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Thursday, December 29, 2016

वक़्त

वक़्त
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वक़्त के धूल से भर गये,
ना जाने कितने तालाब, कुँए और नहर,
ना जाने कितने चबूतरे और चौपाल
समतल और सुनसान हो गए,
ना जाने कितने बग़ीचे वीरान हो गए,
वक़्त के अंधड़ों में,
झर गए ना जाने कितने ही पेड़ों के,
ना सिर्फ पत्ते, शाखाएं भी,
दूर कहीं बियाबान में खड़ा ठूंठ,
वक़्त की बेहरमी की कहानी बयाँ करता है,
वक़्त क्या कुछ नहीं करता?
पुराने ज़ख्मो को भरता है,
नए जख़्म बनाता है,
कितने ही ऐसे नाम जो कभी
प्राणामृत हुआ करते थे,
वक़्त ने उन्हें विस्मृत कर दिया,
वक़्त सिखाता है कि
जिंदगी सिर्फ इतनी ही नहीं है,
अभी और भी निशान बाकी है वक़्त के,
जो किस रंग के होंगे नहीं पता,
पता सिर्फ इतना है कि
वक़्त के साथ कदम मिला कर चलने के प्रयास में,
घिसटते जा रहे है वक़्त के साथ में। @ मनोरंजन 

नसीहत

मेरे मोबाइल फोन में एक ऐसा भी नम्बर है,
जिसे हर रोज अपनी अँगुलियों से सहलाता हूँ,
पर फोन नहीं करता कभी, ना संदेश कोई भेजता हूँ,
बुजुर्गों के नसीहत पर अमल करता हूँ,
" सूख चुके जख़्मों को नाख़ून नहीं लगाते " @ मनोरंजन 

Sunday, December 25, 2016

आदरणीय अटल जी के कलम से।
गीत नहीं गाता हूँ
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बेनकाब चेहरे है, दाग बड़े गहरे है,
टूटता तिलिस्म, आज सच से भय खाता हूँ,
गीत नहीं गाता हूँ।
टूटे हुए सपने की सुने कौन सिसकी,
अंतः की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी,
हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानउऊंगा,
काल के कपाल पर लिखता, मिटाता हूँ,
गीत नया गाता हूँ।

महान कवि भारत रत्न सम्मान से सम्मानित विश्व के उच्च कोटि के राजनीतिज्ञ भूतपूर्व प़धान मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ एवं बधाई ।
महान शिक्षाविद मानवता के रक्षक हिन्दु विश्व विद्यालय के संस्थापक देश हित के लिए उत्साहित रहने वाले महामना पंडित मदन मोहन मालवीय जी को शत शत नमन करता हूँ ।








Monday, December 19, 2016

सर्दियों में मन अनायास ही उदास हो जाता है

कितना अच्छा लगता था,
लिखना तुम्हे सोच कर,
लिखना बस सिर्फ अपने लिए,
ना कहीं छपने की चाह थी,
ना तारीफ़ की/ इनाम की हवस,
वो लम्हा बेसकीमती/ अनमोल होता था,
जब तुम्हे सोचते हुए लिखता था,
रौशनी चाहूँ ओर होती थी,
हर हर्फ़ चमकता था तुम्हारे दाँतों की तरह,
इधर लोग कहते है कि " वह कविता नहीं है"
और मैं कविता लिखने के प्रयास में,
खोए जा रहा हूँ भीड़ के अँधेरे में,
सर्दियों में मन अनायास ही उदास हो जाता है।@ मनोरंजन

Friday, December 2, 2016

सच क्या है?

