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Tuesday, December 15, 2015

प्यास

जी लेने दो मुझे आज,
कि बहुत दिनों से जीने की भुख लगी है,
मर रहे थे मेरे मन के सारे सुक्ष्म एहसास,
उनके लाशों को दफ़न करने में व्यस्त बहुत था,
फिर खो गया किसी मायावी रोशनी के चकाचौंध में,
रास्ता भटक गया था,
पहुँच गया था एक ऐसे देश में,
जहाँ झूठ हाथ  में लाउडस्पीकर लिए जोर-जोर से  चीख रहा था,
सच बोलने वालों ने अपने कान पर हाथ दबा लिए थे इसकदर,
कि  उनके मुँह  से सच निकलने के वजाय  कराहें निकल रही थी,
सब लाउडस्पीकर वाले को ही सच का मसीहा मान बैठे थे,
मानवीय संवेदनाओं, समाजिक मूल्यों, राजनैतिक गरिमा को,
लोग पैरों तले कुचलते दौड़े जा रहे थे,एक ऐसी जगह,
भव्य सजावटों वाले मैदान में, आलिशान शानो-शौकत से,
ढोंग, पाखंडों,और धूर्तों के हाथों,
नैतिकता, मर्यादा और आदर्शों पर कोड़े बरसाए जा रहे थे,
लोग ख़ुशी में चिल्ला रहे थे,
अपने बच्चों के कानों में कोड़े बरसाने वालों की,
 बीरता, शौर्य और सफलता के किस्से दुहरा रहे थे,
और बच्चे अपने मसीहों की तरह बनने के ख्वाबों में गुम हो रहे थे,
लाओ, वो मेरा आखिरी कनस्तर,
जिसमें जीने के लिए कुछ टुकड़े परिश्रम के रखे थे,
जी लेने दो मुझे आज,
कि बहुत दिनों से जीने की भुख लगी है। @ मनोरंजन 

Friday, November 27, 2015

काक्की

काक्की
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अँगुलियों पर जोड़ कर बता देती है वो,
की अभी अमावस कितने दिन बाद है,
पूर्णिमा, एकादशी और चौथ,
सब उसके अँगुलियों पर गिने जाते है,
सर्दियों में गुनगुना धूप,
सिर्फ उसके आँगन में ही नहीं उतरता,
पर ना जाने क्यों मोहल्ले भर की लड़कियों का,
हुजूम जुटता है उसके यहाँ सर्दियों में धूप निकलने के बाद,
वहाँ आज भी लड़कियाँ फेसबुक, फोन,और टीवी की बातें नहीं करती,
बल्कि जितनी लड़कियाँ, उतनी बातों का खज़ाना होता है उनके पास,
लड़कियाँ सिखती है, स्वेटर में फंदा डालना,
सलाई को घुमाकर सुन्दर फूल बनाना,
खूब झक सफ़ेद चादर पर धागों से कढाई करना,
कई लड़कियां सिखती है रंगों से छपाई करना,
काक्की गुणों की खान है,
चुहल करती किसी लड़की के पीठ पर धौल जमाती कक्की कहती है,
हमारे समय में लड़कियाँ सब गुन सिखती थी ससुराल जाने से पहले,
तुम्हारी तरह नहीं की चूल्हे में आँच भी ना जोरने आए,
और चल पड़ता है बातों का एक लम्बा सिलसिला,
अनेकानेक लड़कियों के बारें में जिनके ससुराल में क्या-क्या हुआ था,
और वहाँ बैठी लड़कियों के भावी ससुराल की रूप-रेखा तैयार होने लगता है,
तभी कोई लड़की बोलती है,
आरे कक्की अब हमें चूल्हा झोंकने की जरुरत नहीं,
मेरे बाउ जी, मेरा ब्याह शहर में करने वाले है,
वहाँ  गैस स्टोव पर बनता है खाना,
अचार के मर्तबान को हिलाती काक्की कहती है,
अपने घर को सवाँरने की कला को सबको सिखना चाहिए बेटी,
ससुराल शहर में हो की गाँव में,
ससुराल तो ससुराल ही होता है। @मनोरंजन

Thursday, July 9, 2015

बावरा मन(गीत)

बावरा मन(गीत)
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बावरा मन,
सुन बावरे,
ढूंढता है किसे, साँझ-सकेरे,
बावरा मन..........सुन बावरे....
कली, तरुणाई की कुम्भला गई,
भटकते ही भटकते, दोपहर भी आ गई,
झुलस गई पंखुड़ियाँ, नींद से अब जाग रे,
मन बावरे.....
बावरा मन, सुन बावरे।
मिला जो राह में पत्थर,
वो पत्थर पारस हो जाता,
फेंका ना जो तुमने,
तो तेरा भी एक घर होता,
बावरा मन, सुन बावरे............
ढूं ढ़ ता है किसे, साँझ-सकेरे, बावरा मन.......सुन बावरे।@ मनोरंजन

Wednesday, July 8, 2015

परवरिस (लघु-कथा)

