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Wednesday, September 24, 2014

यादों के झरोखें
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अब शायद जिन्दगी में,
होगी ना फुरसत इतनी,
की तुम्हे देख सकूँ,
यादों के झरोखों से,
नज़र धूमिल सी होने लगी है,
की अब ख्वाब नहीं आते इन आँखों में,
पलकें बोझिल सी रहती है,
की अब शायद इन पलकों पर,
ना तैर सकेंगें सतरंगी सपने,
जो देखे थे हमने साथ-साथ,
उन अभावों से जर्जर वक्त के अगोश में,
वे जर्जर वक्त भी आज से कितने बेहतर थे,
कुछ नहीं था हमारे पास सिवा तुम्हारे,
आज हम दोनों ना जाने कितने लोगों के,
क्या-क्या लगते है,
सिवा एक-दूसरे के,
अब शायद लौट ना सकेंगे वे वक्त कभी,
जब हम दोनों थे सिर्फ एक-दूसरे के।......................मनोरंजन

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