सच क्या है?
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आज-कल राजनैतिक गलियारे में क्या हो रहा है, समझना बिल्कुल मुश्किल है। एक तरफ भाजपा के नेतृत्व वाला NDA सरकार, मोदीजी के सतर्क, सूझ-बुझ और दूरदृष्टि से बेहतर काम करती नज़र आ रही है, वहीँ विपक्ष सरकार पर इतने गंभीर/ संगीन आरोप लगातार लगाए जा रहे है, जितना गंभीर आरोप शायद ही भारत के किसी भी केंद्र या राज्य सरकार पर लगाए गए हो। जहाँ एक तरफ आमजन इस सरकार के साहसिक और परिवर्तनशील नीतियों के साथ गहरा जुड़ता हुआ प्रतीत हो रहा है, वहीँ विपक्ष इसे एक छलावा/ षणयंत्र करार देने पर आमदा, इसे एक तनाशाह के उदय की कहानी बता कर आमजन में भय/ संसय को जन्म देना चाहता है।स्पष्ट है कि देश में आर-पार की राजनैतिक लड़ाई चल रही है, जो इस राजनैतिक कसमकश में अपने अस्तित्व को बचाए रख पायेगा, वही आगे भारतीय राजनीति की दशा-दिशा निर्धारित करेगा। असमंजस/ अस्पष्ट विचारधारा/ और अवसरवादी राजनीति करने वाले बिल्कुल ख़त्म हो जायेंगे।
बाहरी तौर पर देखा जाए तो मोदी सरकार का हर फैसला जनहितकारी/ आमजन में गर्व/स्वभिमान की भावना का संचार कर रहा है, और विपक्ष का हर आरोप निराधार और कोरा विलाप जैसा लग रहा है। सबसे पहले दो ऐसे मुख्यमंत्री की बात करते है, जो मोदी सरकार के स्पष्ट विरोधी है। अरविन्द केजरीवाल पहले ही अपनी छवि एक ऐसे नेता की बना चुके है, जिसकी हर बात/ आरोप बकवास होता है, और सिर्फ उनके राजनैतिक स्वार्थ से प्रेरित होता है, वहीँ ममता बनर्जी की छवि एक संघर्षशील नेत्री की रही है, मगर मोदी विरोध के नाम पर वह भी हर सीमा को पार करती नज़र आ रही है। केंद्र सरकार, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में है, इसलिए क्या उसे अपने अधिकारों/कर्तव्यों को सिर्फ इसलिए नहीं निभाना चाहिए क्योंकि मोदी एक आश्चर्यजनक विकल्प बन कर देश का नेतृत्व कर रहे है, और उनके जैसे/ उनके समकक्ष लोग उनसे चिढ़े हुए है? ममता बनर्जी का उनके प्लेन को क्रैश कराने का/ कोलकत्ता में आर्मी को तैनात कर उनके सरकार का तख्तापलट का आरोप बिल्कुल निराधार/ नाटक/ प्रायोजित प्रतीत होता है, क्योंकि केंद्र सरकार का यह कर्तव्य है कि वह देश की सुरक्षा-व्यवस्था पर नज़र रखें, ऐसे नाटक करने से आर्मी, बंगाल सरकार के अधीन तो नहीं आ जाएगी? तृणमूल काँग्रेस के सांसद, सदन में कह रहे है कि आजाद भारत के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ, नहीं हुआ तो अब होने में क्या हर्ज़ है?ऐसा बहुत कुछ हो रहा है, जो पहले नहीं हुआ ,तो क्या करें? एक सरकार जो परिवर्तन के नाम पर ही सत्ता में आई है, देश को सशक्त/सक्षम /समृद्ध राष्ट्र बनाने के वादे के साथ ही बहुमत हासील किया है, उसे पाँच साल काम करने देने में क्या हर्ज है? वह तानाशाह है तो हम देशवासी एक तानाशाह को भी भुगत लेंगे, पहले ये साफ़ तो हो जाए फिर 125 करोड़ जनता है, इस जनता ने अंग्रेजों तक को सफलता पूर्वक भगा दिया, इंदिरा गाँधी जी के ऐसा करने के मंसूबों पर दो साल में पानी फेर दिया, तो यह जनता मोदी सरकार को उखाड़ नहीं फेंकेगी?
नोटबंदी के बाद से ही ऐसा महौल बनाया जा रहा है कि किसी तरह आमजन के दिमाग में "अपातकाल " की भयवहता भर दी जाए और ऐसा करने के लिए बैंकों के बाहर लाइन में लगे लोगों के आक्रोश/ इस दौरान हुई मौत के तरफ इशारा किया जा रहा है, पर जमीन पर तो हम भी रहते है, लोगों को हो रही परेशानियों को ना सिर्फ देख रहे है, बल्कि भुगत भी रहे है, फिर भी अधिसंख्य जनसमुदाय के जुबां पर सरकार के फैसले का स्वागत ही है, ऐसा क्यों?
देश में और भी तो विपक्षी पार्टी के मुख्यमंत्री है, वे इस फैसले का स्वागत क्यों कर रहे है? क्या उन्हें अपने राज्य में हो रही मौतों का/ लोगों के आक्रोश का जरा भी परवाह नहीं है ? उन्हें अपने राज्य में लोगों ने भाजपा और मोदी को नजरअंदाज कर जीताया है, उन्हें अपने राज्य के लोगों का फ़िक्र क्यों नहीं है? इसमें सबसे अहम नाम उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की है, इसमें नवीन पटनायक ऐसे नेता माने जाते है, जो सिर्फ अपने राज्य के जनता को समर्पित, पूर्वाग्रहमुक्त राजनीति करते है। ख़ासकर सबसे ज्यादा परेशानी इन्ही राज्यों में होनी है (बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल,उत्तर प्रदेश) ये राज्य अशिक्षा और पिछड़ेपन के लिए जाने जाते है, इसलिए इन राज्यों में नोटबंदी से अधिसंख्य लोगों को प्रभावित होना है। मगर लोग परेशान होने को तैयार है, तभी तो बिहार और उड़ीसा से स्पष्ट आवाज़ आ जाती है कि हम परेशान होने को तैयार है, उत्तर प्रदेश में चुनाव है, इसलिए भाजपा के समर्थन में कुछ कहा नहीं जा सकता, दोनों प्रमुख पार्टियों की अपनी साख दांव पर लगी है, और काँग्रेस अभी तक अपने असमंजस के स्थिति से उभर नहीं पाई है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री, नोटबंदी के स्पष्ट विरोध में है, मगर सबसे ज्यादा उनके राज्य में जान-धन खातों में पैसा जमा हो रहा है( इस मामले में यह राज्य पिछड़ा नहीं, बल्कि एक संपन्न राज्य बन जाता है)


अब सवाल उठता है कि क्या मोदी जी ने बिहार और उड़ीसा के मुख्यमंत्रियों को खरीद लिया है? अगर हाँ तो, भाई अगर कोई शख़्स इतना ताकतवर है कि वह दो बड़े प्रदेश के विपक्षी पार्टी के मुख्यमंत्रियों को अपने साथ मिला सकता है, पुरी आर्मी उसके इशारे पर कुछ भी करने को तैयार है तो हमें भी इस तानाशाह के तमाशे देखना होगा। और हमें इस अवसर को हाथ से जाने नहीं देना चाहिए, क्योंकि इतिहास में ऐसा अवसर बहुत कम ही आता है, जब देश का बागडोर इतने ताकतवर नेता के हाथ में हो। @ मनोरंजन कुमार तिवारी