परवरिस (लघु-कथा)
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बहुत देर से नन्ही आरोही अपने पापा से बारिस में खेलने की ज़िद कर रही थी,
उसके पापा उसे समझते हुए बोले "नहीं बेटा, बारिस में खेलेंगे तो हम बिमार पड़ जायेंगे"
आरोही बोली " अगर बिमार पड़ जायेंगे तो टैबलेट ले लेंगे", माँ भी तो बिमार पड़ती है,
तो वह टैबलेट लेकर सो जाती है, और फिर अगले दिन ठीक हो जाती है।
पिता को समझ नहीं आ रहा था की वह अपनी बेटी को कैसे समझाए की, 
उन्हें बिमार पड़ने को इज़ाज़त नहीं है, क्योंकि बिमार पड़ कर एक दिन घर बैठने का मतलब है,
महीने के आखिर में तीन दिन भुखा सोना पड़ेगा। 
फिर पापा बोले " देखो बेटा जब हम बिमार पड़ते है तो काफी कमज़ोर हो जाते है, 
जैसे माँ कई दिनों तक बाहर घुमने नहीं जा पाती है, तुम भी अगर बिमार पड़ोगी तो पार्क में घुमने कैसे जाओगी?
चलो ऐसा करते है की तुम अपना कागज़ का नाव बनाओ, हम बिना बारिस में भींगे, अपना नाव चलाएँगे। 
यह सुन कर नन्ही आरोही खुश हो गई, और दौड़ती हुई जाकर कागज का नाव बनाने लगी। @ मनोरंजन

रामराज्य नहीं जंगल राज चाहिए

रामराज्य नहीं जंगल राज चाहिए
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जंगल को साफ  कर शहर बसाये जा रहे है,
और शहर, जंगल बनते जा रहे है,
जंगल में फिर भी एक रिवायत थी,
वहाँ  के बाशिंदे सिर्फ अपना पेट भरने के लिए आखेट करते थे,
पर इस जंगल के बाशिंदे जिसे हम सभ्य और शहरी कहते है,
अपनी कभी न ख़त्म होने वाली प्यास को बुझाने के लिए आखेट करते है,
उस जंगल में कम से कम उन्मुक्तता तो थी,
चैन-ओ -सुकून  और बेफिक्र हंसी तो थी,
इस जंगल ने तो छीन लिया हमसे हँसने का हुनर,
उन्मुक्तता, बेफिक्री चैन-ओ-सुकून,
सब गिरबी है, इस जंगल के जानवरों के पास,
हवाएँ तक कैद है जिनके पास,
उनसे अपनी रिहाई की क्या उम्मीद रखें?
सरकारें रामराज्य लाने की बातें करती है,
और हमें हवा-पानी से भी महरूम किए  जा रही है,
क्या हासिल होगा रामराज्य पाकर भी,
ये शहर जो जंगल बनाते जा रहा है,
इसके जानवर और ताकतवर हो जाएँगे,
और हम अपनी साँसों  के लिए भी कीमत चुकाएंगे,
अब तो ये निष्कर्ष निकालना होगा,
हमें रामराज्य नहीं, जंगलराज चाहिए। @ मनोरंजन


Friday, July 3, 2015

अज्ञानता में आनंद

अज्ञानता में आनंद
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रेत का घर बना रहे बच्चें,
उसके अंजाम से बेख़बर होते है,
या फिर जानते हुए भी की एक चोट में ढह जाएगा,
फिर भी पूरी तत्लिनता से सवांरने में लगे होते है उस रेत के घर को,
अज्ञानता में आनंद होता है,
प्रेम होता है, समर्पण होता है और लगन होता है,
देखो मैं नहीं जानना चाहता सब कुछ तुम्हारे बारे में,
बस निरंतर तुम्हे जानने की जुस्तजू बनाए रखना चाहता हूँ,
और अंजाम से भी अनभिज्ञ ही रहने दो मुझे,
संवारने दो हमारे रिश्ते के रेत महल को,
और तुम भी खड़े रहो यहीं,
देखो कितना खुबसूरत घर है अपना,
डरो मत उन लहरों से,
वे वापस चली जाएँगी।@मनोरंजन

