलोग के नज़र करना चाहता हूँ, देखता हूँ, की आपको पसंद आती है या नहीं।
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महात्मा गाँधी और पत्रकारिता के लिये किये गये उनके कार्य
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महात्मा गाँधी का व्यक्तित्व बहु-आयामी था। वे ऐसे व्यक्ति थे जिन्होने राजनीति के नये मानक निर्धारित किये और जीवन भर उन मनकों पर डटे रहे। नागरिक स्वतंत्रता के लिये उनकी प्रतिबद्धता और जुनून की शुरुआत काफी पहले दक्षिण अफ्रीका में ही हो गयी थी। लेकिन उनके लिये नागरिक स्वतंत्रता के मायने अलग थे। वे उन रूढ़िवादी विचारों से भी देश और समाज को मुक्त करना चाहते थे, जिनके चंगुल में भारत देश सदियों से जकड़ा था। इसके लिये उन्होने महिलाओं की सामाजिक मुक्ति, जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव,छुआ-छूत के लिये एक बहुत संघर्ष शील लड़ाई लड़ी, जो उनके भारत देश के आजादी के लिये किये गये आंदोलनों से किसी भी तरह कमतर नहीं था। महात्मा गाँधी ने अपने मनकों को जन-जन तक पहुंचने के लिये पत्रकारिता का सहारा लिया। गाँधी के अनुसार, उनकी पत्रकारिता, पत्रकारिता के लिये नहीं है,बल्कि उनके जीवन का जो ध्येय है, उसके सहायक के रूप में है। महात्मा गाँधी ने दशकों तक कई समाचार पत्रों में लिखते रहे, कई समाचार पत्रों का संपादन किया। महात्मा गाँधी ने जीन समाचार पत्रों का प्रकाशन अथवा संपादन किया, वे पत्र अपने समय के सर्वाधिक लोकप्रिय पत्रों में माने गये। बहुत कम लोग महात्मा गाँधी के एक श्रेष्ट पत्रकार होने के बारे में पता है मगर  सही मायने में जब भारत देश में पत्रकारिता अपने शैशव काल में थी तब  महात्मा गाँधी ने पत्रकारिता के नैतिक अवधारणा प्रस्तुत की थी। महात्मा गाँघी ने पत्रकारिता के मध्यम से सरोकारीय चेतना से जनमानस को लाभान्वित किया। महात्मा गाँधी, भारतीय पत्रकारिता के इतिहास के उन शिल्पी पुरुखों में से एक है जिन्होने पत्रकारिता में सरोकार भरे, संघर्षों का जज्बा पैदा किया, मर्यादा की लक्ष्मण रेखा खींची एवम् पत्रकारिता के अनेक मानी, मूल्य गढ़े। सत्य, अहिंसा,असहयोग और सविनय अवज्ञा को शास्त्र बना कर स्वाधीनता का संग्राम एक विलक्षण तरीके से लड़ने वाले गाँधी जी की पत्रकारिता के क्षेत्र में किये गये उनके कार्य, उनके व्यक्तित्व के आगे ओझल हो जाते है। एक प्रमाणिक तथ्य यह है की महात्मा गांधी के सभी अन्दोलनों और वैचारिक अनुष्ठानों के सफलता में उनके पत्रकारीय पक्ष का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।  2 अक्तूबर 1869 को गुजरात के पोरबन्दर में जन्में मोहनदास करमचंद गांधी ने अपनी पत्रकरिता की श्ुरुआत सन् 1888 में लंदन में ही कर डी थी। गंधीजी ने पत्रकारिता का उपयोग दो तरह से किया-इंगलैंड में प्रवास कल ( जुलाई 1888- जून 1891) और दक्षिन अफ्रिका में देशी-विदेशी समाचार पत्रों के मध्यम से गांधी जी ने अपने कार्यों और विचारों को पाठकों तक पहुंचाने का कार्य किया। महात्मा गांधी ने दक्षिन अफ्रिका से