Monday, November 28, 2016

महानगर में हाउसवाइफ

महानगर  में हाउसवाइफ 
सूर्य उदय होता होगा,
शायद अस्त भी होता है,
हमारे घर में सिर्फ दिवारें है,
रोशनी भी आती है खिड़कियों से,
पर ट्यूब लाइट जलते रहती है,
तो दिन और रात का पता नहीं चलता,
"वो" सोकर उठने के बाद नहा-खाकर  ऑफिस जाते है,
तो लगता है दिन की शुरुआत हो गई है,
और जब लौट के आते है तो,
 लगता है अब रात हो गई,
रोज सोचती हूँ कि कल सूर्य को देखूँगी,
पीछे बॉलकनी में कपडे डालने जाती हूँ,
पर ध्यान नहीं रहता,
कभी छोटी बेटी दूध के लिए गला फाड़े जाती है,
कभी बेटा तीन साल का,
साड़ी पकड़े-पकड़े पता नहीं क्या कह रहा होता है,
नास्ता बना कर/ करा कर फ्री होना चाहती हूँ,
पर बर्तन, कपडे जैसे मेरे सर पर चढ़ कर नाचने लगते है,
फिर एक तरफ कूकर सीटी मारता है,
और दूसरी तरफ बुद्धू बॉक्स पर पता नहीं क्या टर्र -टर्र करते रहता है,
सुना है नोटबंदी हो गई है,
बला से हो गई तो हो गई,
पर टीवी पर दिन भर सही हुआ/ गलत हुआ का महाभारत चलते रहता है,
मैं  "कुमकुम भाग्य" लगा लेती हूँ,
रोज सोचती हूँ,
आज अपने कमर दर्द के बारे में "इन्हें" बताऊँगी,
छी, ये क्या इतना जरूरी है?
वैसे ही कितना हेडेक  रहता है इन्हें,
अब देखो ना, इतनी रात में 
इस अनबोलती शैतान को क्या हो गया?
बार-बार पलँग पर चढ़ कर स्विच ऑन  रही है,
मना करो तो गला फाड़ने लगेगी,
" वो" तो सो गए, बस पांच मिनट का हमसफ़र बन कर,
शादी के बाद " रोमांस " ख़त्म हो जाता है क्या? @ मनोरंजन कुमार तिवारी 

                                                                                                          

Friday, November 25, 2016

मुक्ति (कहानी )

मुक्ति (कहानी )
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बड़ा भाई होने के नाते मैं ही उसे लेकर गया था सेक्युरिटी गार्ड भर्ती के दफ़्तर में। 800 रूपया और मैट्रिक का सर्टिफिकेट जमा कर, वर्दी मिल गई और डिफेंस कॉलोनी के एक अमीर आदमी के घर के बाहर खड़ा रह कर पहरा देने की ड्यूटी। उम्र कच्ची थी उसकी, चेहरा पर चमक, गर्व और मासुमियत से खिला हुआ। पर उसे नहीं पता था कि अब इस चेहरे का हर रंग उड़ना है यहाँ। उसे नहीं पता था कि गर्व और मासुमियत से खिला उसका चेहरा मुरझाने वाला है यहाँ। सुपरवाइजर ने उसे कुछ बातें सिखाई जैसे जब साहब या मैडम आए तो पैरों को पटक कर मुस्तैदी से सैलूट करना है। उसे समझ नहीं आ रहा था कि सैलूट करना इतना जरुरी क्यों है? नमस्ते कर सकते है, प्रणाम कर सकते है, जो वह बचपन से अपने से बड़ों को सहजता से करते आ रहा है, मगर यह सैलूट करना उसे बड़ा टेड़ा काम लग रहा था, आदत नहीं थी, गलती से नमस्ते ही कर लिया करता कभी। साहब हर बार उसे अज़ीब नज़रों से देखता था। डरना, सहम जाना उसके स्वभाव में था नहीं मगर उसे एहसास हो रहा था कि यह भी उसके ड्यूटी का एक हिस्सा है। दो-तीन दिनों में ही मुरझाने लगा था था, नए उम्र का लड़का, ना खैनी ठोकने की आदत ना मन बहलाने को और कुछ, एक ही जगह बारह घण्टे उठ-बैठ के बिता देना आसान नहीं था उसके लिए। ये घण्टे बड़ी तेज़ी से उसके अंदर के कोमलता/मासुमियत  को सोखे जा रहा था। उसे नहीं पता था कि जिस  घर की रखवाली वह कर रहा है, उस घर पर अगर कबूतर भी आकर बैठ जाए तो उसे उड़ाने की जिम्मेवारी उसकी है। चार दिनों के बाद उस घर से एक लड़की निकली और अपने शानदार तमीज़ में कहा " तुझे दिख नहीं रहा ? गाडी धूप में जल रही है, अंदर से कवर लेकर ढक दे इसे " इस वाक्य को सुन कर कुछ देर वह अवाक सा रह गया, पैर जैसे जाम हो गए उसके क्योंकि इसी उम्र के, इतनी ही खुबसूरत लड़की के नज़रों में " रब की तरह" होने के सुख को वह अपने मन में अब भी एहसास से भरे रखा था। इस लड़की के ऐसे वाक्य ने उसे झकझोर दिया, और शायद पहली बार ही उसे अपने जीवन के निरर्थकता का एहसास हुआ। आठवें दिन अंदर से किसी ने पानी का मोटर चला दिया था, टंकी भर चुकी थी और पानी फर्श पर बाह रहा था, उसका ध्यान इस बात के तरफ ना होकर शायद उस लड़की के ख्यालों में चला गया था जिसके नज़रों में " रब की तरह" था वह, तभी साहब ने आकर उसे एक जोरदार थप्पड़ रसीद कर दी। वह हकबका गया, निश्चय ही यह चोट उसके मन को लगी थी, जिससे वह कुछ देर के लिए बिखर सा गया। और अनेक गाली-बात सुनने के बाद वह सेक्युरिटी गार्ड भर्ती के दफ़्तर में था, रात भर का जगा हुआ लड़का, बिना खाए-पिए सायं को तीन बजे तक वहीँ दफ़्तर में पड़ा रहा क्योंकि नौकरी से तो उसे निकाल ही दिया गया था, मगर उसके मैट्रिक के सर्टिफिकेट नहीं दिया जा रहा था, सेक्युरिटी गार्ड भर्ती के दफ़्तर को नुकशान हुआ था, उसके भरपाई के लिए वे लोग उससे 1000 रूपया माँग रहे थे। उस समय फोन नहीं था किसी के पास, और उसे लग रहा था, जैसे मैट्रिक का सर्टिफिकेट उसकी जिंदगी है, जिसे छोड़ कर वह जा नहीं सकता। कहने की जरुरत नहीं कि सुबह से सायं तक वह भूखा-प्यासा लड़का  कितना गिड़गिड़ाया होगा, कितना रोया होगा, क्या-क्या सुना होगा और कितना कुछ खोया होगा। बहुत देर होने पर मुझे चिंता हुई और मैं पता करने सेक्युरिटी गार्ड भर्ती के दफ़्तर में गया। वहां जाकर सब वस्तुस्थिति को जानकर आखिर 400 रुपए में बात पक्की कर उसे मैट्रिक के सर्टिफिकेट के साथ घर लेकर आया। आठ दिनों में बारह सौ का नुकशान कलेजे को छिले जा रहा था। मगर वह खुश था, आठ दिनों के बाद वह भरपूर साँस ले रहा था( जो शायद आठ दिनों से रूक-रूक कर उसके फेफड़ों में जा रही थी ), हँस -बोल रहा था, पहले की तरह।  आठ दिनों के बाद ही सही वह मुक्त हो गया उस जीवन से जो शायद उसे बिल्कुल ही खोखला बनाए जा रही थी। @ मनोरंजन