हौसला

शीर्षक- हौसला
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यूँ तो गाँव के लोग बहुत खुल कर हँसने, बोलने और जीने के लिए जाने जाते है, पर उसी गाँव में कुछ ऐसे लोग भी होते है जिनके चेहरे पर मुस्कुराहट बमुश्किल ही आ पाती है।जानार्दन पाल ऐसे ही सीरत का आदमी है। उसे बचपन से देखता आ रहा हूँ, कभी उसे मुस्कुराते हुए ना देखा। गरीबी, लचारी और स्वाभिमान ये सब मिल कर शायद किसी भी शख्स के चेहरे की मुस्कराहट छीन सकते है। जनार्दन बहुत गरीब है, पर कभी सुनने में नहीं आया की उसने किसी से कुछ माँगा हो या चुराया हो। जवानी के दिनों में उसके एक हूनर की सर्वत्र चर्चा होती थी, वह आल्हा-उदल की कहानी को ढोलक पर थाप देकर इतने रोमांचक तरीके से गाता था की सुनने वालों में सचमुच वीररस हिलोरें मरने लगता था। तब वह जवान था, मगर तीन कुँवारी बहनों की शादी के जिम्मेवारी के एहसास ने उसे मूक बना दिया था। वह पुरे दिन मजदूरी करता फिर अपने बकरियों के लिए चारा लाता और आठ-नौ बजे( जब गाँव के बहुत सारे लोग सोने लगते) गाँव के बाहर, एक बांस और फ़ूस के बने झोपड़ी में अपना ढोलक निकाल कर शुरू करता था आल्हा-उदल का गान। गाँव के काफी लोग जिन्हें संगीत से प्यार था आ जाते थे। मगर इस गायन से उसको कुछ भी प्राप्त नहीं होता था न वह किसी से कुछ माँगता था ना कोई उसे कुछ देता था। एक बार बनारस से एक प्रोफ़ेसर साहब आए थे, जब उन्होंने उसे गाते हुए सुना और ढोलक पर पड़ कर जादू कर देने वाली अँगुलियों का कमल देखे तो आश्चर्य का ठिकाना ना रहा। पुछे, मेरे साथ बनारस चलोगे? जनार्दन को जैसे मनचाही मुराद पूरी हो गई, तुरंत तैयार हो गया। जनार्दन ने तमाम मुसीबतों के बाबजूद जितनी निष्ठा से, लगन से और परिश्रम से अपनी कला से प्यार करते रहा था, उसी कला ने उसकी जिंदगी बदल दी। काफी अरसे के बाद मिला मुझे। घर- परिवार का हाल पूछा फिर बताया तीन लड़कियाँ है उसकी और उन लड़कियों से मिल कर मुझे ऐसा एहसास हुआ की जनार्दन ने अपनी बेटियों में भी वही हौसला और लगन भर दिया है जो उसमें थी। जनार्दन की तीनों बेटियां स्कुल से आने के बाद घर का काम, मवेशियों को चारा देना और खेत-खलिहान के सारे काम करने के बाद देर रात तक लालटेन की रोशनी में पढ़ती हुई दिख जाती है।@मनोरंजन

थके हुए लोग

थके हुए लोग
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जीवन से हारे हुए,
थके हुए कुछ लोग,
सिमटा कर रख लेते है ख़ुद को,
किसी अँधेरे कोने में,
बुनते है वहीँ फिर बहानों की चादर,
जिसे ओढ़ कर छुप  सकें लोगों की नज़रों से,
इज़ाद करते है नए-नए तरीके,
लोगों को हड़काए रखने,
डराए रखने के लिए,
बर्दाश्त नहीं होता उनसे,
जो कोई उन पर अँगुली उठाए,
इसलिए पहले से सतर्क,
अपने आस-पास के लोगों पर रखते है चोर नज़र,
ताकी  ढूँढ सके कोई ऐब,
खुद को सही और सामने वाले को गलत सिद्ध करने के लिए,
बनाते रहते है,
रहस्यमय जालें,
जिसमें उलझा सके मासूमों को,
और तुष्ट कर सकें अपनी कुंठाओं को,
पर नहीं समझते की,
वे रहस्य्मय जालें ख़ुद उन्हें ही रोशनी से महरूम किए जाती है,
और वे धंसते  जाते है,
अनंत अंधकार में,
जहाँ उनकी रूह तक पर कालिख़ पूत जाती है। @ मनोरंजन 

Tuesday, June 30, 2015

धृष्टता

वो हर काम,
जिसे छुपाने की जरुरत होती है,
अपराध कही जाती है,
सिवा एक प्रेम को छोड़ कर,
बिना छुपाए प्रेम,
अपने सम्पूर्णता को प्राप्त ही नहीं होता,
अफ़सोस नहीं है मुझे अपनी धृष्टता का,
तुम्हे छूने के लिए,
किस हद की चोरी कर जाता था,
आज भी मेरी अँगुलियों में तुम्हारी ख़ुश्बू,
वैसी की वैसी ही है,
अगर चोरी ना करता तो,
मेरे पास तुम्हारा कुछ नहीं बचता। @मनोरंजन 

कर्म से अस्तित्व है

कर्म से अस्तित्व है
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पंक्षियों को देखा है थकते?
चींटियों  को सुस्ताते?
बारीस  को भींगते देखा है?
या नदियों को देखा गुस्साते?
पेड़ कहाँ रोकता है किसी को
अपना फल खाने से,
नहीं टोकता है किसी को,
उसके छाया में बैठ जाने से,
धरती को देखा है रोते,
इतनी चोट जो खाती है,
फिर सयंम से रहती है,
सबको अपने आँचल में सुलाती है,
सूर्य उदित होता है समय से,
आलस नहीं करता है,
चांदा भी उगता है रात को,
बैर नहीं करता है,
कर्म से ही अस्तित्व है इनका,
कर्म अपना करते है,
देने से घबराते नहीं,
ना कल के लिए पछताते है,
कर्म, जीवन की अमूल्य निधि है,
कर्म से ही अपना पहचान बनाते है। @मनोरंजन

दानव (लघु कथा )