लेकर भारत तक में भारत और भारतियों के अधिकारों के लिये अवाज उठाई। महात्मा गांधी जब लंदन पहुँचे, तब वे समाचार पत्रों के दुनिया से ज्यादा परिचित नहीं थे। दलपतराम शुक्ला जी के कहने पर  उन्होने प्रत‍िद‍िन एक घंटा का समय विभिन्न समाचार पत्रों को पढने में लगाना शुरू किया। गांधी जी अपने माता के प्रभाव के कारण अन्नहारी थे, वे इंगलैंड में अन्नहार अन्दोलन से भी जुडे थे। अन्नहार को लेकर गंधीजी ने ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अखबार           " वेजिटेरियन" में लेख लिखना शुरू किया। ब्रिटेन के बाद अफ्रिका पहुँचने पर महात्मा गांधी जी ने      " इंडियन ओपिनियन" समाचार पत्र का सम्पादन किया। उन्होने "इंडियन ओपिनियन" के  मध्यम से दक्षिन अफ्रिकी और भरतीय लोगों को ब्रिटिश सम्राज्य के प्रति जागृत करने का कार्य शुरू किया। महात्मा गांधी ने 1903 को "इंडियन ओपिनियन" निकला, जिसमें महात्मा गांधी ने पत्रकरिता के उदेश्यों को स्पष्ट करते हुए लिखा था-1 पत्रकारिता का पहला काम जनभावनाओं को समझना और उन्हे अभिव्यक्ति देना है।  2 पत्रकारिता का दूसरा उदेश्य लोगों मेंवंक्षित भावनाओं को जागृत करना है।3 पत्रकारिता का तीसरा उदेश्य निर्भिक तरीके से गडबडियों को उजागर करना है।महात्मा गांधी बहुत कम उम्र में ही समाचार पत्रों के लिये महत्वपूर्ण व्यक्ति बन गए थे। समाचार पत्रों में लेखन के मध्यम से गंधीजी पुरे दक्षिन अफ्रिका में लोकप्रिय हो गये थे। गांधीजी ने आर्थिक आभाव और सरकारी दबाव में भी " इंडियन ओपिनियन" का प्रकाशन जारी रखा। गोपाल कृष्ण गोखले को 25 अप्रिल 1909 को लिखे पत्र में गाँधी जी ने इंडियन ओपिनियन के संकट में होने की बात लिखी है। उन्होने लिखा है की " इंडियन ओपिनियन" पर 2500 पौंड का कर्ज़ हो गया है, मगर मैं अपने संघर्ष के लिये इसका प्रकाशन जारी रखने को बाध्य हूँ। भारत लौटने पर गाँधी जी ने " बांबे क्रानिकल" और सत्याग्रही समाचार पत्र निकले। लेकिन ये समाचार पत्र जल्द ही बंद हो गये। इन समाचार पत्रों के बंद होने के बाद गाँधी जी ने  "नवजीवन" और "यंग इंडिया" नाम से दो समाचार पत्र सितंबर 1919 में निकला मगर ये समाचार पत्र भी उनके 1932 में गिरफ्तार होकर जेल जाने के बाद बंद हो गये। इसके बाद भी महात्मा गाँधी ने अपने पत्रकारिता जीवन को जारी रखते हुए, जेल से छूटने के बाद " हरिजन" नामक सप्ताहिक समाचार पत्र निकला, जिसका प्रकाशन 11 फरवरी 1933 से प्रारंभ होकर महात्मा गाँधी के जीवित रहने तक जारी रहा।महात्मा गाँधी समाचार पत्रों को किसी भी आंदोलन अथवा सत्याग्रह का आधार मानते थे। उन्होने कहा था की "मेरा ये मानना है की ऐसी कोई भी लड़ाई, जिसका आधार आत्मबल हो, अखबार की सहायता के बिना नहीं चलाई जा सकती है। उन्होने कहा की, अगर मैने अखबार के मध्यम से दक्षिण अफ्रीका में बसे भारतीयों को उनकी स्थिति ना समझाई होती और सारी दुनिया में फैले हुए भारतीयों को दक्षिण अफ्रीका में क्या हो रहा है, इसे " इंडियन ओपिनियन" के मध्यम से अवगत ना कराया होता तो मैं अपने उदेश्यों में सफल नहीं हो सकता था।