Tuesday, November 15, 2016

भारत में नोट(500  और 1000 ) बंदी
आर्थिक /सामाजिक असंतुलन, अमीरों का बेहिसाब तरीके से और ज्यादा अमीर होते जाना और प्रतिभा/ योग्यता/क्षमता के होते हुए भी गरीबों का कदम-कदम पर अपने आत्मसम्माम/ अपने सपनों को कुचले जाने से भारत देश के  एक बहुत बड़े वर्ग का विश्वास टूटने लगा था, मन में असंतोष/ निराश भरने लगा था, जिससे यह माध्यम/ निम्न माध्यम वर्ग अपने आप को चारों तरफ से घिरा बेबस /लाचार महसूस कर रहा था, जिसके फलस्वरूप अनगिनित लोग तनावग्रस्त / चिड़चिड़े से होने लगे थे, और यह स्थिति ऐसे  तमाम  लोगों के मन में नकारात्मक भावों को जन्म दे रहा था। मैं भी इन्ही लोगों में से एक हूँ, मैं अक्सर खुली आँखों से  ऐसे ख़्वाब देखता था कि काश मुझे राह चलते कुछ लाख/करोड़ रूपया का बैग मिल जाए, मैं लाख कोशिश करता कि ऐसे ख़्वाब  मेरे मन में ना आये, मगर रोज मैं ऐसी अनेकों स्थितियों के बारे में सोचता कि कैसे मुझे मिल सकते है ये रुपए, इस सोच में किसी अमीर आदमी के दुर्घटना से लेकर अनेक अपराधिक सोच होते थे।कभी कहीं पर देखता/ सुनता कि कैसे किसी ने ईमानदारी से किसी का खोया हुआ मोटा धन वापस कर दिया तो ऐसे समाचार पर यकीं नहीं होता था, और लगता था सब नाटक है, कोई राजनैतिक साजिश है।
मगर मोदी सरकार के एक फैसले ने मेरे मन से ऐसे कुविचारों को ख़त्म कर दिया।मुझे लगने लगा कि जो मैं मेहनत से कमाता हूँ, सिर्फ वही मेरा है, बाकी कहीं करोड़ों रुपए भी रखे है तो वो मेरे लिए  सिर्फ कागज़ का ढ़ेर है।
आज तीन-चार घण्टे  पैसे  निकलने के लिए बैंक के बाहर खड़ा रहा, और अंत में मुझे  पैसे नहीं मिले फिर भी मेरे मन में एक बार भी नहीं आया कि सरकार ने ये कैसा झंझट खड़ा कर दिया। मोदी जी,आपके इस कदम ने आमजन में गर्व का भाव भर दिया है, आपको यह देश सैकड़ों सालों तक याद रखेगा। @ मनोरंजन


Saturday, November 5, 2016

छठ महापर्व

सभी देशवासियों को, और व्रती मित्रों/ भाइयों/बहनों और माताओं को "छठ महापर्व " की हार्दिक बधाई और शुभकामना !
मुख्य रूप से बिहार, पूर्वांचल का यह महापर्व अब पूरे देश में सम्पूर्ण आस्था और पवित्र रह कर मनाया जा रहा है।शुक्रवार को 'नहाय-खाय' के साथ चार दिवसीय लोक आस्था अैर सूर्य उपासना का महापर्व छठ प्रारंभ हो गया। परिवार की समृद्घि और कष्टों के निवारण के लिए इस महापर्व के दूसरे दिन शनिवार को छठ व्रती दिन भर बिना जलग्रहण किए उपवास रखने के बाद सूर्यास्त होने पर 'खरना' करेंगे, इस दौरान वे भगवान भास्कर की पूजा करेंगे और बाद में दूध और गुड़ से बने खीर का प्रसाद सिर्फ एक बार खाएंगे तथा जब तक चांद नजर आएगा, तब तक ही जल ग्रहण कर सकेंगे और इसके बाद से उनका करीब 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू हो जाएगा।रविवार को अस्ताचल को जाते सूर्य भगवन को कमर तक पानी में डूब कर पहला "अर्ध्य" दिया जायेगा और सोमवार के सुबह उगते हुए सूर्य को दूसरा "अर्ध्य" देने के साथ यह महापर्व संपन्न हो जायेगा। नदियों/ तालाबों के किनारे इकट्ठा होकर "छठ" गीत गाते श्रद्धालुओं को देख कर मन में आस्था और भक्ति भाव स्वतः ही आ जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया साँचा और फल( नारियल, ईख,घागल नींबू, पानी फल, आदी अनेक प्रकार के फल होते है) भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है।शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रति के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छठव्रती एक नीयत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है। इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले का दृश्य बन जाता है।