दानव (लघु कथा )
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अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए, उसके चहरे पर पहले तो बिल्कुल  मासूम सी मुस्कराहट फैल  जाती है, फिर वह मुस्कराहट उदासी में बदलते हुए पलकों पर अश्रु के बूँदों  के रूप में नज़र  आने लगती  है।  फिर थोड़ा नाख़ुश  सा होकर कहती है, मैँ  कहती थी ना पुरानी बातें तकलीफ़  देती है, ना  जाने क्यों तुम,हमेशा गुजरे ज़माने की बातें करते हो। उसने बताया की वह बचपन में बहुत शरारती थी, घर में सबसे छोटी थी तो सबकी लाडली भी थी। निश्चय ही वह बचपन में बहुत खूबसूरत और चंचल रही होगी। उसके दो बड़े भाई और दो बड़ी बहनें है।बहुत कहने पर उसने अपनी  संक्षिप्त आपबीती सुनाई,  उसने बताया की कैसे जब वह बारहवीं  कक्षा में थी तो, उसके घर पर उसके छोटे भैया का दोस्त आया था, वह लड़का उसको देखते ही रह गया था, और जाते समय उसके भैया से बहुत सहस करके  बोला था,"निक्कू, मुझे तुम्हारी छोटी बहन बहुत पसंद आई है" अगर संभव हो तो मैं इससे शादी करना चाहूंगा।  घर में सब लोग एक साथ बैठ कर खाना खा रहे थे, तब  निक्कू भैया ने उस लडके की मन की बात बताई तो सभी लोग ठठाकर हँस  पड़े। बात इतनी भी अजीब नहीं थी, मगर मैं अभी बहुत छोटी उम्र की थी, मुझसे बड़ी दो बहनों की शादी होनी थी, भाइयों की शादी होनी थी, इसलिए यह बात हंसी-मज़ाक  का विषय बन कर रह गया। दोनों बहनों और दोनों भाइयों की शादी होते-होते काफी साल गुजर गए, इस दौरान उस लडके ने भी शादी कर ली और अपने परिवार के साथ ना जाने कहाँ जिंदगी गुजरने लगा।  मैं अपने कॉलेज  की पढ़ाई ख़त्म कर जीवन में कुछ करने के लिए दिल्ली आ गई। दिल्ली आये हुए मुझे आठ साल हो गए है, गुजर-बसर तो हो रहा है.............. ये कहते हुए उसके आँखों अश्रु की धरा बह  निकली, जो उसने काफी देर से ज़ब्त  कर रखा था।
इस दौरान उसके साथ क्या-क्या हुआ, ये सब लिखना तो संभव नहीं है, मगर इतना बताना जरुरी है की, उसके दोनों भाइयों की शादी होने के बाद वे अलग अपनी जिंदगी गुजारने लगे। पिता जी जो एक प्राइवेट फार्म में काम करते थे, सेवानिवृत हो गए, और उनकी सारी  जमा-पूंजी, दो बेटियों के शादी, बेटों के जीवन सुचारू रूप से शुरू कराने  में खाप गई। बच गई एक छोटी लड़की, जिसकी शादी की फ़िक्र माँ  को तो होती है, पर पिता असमर्थ है, भाइयों ने भी हाथ खड़े कर रखे है, और हर तरह से ख़ूबसूरत , प्रतिभावान और चरित्रवान होते हुए भी, दिल्ली में वह सिर्फ गुजर -बसर करने के लिए ना जाने कितने घाट  का पानी  पीने को अभिशप्त है। घर जाकर बैठ जाने से कुछ भी हासील  नहीं होने वाला, सिवा  जीवन भर माँ -पिता के सेवा के लिए, चूल्हा झोंकने  के ,क्योंकि एक पढ़ी-लिखी, प्रतिभावान लड़की के लिए सुयोग्य लड़का ढूंढने के लिए लाखों का दहेज़ लगता है। ये  दहेज़ रुपी दानव, उसकी खूबसूरती और प्रतिभा को दिनों-दिन निगलते जा रहा है, और वह इस उम्मीद में जिंदगी गुजार रही है की,कभी तो वैसा ही एक लड़का आएगा उसके जीवन में जो कहेगा की,"तुम मुझे बहुत पसंद हो,अगर संभव हो तो मैं तुमसे शादी करना चाहूंगा"( बिना दहेज़ के )। @ मनोरंजन

Thursday, June 25, 2015

नेपाल में भुकंप

नेपाल में  भुकंप
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अभी जिंदगी आँख मिच रही थी,
नींद से जाग  कर,
देख रही थी मुस्कुरा कर,
अँगड़ाइयाँ लेते सुबह को,
अभी उमंग उठे थे दिल में,
नए सूर्य के साथ आगे बढ़ने को,
जीने को एक नया सवेरा,
चल  पड़े थे पाँव उठ कर,
अभी-अभी निकले थे कुछ नन्हे पाँव,
नया कुछ रचने  को,
चल पड़े थे मज़बूत  कदम,
अर्जन कुछ करने को,
अभी-अभी देखा था माँओं ने,
अपने नैनिहालों को हुलस कर,
किसे पता था,
की काल  रच चुका था अपना खेल,
माँ  धरती के आँचल में होने लगा था हलचल,
पल भर में ही जिंदगी,
बदल गई थी चीख़, हाहाकारों में,
हाय ये कैसी विडम्बना,
धरणी ही बन गई हन्ता,
माँ  तुम ये कभी न करना,
ऐसा विकट  रूप कभी न धरना। @ मनोरंजन

सज़ा

सज़ा
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हाँ, तुम्हारे बाद किसी से कुछ कहता नहीं,
सुनता  भी नहीं कुछ किसी का,
सब अर्थहीन सा लगता है,
शायद इसिलिए सब मुझे अभिमानी समझते है,
 घमंडी हूँ,
ये सोच कर कोई पास नहीं आना चाहता है,
जबकि मुझे किसी के स्नेहहिल साथ की सख़्त  जरुरत है,
पर मन पढने को फ़ुर्सत किसे है,
सब रिश्ते में आदान-प्रदान की अनिवार्यता को रेखांकित करते है,
और मैं उनके बनाए वसूलों पर खरा नहीं उतर  पाता,
ये विवसता है मेरी,
तुमसे जुड़े होने की कुछ तो सज़ा  मिलनी ही चाहिए। @ मनोरंजन

