तुम्हारी चाहत
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जाना तो तुम्हे था ही,
बस एक बहाने के लिये रुके रहे अब तक,
बचा ही नहीं एक कतरा भी मैं,
तुम्हारे अंदर,
स्वार्थ और विरक्ति,
अवाज़ में,
घर्षण पैदा कर देते है,
छिटक कर दूर चली जाती है,
मन के अंदर की सारी कोमल भावनायें,
सब ठीक है,
जताने की कोशिश तो बहुत हुई,
पर लब्जों में तख़्ती,
तुम्हारे मुक्त होने की चाह को,
प्रखर कर देते थे,
अब तुम चले गये हो उस राह पर,
जहाँ मिल ना सके,
हम-तुम कभी...........
पर मैं ऐसा नहीं चाहता था,
मैं चाहता था की,
मिले हम, कभी, कहीं,
किसी राह में वर्षों बाद ही सही,
और जब मिलें तो हमारी नजरें झुकें नहीं,
चमक आ जाये हमारी आँखों में,
जैसे ढूंढ रहे थे हम दोनों एक- दूसरे को सदियों से..................manoranjan
http://manoranjan234.blogspot.in/
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