Friday, November 4, 2016

कविताएँ

समाज में अमीर और गरीब के बीच अंतर पर दो कविताएँ
समाज में सिर्फ गरीब किसान, मजदूर, भिखारी, सीमा पर लड़ रहे सैनिक, पूर्व सैनिक की पेंसन, कमजोर/ बेसहारा/ बेचारी औरत ही नहीं है जिनके हालात पर कलम घिसे जाए, बल्की एक बहुत बड़ी फौज (शायद करोड़ों में) उन नौजवानों की है जो दिन भर कठीन परिश्रम करके भी सुखद/ संतोषजनक जीवन यापन नहीं कर पा रहे है, उनके सूखे हुए होठों पर, पनियाई आँखों के कातरता में असंख्यों कविताओं/ कहानियों का समंदर छिपा है, जरा झाँक कर कोई देखो तो?

1 .
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बताता नहीं है वह,
कि पिछले तीन-चार घंटों तक,
उसके साथ क्या-क्या हुआ,
कितने अपमान के घूँट पिया उसने,
बदतमीज़ियों से, धौंस, धमकी से कितना कलेजा छिला उसका,
या फिर मारने-पीटने से,
सहम गया, आतंकित हो गया,
बस जानकारी यह मिली कि
उसे, उसके नियोक्ता ने अपने दफ़्तर में,
बंदी बना लिया था,
एक पुलिसवाले के सम्मुख
एक कागज पर उससे हस्ताक्षर करवाया गया,
पंद्रह दिन के भीतर वह पचास हजार रूपया देगा,
या फिर उस पर एक लाख रूपया चोरी का मुकदमा चलेगा,
अपराध सिर्फ इतना कि
अतिरिक्त आमदनी के लिए
उसने अपने नियोक्ता के जानकारी के बिना,
किसी और का काम भी कर रहा था,
पकड़ा गया,
शर्त पर छूटने के बाद,
फ़ोन पर अपनी पत्नी से कह रहा था,
क्या गलत किया मैंने?
इसके दिए हुए आठ हजार से हमारा खर्चा पूरा नहीं हो रहा था,
तो मैंने "पार्ट टाइम" दूसरा काम कर लिया,
इसके दफ्तर को बंद होने से मैंने बचाया था,
अब मैं इस "साले" को बताता हूँ,
और यह कहते हुए
उसकी आवाज कमजोर पड़ जाती है,
शायद डर से , आतंक से,
पर उसके आँखों में आँसू नहीं दिखता,
क्या सचमुच उसका मन रोया ना होगा,
अपने हालात पर, अपने औकात पर ? मनोरंजन

Wednesday, November 2, 2016

पूर्व सैनिक आत्महत्या


बिल्कुल साफ है कि उसको आत्महत्या करने को बहकाया गया है, सोचो ज़रा " कौन ऐसा आदमी होगा, जो सल्फ़ास की गोली खाकर अपने बेटे को फोन करे और बड़े आराम से बोले, बेटा मैंने पॉयजन खा लिया है, ठीक है!" और तो और उसके साथ "कोई है" जो उसे सिख रहा है कि क्या बोलना है, और सारी बात-चीत रेकार्ड भी कर लेता है। वाह रे दुःखी आदमी! 23 हज़ार पेंसन पाने वाला सिर्फ 5 हज़ार रूपया "पेंसन " और नहीं बढ़ रहा इसलिए आत्महत्या कर लिया। वह रे मेरे देशभक्त सैनिक! फिर तो 10 हज़ार रूपया मेहनत कर के कमाने वाले करोड़ों लोगों को आत्महत्या कर लेना चाहिए? क्योंकि सरकार उन पर ध्यान नहीं दे रही है। और इस घटना को इतना जबरदस्त मुद्दा बनाने वाले हमारे राजनेता? निःसंदेह ही देश की राजनीती बहुत ख़तरनाक मोड़ पर आ पहुँची है, जहाँ " ये सब" पब्लिक का सपोर्ट पाने के लिए किसी व्यक्ति का कत्ल करने से भी संकोच नहीं करते। यह कोई पहली बार नहीं हुआ है, अभी पिछले साल ही किसान आंदोलन के समय भी ऐसा ही घटना को अंजाम दिया गया था। एक मानसिक रूप से अस्थिर आदमी से ऐसा करवाना मुश्किल भी नहीं है, एक देश जहाँ लाखों समान्य लोग, बाबा राम रहीम, बाबा परमानन्द, रामपाल महाराज आशाराम बापू , कृपा वहीँ से रुकी है बोलने वाला जैसे हजारों बाबाओं के चक्कर में पड़ कर कुछ भी करने को तैयार हो जाते है, वहाँ एक सीधे-साधे पूर्व सैनिक, एक सामान्य किसान से ऐसा कुछ करवाना क्या आश्चर्य है? @ मनोरंजन 
It is very clear that he was used by someone and coaxed to commit suicide......the Indian politics has reached at very dangerous stage where they kill Individuals to get public support