कुछ बचा रह गया है

कुछ बचा रह गया है 
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कितनी नफरतें कर ली हमने,
शायद इससे ज्यादा न तुम कर सकते हो,
ना मैं,
तुम्हारी सूरत ख्वाबों में भी ना देखने की कसम ली है मैंने,
और तुम्हे मेरी आवाज़ से भी नफ़रत है,
मेरे बारे में कहीं कोई बात चले,
सुन कर तकलीफ़ होती है तुम्हे,
तुमने वह सभी जगह जाना छोड़ दिया है,
जहाँ मेरा ज़िक्र भी होता है,
बना लिया है एक मज़बूत आवरण,
जिससे मुझे ख़बर ना कुछ तुम्हारे बारे में,
मैं भी अक्सर बच कर निकलता हूँ,
हर उस जगह से,
जहाँ तुम्हारे मौजूदगी का एहसास होता है,,
मगर क्या करूँ उन पंक्तियों का,
उन हर्फ़ों का,
जिन्हे तुमने लिखा था, और मुझे सुनाया था,
जो बरबस ही जेहन में आ ही जाते है,
और कितना भी रोकूँ ख़ुद को,
मगर आँखे झर -झर बहने लगती है,
शायद प्यार भी था हमदोनों के बीच,
जो बचा रह गया है अब भी,
आँखों के पलकों में। @ मनोरंजन

Wednesday, June 24, 2015

तू चले ना चले

तू चले ना चले
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तू चले ना चले,
राहें चलती जाएँगी,
अपनी-अपनी मंज़िल की ओर
सूर्य उदय हुआ है तो अस्त भी होगा,
अँधेरा गहराता जाएगा,
तू चले ना चले।

सांसे चलती रहेंगी निरंतर,
थकने और फिर थम जाने तक,
रक्त नाड़ियों में अपने रफ़्तार से बहता रहेगा,
तू चाहे तो उबाल आएगा लहू में,
नहीं तो ख़ून पानी हो जायेगा,
तू कहे ना कहे,
वक्त तेरा हर हर्फ़ लिखेगा,
तू चले ना चले।

जिंदगी चलते जायेगी,
अतित को विस्मृत कर,
वर्तमान के छाती पर,
किसी मासूम बच्चे की  अँगुलियों की तरह,
कभी गुदगुदी करते तो,
कभी छाती के बालों को नोच कर पीड़ा पहुँचाते,
यों ही खिलखिलाती रहेगी जिंदगी,
जब तक तू उस पीड़ा में भी आनंद पाते रहेगा,
झुन्झुलाने, गुस्साने पर बिदक कर दूर चली जाएगी जिंदगी,
तू चले ना चले,
चलते जाएगी जिंदगी।@ मनोरंजन

Monday, June 22, 2015

क्या नरेन्द्र मोदी भारत के छठे प्रधानमंत्री नहीं है?

क्या नरेन्द्र मोदी भारत के छठे प्रधानमंत्री नहीं है?
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कहने को तो अब भी कुछ थेथ्थर टाइप के लोग कह रहे है की " अच्छे दिन आ गए क्या" अब उन बक्लोलों को कौन समझाए की अच्छे दिन के मतलब हर भारतीय के बैंक खाते में 15 लाख रुपये डालना नहीं होता......पता नहीं कौन उजबुक ऐसी बेसिर-पैर की बातें करके सोचता है की भारत के लोग अब भी बेवकूफ है, हवा बना देने से हवा के साथ बह जायेंगे........ उन्हें कुछ दिखाई नहीं देगा क्या? ये उजबुक देश के जनता को बेवकूफ़ मानते-मानते 60-65 साल में खुद ही बकलोल बन गए है....... अगर सिर्फ हवा बनाने से सरकार बन सकती तो दिल्ली का मुख्यमंत्री कोई भाजपा का नहीं होता? और इतने बड़े उदहारण से भी नहीं सिख रहे ये बकलोल लोग....... स्वच्छता अभियान और योग दिवस जैसे पहल को भी टारगेट करने लगते है..... ये क्या कम है की देश एक ऐसे प्रधानमंत्री को देख रहा है, जो पुरे देश को अपना परिवार मनाता है, परिवार का मुखिया भी तो कई बार अपने परिवार के लोगों के सभी आकाँक्षाओं को पूरा नहीं कर पता और कई बार तो परिवार को बेहद मुश्किल से गुजरना पड़ता है तो क्या परिवार वाले अपने मुखिया को छोड़ देते है?
पहली बार हम एक ऐसे प्रधानमंत्री को देख रहे है, जो पहल करता है देशवासियों को कुछ अच्छा करने को प्रेरित करता है..... इससे पहले क्या आपने सुना है किसी प्रधानमंत्री को देशवाशियों को कुछ अच्छा करने को प्रेरित करते हुए? राजीव गाँधी और अटल बिहारी वाजपेयी के बीच के प्रधानमंत्रियों के तो नाम याद रखने को मसक्कत करने पड़ते है, खीज भी होती है, उन प्रधानमंत्रियों के बारे में हेरा-फेरी और तमाम अरुचिकर बातो के सिवा कुछ भी याद नहीं आता....... मेरे लिए तो मोदी, भारत के छठे प्रधान मंत्री है.... नेहरू जी, लालबहादुर शाष्त्री जी, इंदिरा जी, राजीव गाँधी जी, अटल बिहारी वाजपेयी जी और छठे नरेन्द्र मोदी जी।@ मनोरंजन 