महात्मा गाँधी ने पत्रकारिता के मध्यम से सूचना ही नहीं फैलाई बल्कि जनशिक्षण और जनमत निर्माण का कार्य भी किया। गाँधी जी की पत्रकारिता पराधीन भारत की आवाज थी, उन्होने समाचार पत्रों के मध्यम से अपनी अवाज को जन-जन तक पहुँचाया और अंग्रेज़ों के विरुद्ध जनजागरण का कार्य किया। महात्मा गाँधी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि " इंडियन ओपिनियन" निकलने के पहले ही महीने में मुझे ये अहसास हो गया था कि पत्रकारिता का मुख्य उदेश्य सेवा करना होना चाहिये। समाचार पत्र, प्रेस एक बहुत बड़ी शक्ति है, लेकिन जिस तरह पानी को नियंत्रित ना किया जाये तो तबाही मच जाती है, उसी तरह अनियंत्रित कलम तबाही लाती है। गाँधी ने लिखा है कि उनका उदेश्य सेवा करना, और शिक्षा एवम् स्वाभिमान में वृद्धि करना है। " इंडियन ओपिनियन" के द्वारा वे भारतीयों के कष्टों को दूर करने और उन्हे सुनीति कि शिक्षा देने कि कोशिश करते है। उन्होने कहा है कि पत्रकारिता का लक्ष्य आजीविका कमाना नहीं होना चाहिये, बल्कि लोक-शिक्षा ही पत्रकारिता का मुख्य कार्य है। इसी कारण गाँधी जी  " इंडियन ओपिनियन" को समाचार पत्र ना बता कर, विचार पत्र बताते थे। इस प्रकार " इंडियन ओपिनियन" की बुनियाद गाँधी की अपराजेय राष्ट्रीयता, देशभक्ति और भारतीयता पर टिकी थी। उनकी सन 1909 में लिखी पुस्तक "  " यंग इंडिया" के प्रकाशन के संदर्भ में गांधी जी लिखते है की, अंग्रेजी में अखबार निकालना उनके लिए कोई प्रसन्नता की बात नहीं है, लेकिन वे इसे छोड नहीं सकते,क्योंकी  विदेशों में रह रहे लोग और सरकार में बैठे अंग्रेज, अंग्रेजी भाषा को ही समझते है, इसतरह सरकार में बैठे लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए अंग्रेजी में लिखना जरूरी है। मगर उनके " यंग इंडिया" में जीन विचारों और अदर्शों की बात लिखी जाती थी वही उनके हिन्दी पत्र " नवजीवन" में भी लिखी जाती थी। गांधी ऐसे समाचार पत्रों को " रष्ट्रवादी अखबार" कहते थे और अपनी पत्रकारिता को स्वदेश-धर्म ,जो उन्हे भारत माता की सेवा का अधिकार देता है। गांधी ने " हरिजन" का सम्पादन-प्रकाशन सिमित रूप में किया, क्योंकी ब्रिटिश सरकार द्वारा लगाये गए प्रतिबंध को उन्होने स्वीकार कर लिया था कि वे हरिजन सेवा तक सिमित रहेंगे और राजनीतिक विषायक समाग्री से दूर रहेंगे।  "हिन्द स्वराज्य", गांधी के स्वराज्य दर्शन का प्रतिबिम्ब है, जिसके मूल में भारत का राष्ट्रहित और संस्कृतिक उत्कर्ष है। गांधी की यह रष्ट्रीयता ही पराधीन भारत का मूलाधर है। पराधीन भारत में पत्रकारिता का यही एकमात्र प्रतिमान हो सकता था। भारतीय पत्रकारिता के दौर में, गांधी कि पत्रकारिता को निश्चित तौर पर सरोकारीय पत्रकारिता कह सकते है, क्योंकी महात्मा गांधी कि पत्रकारिता निरन्तर आमजन के हितों को रष्ट्रहित से जोडने वाली रही थी।Copyright@ Manoranjan Kumar Tiwari   http://manoranjan234.blogspot.in/

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