Monday, October 31, 2016

मैं और तुम

मैं और तुम 
हर बार हम बनने को मिलते है,
हमारे अहम से टकरा कर,
हम चकनाचूर हो जाता है,
और इसके अणु पुरे ब्रह्मांड में बिखर जाते है,
एक लम्बे समयांतराल के बाद,
फिर से एक जगह जुड़ने लिए,
मैं और तुम मिलते है,
मगर एक-दूसरे को मिटाने लिए,
और ये सही भी है,
क्योंकि जब तक मैं और तुम ख़त्म नहीं हो जायेंगे,
हम आकार नहीं ले सकेगा,
मैं और तुम बात नहीं करते एक -दूसरे से,
मगर हम बात करना चाहते है,
मैं तुमसे बात इसलिए नहीं करता की,
मैं जनता हूँ, मेरी आवाज़ नहीं पहुँच पाएगी तुम तक,
तुम, मुझसे बात इसलिए नहीं करती की,
तुम चाहती हो की मैं झुकूँ तुम्हारे ज़िद के आगे,
मैं और तुम एक दूसरे से प्यार नहीं करते,
बल्कि नफ़रत करते है इतना,
जितना और कोई नहीं करता,
ना मुझसे, ना तुमसे,
पर फिर भी हम मिलते है,
ताकि एक-दूसरे को जला कर राख कर सकें,
पर अफ़सोस की ऐसा हो नहीं पाता पूरी तरह,
मैं और तुम फिर से बिखर जाते है टुकड़ों में
इसलिए हम नहीं बन पाते। @मनोरंजन

दिवाली उपहार

(कहानी )
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दिवाली की तैयारियाँ चल रही है, साहब के घर पर काम बहुत बढ़ गया है। रोज रात में देर से आने के बाद "हरी" अपने पत्नी से कहता है। "अपने घर में भी दिवाली की तैयारी करनी है" उसकी पत्नी कहती, इतने दिनों से सोच रहे है, घर में कोई ढंग का बर्तन नहीं है, इस धनतेरस पर बर्तन खरीदना है, तुम साहब से बोलो ना एडवांस में पैसे के लिए, वे माना नहीं करेंगे।पर हरी बात को टाल जाता है, कहता है,वे खुद ही देंगे, महिना भी तो लग गया है, इस दिवाली पर मासिक वेतन के साथ बोनस भी देंगे तो हम बर्तन खरीद लेंगे। जैसे-जैसे दिवाली नजदीक आती गई, साहब के घर पर आने-जाने वालों का दिन भर ताँता लगा ही रहता है, साहब के ऑफिस का नौकर घर चला गया है, इसलिए अपने सारे काम करने के साथ-साथ लोगों को चाय-पानी और मिठाई खिलाते रात हो जाती है। इधर हरी की पत्नी ने हर साल की तरह इस बार भी धनतेरस के दिन मिट्टी के कुछ दिए और एक झाड़ू खरीद लिया। दिवाली के दिन सबकी छुट्टी थी मगर साहब ने कहा " हरी तुम कल सुबह आ जाना, तुम्हारी दिवाली भी तो देनी है" हरी मन ही मन बहुत प्रसन्न हुआ, घर जाकर अपने पत्नी को बोला, कल साहब ने सिर्फ मुझे बुलाया है अपने घर पर, कुछ खास दिवाली के उपहार देंगे मुझे, आदमी की परख है उन्हें, साहब इसीलिए सबसे ज्यादा मुझे मानते है।अगले दिन तड़के ही उठ कर हरी साहब के घर पर चला गया, इधर उसके बच्चे पटाखे और मिठाई के लिए अपनी माँ को परेशान कर रहे थे। वह बच्चों को समझाती कि थोड़ी देर में ही उनके पापा आ जाएँगे तो चल कर ढेर सारी मिठाई और पटाखे खरीदेंगे। बच्चे दिन भर अपने पिता की राह देखते रहे, इधर-उधर भटकते रहे। जब सायं ढलने लगी तब तो हरी की घरवाली भी चिंतित हो उठी, घर में पूजा का सारा काम पड़ा था, मगर उसका ध्यान सिर्फ अपने पति के राह देखने में ही लगा रहा। उधर साहब के घर पर आज रोज से भी ज्यादा लोगों का आना-जाना लगा रहा, लोग कीमती डब्बों में मिठाई और ड्राई फ्रूट उपहार में ला रहे थे, हरी उन पैकटों को समेट कर साहब के बैठक से साहब के घर में पहुंचाता रहा, उन्हें चाय-पानी पिलाता रहा, मिठाई खिलाता रहा, और सोचता रहा कि मासिक वेतन के साथ इसी में से कोई पैकेट साहब उसको उपहार दे दें तो कितना अच्छा हो, ड्राई फ्रूट के पैकेट पर चढ़ी पन्नियों से सब दिखता था, इसमें से कई ऐसे मेवें थे, जो हरी ने कभी नहीं खाए थे। लोग बैठक में बैठ कर किस्म-किस्म के बातें करने लगते , कोई पाकिस्तान के दुनिया में अलग-थलग पड़ने की बात करता तो कोई देश की राजनीती पर बात करता। समय बहुत तेज़ी से बितता जा रहा था, और इसके साथ ही हरी मन ही मन झुंझलाते जा रहा था। वह सोच रहा था कि ये लोग ये कैसी-कैसी बात लेकर बैठ जा रहे है, पर्व-त्यौहार का दिन है, जल्दी जाए ताकी साहब भी जल्दी फुरसत पाकर उउसको दिवाली देकर, उसे विदा करें। पर ऐसा हुआ नहीं, सायं तीन-चार बजे तक हरी के चेहरे का सारा उत्साह और ख़ुशी निचोड़ी जा चुकी थी। साहब उठते हुए बोले " मैं तो बहुत थक गया हरी, तू बैठ थोड़ी देर, कोई आये तो चाय-पानी देना, मैं एक बार नाहा कर आऊ। साहब को अंदर गए करीब दो घंटे हो चुके थे, इस बीच ,पता नहीं भूख से या किस बात से, हरी के आँखों से आँसुओं के बाँध कई बार टुट चुका था। अँधेरा हो गया था, हरी अभी भी सुनी-सुनी आँखों से साहब के घर के गेट को देख रहा था। आखिर जब पूजा का समय हो गया तो साहब अपने दोनों बेटों के साथ बाहर निकले।साहब के बेटों के हाथों में बड़े-बड़े पटाखों के पैकेट थे, साहब उन्हें सावधानी से पटाखे जलाने की हिदायत दे रहे थे। फिर हरी के पास आकर ऐसे बोले जैसे कुछ हुआ ही नहीं है, "आरे हरी,कोई आया तो नहीं था? मैं तो नहा कर सो गया था, निंद आ गई थी। हरी को कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या कहे? वह मन ही मन सोच रहा था कि अभी भी भीख माँगने पर ही साहब उसे उपहार देंगे क्या? उसके हलक के अंदर एक घुटी-घुटी सी चीख़ निकल कर होठों तक आती, फिर वापस चली जाती। किसी तरह खुद को संयत करते हुए, उसने कहा " साहब मेरा वेतन दे देते तो, बच्चे मेरा राह देख रहे होंगे। साहब ने घर से लाकर उसका वेतन और एक मिठाई का पैकेट पकड़ा दिया( वेतन में से तीन हजार रूपया काट लिए थे, जो हरी ने महिने के शुरू में ही एडवांस लिया था, पत्नी के दवाई के लिए)। @ मनोरंजन