Friday, June 5, 2015

एक बाल मज़दूर

एक बाल मज़दूर
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एक खिड़की है,
खिड़की के पीछे से झाँकती एक जोड़ी आँख है,
उन आँखों में डर है, घबराहट है,
बेवसी है, याचना है,
हाँ एक उम्मीद की चमक भी है,
दिन-रात  चमकते रहती है ये आँखें,
ऐसा लगता है कातर स्वर में  कहना चाहती है,
मुझे निकालो यहाँ से,
जुबाँ पर ख़ामोशी है,
एक रिक्तता है,
चहरे पर इतना कुछ लिखा है,
की पढने वाले की रूह काँप जाए ,
पर पढने वाला नहीं कोई,
दिखता भी तो नहीं वो चेहरा,
मैदान में खेलते बच्चों के झुण्ड में,
दुबका रहता है दिन-रात
उसी खिड़की के पीछे,
बस एक लक़ीर  दिखती है,
जीस  पर स्पष्ट लिखा होता है,
मुझे, मेरे घर छोड़ दो,
मुझे, मेरे माँ -बापू के पास छोड़ दो। @मनोरंजन 

Wednesday, June 3, 2015

फर्क

प्यार होने और प्यार नहीं होने में बहुत फर्क होता है परी ,
जब हमें किसी से सच्चा प्यार होता है तो,
उसकी हर बात अच्छी लगती  है,
हर माँग  जायज़  लगती  है,
उसके साथ रहना और जीना  बेहद आसान होता है,
क्योंकि उसके साथ  होने मात्र से बाकी  सब कमियों का एहसास नहीं होता,
बाकी  सब दुर्बलताएँ और असफलताएँ गौण हो जाती है,
और इसतरह जीवन हर्ष,उल्लास,और उत्साह से भर कर सफलता की ओर अग्रसर हो जाती है,
पर,
जब हमें किसी से प्यार नहीं होता,
और हमें साथ जीवन जीना  होता है तो,
जीवन अनेक कठिनाइयों से भर जाती है,
भले ही वह निर्दोष हो, मासूम हो और चारित्रिक गुणों से भी भरपूर हो,
मगर हमें हर बात-बात में कुछ खोट नज़र आती है,
उसकी हर बात नापसंद सी होने लगती  है,
उसकी हर माँग गलत लगाने लगती है,
और सबसे बड़ी बात,
जीवन सिर्फ एक इसी बिंदु के इर्द-गिर्द घूमने लगती है की,
कैसे परस्पारिकता स्थापित करें,
कैसे सब अच्छा हो जाए ,
क्या करें की ख़ुशी  उल्लास का माहौल बने,
और हम चाहे कितने भी बुद्धिमान और समझदार शख़्स क्यों न हो,
बात बिगङते चली जाती है,
और अंततः जीवन खीझ, चिड़चिड़ापन,गुस्सा और क्षोभ के भेंट चढ़ जाती है। @मनोरंजन   

Monday, June 1, 2015

क्षणिकाएँ

तू वृक्ष चन्दन की,
लिपटे रहते है अनंत विषधर तुमसे,
फिर भी अपनी खुशबू नहीं खोती। @ मनोरंजन 

क्षणिकाएँ

उसकी स्मृतियों की लकीरें इतनी गहरी है की,
वक्त और हालत के वर्षों से जमते धूल भी उसे समतल नहीं कर पाते ,
वक़्त -बेवक्त आ जाने वाली उसकी यादों की बयार में,
और मेरे आंसुओं के धार में,
बाह जाती है सारी धूल ,
और उसकी स्मृतियों की लकीरें ज्यों के त्यों बनी रहती है@ मनोरंजन

Friday, April 24, 2015

कुछ शब्द उधार दे दो मुझे

कुछ शब्द उधार दे दो मुझे
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यह तो तुम भी जानते हो, और मैं भी की,
हमारे बीच का ये जो रिश्ता है, जिसका कोई नाम नही,
हमारे अहंकारों और हमारे गुस्से के बिना अधुरा ही है,
हमारे बीच गुज़रे प्रेम के पलों को,
गुनगुनाने के लिए तो अनंत शब्द है मेरे पास,
पर हमारे बीच घटीत हुए, अहं के टकराहट को याद कर,
शब्दविहीन हो जाता हूँ मैं,
उन्हे भी तो लिखना चाहिए ना,
उन टकराहट के पलों के बिना तो हमारा रिश्ता ही अधूरा है,
पर शब्द नही है मेरे पास,
कुछ शब्द तुमसे उधार माँगता हूँ,
जल्दी वापस कर दूँगा,
सोचता हूँ, काश! उन टकराहट के पलों में हार मान लेता मैं ही,
मगर मैं जनता हूँ,
तुम तब भी गुस्सा होती,
ये सोच कर की मैं मुद्दे को टाल रहा हूँ,
और ज़्यादा व्यथित होती,
हर परिस्थिति के लिए कितने सारे शब्द होते थे तुम्हारे पास,
प्रेम के मधुर पलों के लिए भी, और लड़ने के लिए भी,
अब तुम्हे निशब्द देख कर हज़ार मौत मरता हूँ मैं,
मरता हूँ, और मरकर  मेरी रूह भटकती है वीराने में,
नीड वीराने में, जहाँ दूर-दूर तक कोई नही होता है,
उन अंधेरे सन्नाटे को अपनी पूरी ताक़त से चीरता हुआ,
चिल्लाता हूँ मैं,
"कोई मुझे कुछ शब्द दे दो"
ताकि लाकर कुछ शब्द,
तुम्हारी निशब्दता को तोड़ सकूँ,
मगर अभी भी तुम ही जीतती हो,
नही मिलता कहीं से कोई शब्द मुझे,
और तुम्हारी ये चिर निशब्दता बनी हुई है अभी भी,
और तुम्हारी ख़ामोशी,
बार-बार मुझे मरने को मज़बूर करती है,
देखो, जानता हूँ,
कुछ शब्द तो अवश्य ही अब भी रखे होंगे तुम्हारे पास,
इतने सारे शब्द थे तुम्हारे पास,
यों अचानक गायब कैसे हो गये,
ढुंढ़ों ना कुछ शब्द अपने अंदर,
और मुझे उधार दे दो,
यकीन करो, जल्दी ही लौटा दूँगा|@ मनोरंजन


Thursday, April 23, 2015

किसान और राजनीति



किसान और राजनीति
आज-कल केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार, किसानों के मुद्दे पर चौतरफ़ा घिरी हुई नज़र रही है, दरअसल अगर सही तरह से मूल्यांकन किया जाए तो सरकार ने किसानों के ख़िलाफ ऐसा कुछ भी नही किया है, जिसके वजह से उन्हे जबाव देने में कठिनाई हो, सरकार के खिलाफ किसान विरोद्धी होने का हावा बनाया जा रहा है| लेकिन भारतीय जनता पार्टी भी उसी कमज़ोरी की शिकार होते नज़र रही है, जिसे " वोट बैंक की राजनीति" कहते है| जब हम "किसान" कहते है तब क्या हम सिर्फ़ उन्ही "किसानों" की बात कर रहे होते है, जिनके ज़मीनों को अधिग्रहण कर 3-4 करोड़ रुपया प्रति एकड़ मुआवज़ा दिया जाता है, या उन किसानों की जो लाखों रुपया क़र्ज़ लेकर खेती करते है, और  किसी साल  जब प्राकृतिक आपदा या किसी वज़ह से फसल खराब हो जाती है तो आत्महत्या जैसे कदम उठाने पड़ जाते है, ये कैसे किसान है जो लाखों रुपया क़र्ज़ लेकर खेती करते है, और उन्हे इस खेती से इतना भी बचत नही हो पता की एक साल किसी तरह अपने परिवार का/ अपने बच्चों का भारण पोषण कर सके, सीधे आत्महत्या ही एक विकल्प बचता है उनके पास? निश्चित रूप से ये वैसे ही किसान है जैसे सिर्फ़ "मुस्लिम" ही हमारे देश में अल्पसंख्यक है|हमने तो ऐसे किसान देखे नही भाई, हम तो सिर्फ़ ऐसे किसान देखते रहे है, जो आज भी अपने बच्चों की पढ़ाई, बेटी की शादी और परिवार के दावा-बिमारी के लिए अपनी ज़मीनों को 50-60 हज़ार रुपया प्रति बीघा पर बेचने को मजबूर है| हम तो सिर्फ़ ऐसे किसानों को जानते है, जिनकी अगर फसल खराब हो जाती है, तो दूसरों के मज़दूरी कर, शहर में खुद या अपने बच्चों को भेज चार पैसे कमाने के लिए, दस गालियाँ खा कर अपना पेट भरते है, और अगर उससे भी पेट ना भरे तो गुड़  खाकर,पानी पीकर, गमछा अपने पेट पर बाँध कर सो जाते है| क्या ये किसान भारत देश के किसान नही है? ये तो आत्महत्या नही करते, क्योंकि इनके उपर अपने पूरे परिवार का भारण-पोषण का दयीत्व होता है| इन दोनों तरह के किसानों में किस तरह के किसानों की संख्या ज़्यादा है?सरकार अगर कोई क़ानून बनाए तो उसे किस तरह के किसानों के जीवन स्तर को बेहतर करने की प्राथमिकता होगी? मोदी सरकार के भूमि अधिग्रहण क़ानून से निश्चित रूप से ऐसे किसानों को तिलमिलाने को मजबूर किया है, जिनके बच्चे, लाखों-करोड़ों की गाड़ियों में  घूमते है हरियाणा, पश्चिमी उत्तरप्रदेश, राजस्थान के कुछ हिस्से, और महाराष्‍ट्रा और आंध्रा प्रदेश के कुछ हिस्सों के किसान है और, दिल्ली के किसान( अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली के किसानों को 4 लाख प्रति हेक्टेयर मुआवज़ा देने का वादा किया है, और चुनौती दी है की मोदी की सरकार पूरे देश के किसानों को इतना ही मुआवज़ा देकर दिखाए, अब अरविंद केजरीवाल से पूछने वाला कोई पत्रकार ऐसा नही है, जो ये पूछ सके की दिल्ली में कितने किसान है? और जो किसान है वो भी क्या सिर्फ़ नाम के किसान नही है, जैसे सिर्फ़ मुस्लिम लोग अल्पसंख्यक है) मगर मीडिया को इन बातों से क्या लेना देना, उन्हे तो टी. आर.पि से मतलब है, जो लाखों- करोड़ों की गाड़ियों में घूमने वाले और व्यावसाय के रूप में खेती करने के लिए लाखों रुपया क़र्ज़ लेकर फिर आत्महत्या करने को मजबूर हो रहे है, सिर्फ़ यही किसान है, बाकी पूरा देश किसान विहीन हो चुका है, सिर्फ़ दिल्ली और दिल्ली के आस-पास ही किसान रहते है|अगर मोदी सरकार सच में वोट बैंक के परवाह किए बिना देशहित में काम करती है, तो इन "मौसमी मेढ़क" के परवाह किए बिना, देश के उन करोड़ों किसानो के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के उदेश्य पर काम करे| जब परिणाम आने शुरू हो जाएँगे तो अपने आप "मौसमी मेढ़क" के आवाज़ बंद हो जाएगी|भूमि अधिग्रहण बिल-2015 पूरे देश में विकास और आधारभूत संरचनों को खड़ा कर "मेक इन इंडिया" के सपनों को साकार करने का उदेश्य रखता है, जिससे बिहार, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा, और पश्चिम बंगाल जैसे अनेकों राज्यों के किसानों के बेटों को रोज़गार और बेहतर जीवन स्तर मुहैया कराया जा सकेगा, क्या ये सारे राज्य भारत देश के अंग नही है? यहाँ के किसान क्या किसान नही है? क्या दिल्ली और इसके आस-पास के बड़े किसानों को राष्ट्रीयता के भावना को सर्वोपरी रख कर उन करोड़ों किसानों के बेहतर जीवन के समर्थन के लिए कुछ त्याग नही करना चाहिए? इस बिल से सिर्फ़ राबर्ट बॅड्रा जैसे किसानों का अहित हो रहा है| कांग्रेस को उस समय किसानों की ज़मीनों की परवाह क्यों नही हुई, जब अपने 65 साल के शासन में किसानों की ज़मीनें गाजर- मूली के भाव अधिग्रहण करके अरबों-खराबो रुपया अपने काले धन  के खाते में जमा कर लिए, कांग्रेस को किसानों की फ़िक्र तब हुई, जब उन्हे पक्का यकीन हो गया था, की इस बार के लोकसभा चुनाव में वह बुरी तरह हार जाने वाली है, तब कांग्रेस ने ये सोचा की जीस तरह से हमने देश को लूटा, किसी और को मौका ना मिले,इस लिए भूमि अधिग्रहण क़ानून-2014 और खाद्या सुरक्षा अधिनियम -2014 अपने शासन के बिल्कुल आखरी दिनों में लेकर आए|