Wednesday, October 26, 2016

आँसू जो शब्दों में ढलते है

आँसू जो शब्दों में ढलते है ------------------------------लिखना नहीं चाहता मैं इसे,पर मजबूर हूँ,ख़ुद के तसल्ली के लिए/ मन बहलाने के लिएलिखना जरूरी है,किसी के दुर्भाग्य की कहानी/कविता में कोई क्यों रस लेगा?पर लिखना आत्मसर्वेक्षण भी तो हो सकता है,बने वे लोग लेखक/ कविजो पूरे मनोयोग से जुड़े हुए है इसमें / डूबे हुए है मोती पाने की आस में,चमके वे हिंदी साहित्य के आकाश में,हमें नहीं बनना लेखक/ कवि,ना योग्यता है, ना सामर्थ है,हम तो इस कदर लिपटे है दुःख/ पीड़ा के लीस्फीसाहट में,कि जब भी कुछ लिखते है,आत्मप्रवंचना सा ही लगने लगता है,ज्यों "लासा (चिपचिपा पदार्थ)" में लिपटे हुए,लासा कूटते जा रहे है,जिसका कोई तूक नहीं है, ना कोई परिणाम है,पर दुःख है/ पीड़ा है,और ये दुःख हमें रोने को मजबूर करता है,बहुत मुमकिन है कि आँसू जो शब्दों में ढ़लते है,उनका आकार -प्रकार सुगठित/ सुसंस्कृत ना हो क्योंकि आखिर ये आँसू, पानी ही तो है। @ मनोरंजन

Sunday, October 23, 2016

ख़्वाबों के पंख

ख़्वाबों के पंख
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उड़ना था मुझे,
ख़ूब ऊँचा खुले आसमां में,
बचपन से,
सोते-जागते, चलते-फिरते,
ऐसा लगता था कि अभी उड़ने लगूँ,
अभी भी लगता है कि मैं उड़ सकता हूँ,
पर कहाँ उड़ सका मैं?
सुबह अपने पैरों को घसीटते हुए दफ्तर जाता हूँ,
और फिर सायं को धूल - गरदा और धूप से मुरझाए,
वापस अपने पैरों को घसीटते घर पहुँचता हूँ,
घर?
(वह जगह जहाँ पहुँच कर दिमाग का झनझनाहट और,
पैरों के थकावट पल भर में गायब हो जाता है)
वह घर नहीं है अब मेरे पास,
दिवारें है,जिनसे टकराकर लौट आती है हर आवाज़,
मैं ऊबने लगता हूँ, झुन्झुलाने लगता हूँ,
और कातर नज़रों से देखता हूँ उन दो खिड़कियों को,
जो अभी तैयार नहीं है, सिर्फ ख़ाका खिंचा गया है,
फिर भी मन मुस्कुरा उठता है उन्हें देख कर,
लगता है, ये खिड़कियाँ जब खुल जाएँगी,
उड़ सकूँगा फिर से मैं
जैसे पहले जब "घर" था तो ऐसा ही होता था,
मैं रात में अच्छे से नहा- खाकर सो जाता था,
और ख़्वाब वही आते थे कि मैं उड़ रहा हूँ,
सुबह फुर्ती से उठ कर,
पूरे जोश और उत्साह से दफ़्तर जाता था,
क्योंकि मुझे लगता था,
मैं एक दिन उड़ सकूँगा। @ मनोरंजन

Friday, October 21, 2016

सोचो जरा(1)