भारत एक बहुत बड़ा देश है, यहाँ कोई भी क़ानून सभी नागरिकों के फायदे के लिए नही होता, हर कानून से कुछ वर्ग लाभान्वित होता है तो कुछ वर्ग परेशान होता है| ऐसा सिर्फ़ भारत में ही नही होता, हर देश में होता है| भारतीय लोगों में सबसे जो बड़ी कमी है वो ये है की भारतीयों में कभी भी राष्ट्रीयता की भावना सर्वोपरी नही होती, हम देशभक्त होने का दावा तो करते है, युद्ध के समय, क्रिकेट मैच के समय या आतंकवादी घटनाओं के समय घड़ियाली आँसू बहते है, मगर सच तो ये है की हम राष्ट्रीयता को सर्वोपरी नही मानतेभारत में एक चीज़ जो सदियों से चली रही है, वो है खुद को बेवकूफ़ बनाना, कोई भी आता है और हमें बेवकूफ़ बना देता है, कारण है की हम स्वयम् बेवकूफ़ बनाने को प्रस्तुत होते है| पहले अँग्रेज़ों ने बनाया, फिर ६०-६५ साल तक कांग्रेस ने बनाया, और अब राखी सावंत को भी ड्रामेबाजी में मात देने वाले अभूतपूर्व महानतम दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल जी बना रहे है| दरअसल हम इन महान लोगों के द्वारा ही छले जाते रहे है| ये दिल्ली के मुख्यमंत्री श्री अरविंद केजरीवाल तो वाह चीज़ है जो अगले पाँच सालों में पूरे देश को नचाने का अलग-अलग स्टेप्स सिखाएगा, अगर हम अभी भी होश में ना आए तो बहुत देर हो जाएगा|जब  तक हम  धर्म, जाती, भषा और क्षेत्रीयता, के अपने अंदर बैठे रक्षासों को मार कर रष्ट्रीयता को सर्वोपरी नही रखेंगे, तब तक हम सभी देशवासियों को नेहरू-गाँधी परिवार और केजरीवाल जैसे लोग ठगते रहेंगे और हम आपस में ही लड़ कर इनका काम आसान करते रहेंगे| @मनोरंजन