सोचो जरा(1)
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मोती चुगने का हक़ सिर्फ हंस को ही क्यों हो?क्या सिर्फ इसलिए कि वह हंस है,"कौवा" जो नित नए प्रयास करता है,
मेहनत करता है,जीवन में बेहतर पाने को संघर्ष करता है,वह मोती क्यों ना चुगे?सैकड़ों वर्षों से मस्तिष्क पटल पर,परत-दर-परत चढ़ाए गए रूढ़ियों को,पोछने में कितना वक्त लगेगा?कब तक राजा का बेटा "राजा" और तवायफ की बेटी तवायफ बनते रहेगी?सोचो जरा,दो बेटियों को पैदा करने वाले शख़्स से मिलने वाला,हर जहीन और समझदार आदमी क्या कहता है?(अनपढ़ों और मूर्खों की तो कोई सीमा ही नहीं होती)"चलो ये तो ईश्वर की मर्जी है, इसमें इंसान क्या करे"अब आगे की सोचो,क्यों?अब आगे की क्यों सोचें?जिनके दो बेटे हो जाते है,वो क्या सारे जहाँ की ख़ुशी पा जाते है,और उन्हें क्या "आगे" के बारे में सोचने की जरुरत ही नहीं है?पर नहीं कहता कोई भी उनसे ऐसा,सैकड़ों सालों की जमी रूढ़ियाँ,यों ललाट के पसीने पोछ देने जितने आसान तो नहीं,सोचो जरा-------------@ Manoranjan


Wednesday, October 19, 2016

एक घर जो मकान रह गया

 एक घर जो मकान रह गया
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कितने उल्लास/अभिमान से बताते है वे,
एक नम्बर के ईंट चुनवाया है मैंने अपने घर में,
इतने " पिल्लर" यहाँ किसी के घर में नहीं लगे,
मैंने लगवाया है,
रेती, छड़, सिमेंट ,रोड़ी  खरीदा,
तो पैसे को नहीं देखा चीज़ के आगे,
पसीने से तरबतर, सूखते हलक से चिल्लाते,
मजदूरों को ईंट पकड़ाते,
कुछ देर ज्यादा काम करने को निहोरा करते,
थकते नहीं है वे,
बाल्टियों में पानी भर-भर कर पकड़ाती,
चुनवाये गए ईंटों, प्लास्टरों पर पानी की तराई कराती,
वह बुजुर्ग औरत,हौसला बढाती है उनकी,
छत की तराई कराती, हाँफती हुई, अपने सांसों को काबू में करती,
अपने आँचल से चेहरे के पसीने को पोछती हुई,
मुस्कुरा कर अपने पति को हलकी झिड़की देती है,
"क्यों बच्चों जैसे चुहल कर रहे हो"
मुंडेर से पैर फिसल जायेगा,
इस मुंडेर को ऊँची करावा दो,
कल को हमारे नाती-पोते स्वच्छन्द होकर खेलेंगे छत पर,
सात कमरे, एक रसोई, एक स्नानघर,
खूब हवादार दलान  और एक कोठारी मवेशियों के लिए,
सायं को थाली में पति को खाना देते हुए कहती है,
जब पुरा घर भर जायेगा, बेटे-बहुओ से तो,
हम दोनों यहीं दलान में सोयेंगे,
खूब झर -झर  हवा लगता है यहाँ,
माथे पर चुनचुना आए पसीने को आँचल से साफ करती,
अद्भुत संतोष और उत्साह से कहती है,
जब चारों बहुयें सायं को छत पर हवा खाने को टहलेन्गी,
तो ऐसा लगेगा कि जैसे मेला लगा हुआ है,
रंग-बिरंगी साड़ी पहने, उछलते-कूदते बच्चों के साथ,
कितना मनभावन लगेगा  ना जी?
निर्मम वक्त और परिस्थितियों से अनजान,
वे भी बच्चों जैसे मुस्कुराने लगते है,
फिर थोड़ा चुप रह कर कहते है,
कल से दरवाजे लगाने वाले मिस्त्री, पेंट करने वाले आएंगे,
संभाल लोगी ना?
उनका नाश्ता-पानी सब कर लोगी ना?
हौसला रखो, अब पूरा ही हुआ जा रहा है घर अपना,
अपने बाँहों से पानी पोछते, पैरों के बिछिया को घुमाती हुई कहती है,
"लो जी मैं क्या बुढ्ढी हो गई हूँ? जो ऐसा कहते है"
क्या जानते नहीं इन्ही हाथों से अकेले साठ लोगों को बनाया-खिलाया है मैंने,
और वे ठहाका लगा कर हँसने लगते है,
. . . . . . . . . . . . . . . .और घर बन गया,बहुएँ भी आ गई,
दो-तीन सालों में ही नन्हे-मुन्हे भी आ गए,
पर उन्हें हँसते -खिलखिलाते देखने की हसरत रखने वाली आँखें थक गई,
उत्साह, उल्लास से भरा चेहरा मुर्झा गया,
कभी ना थकने वाली का साथ सांसों से छोड़ दिया,
वक्त क्या इतनी तेज़ी से बदलता है?
क्या सोचे होंगे वे ?
जो अब उसी खूब हवादार दलान में एक "ठूंठ"से रह गए है?
जिसके सारे पत्ते, साख, टहनियाँ
एक-एक कर टूटती गई उनसे,
. . . . . . . . . . . . . सात कमरे, एक रसोई, एक स्नानघर खड़े है ज्यों के त्यों,
बंद दरवाजे ,काश्तकारी की हुई,
कभी-कभी हवा के टकराने से बज जाते है,
तो हुलसकर दौड़ते से अंदर जाते है,
फिर ठिठक जाते है,
नहीं, होगा कौन? मन ही मन बोलते है,
फिर दलान में  लगी अपनी पत्नी के तस्वीर को देख,
आँखों को पोछते हुए कहते है,
सचमुच सठिया ही गया हूँ मैं। @ मनोरंजन

Sunday, October 16, 2016

कहानी

कहानी
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बात बहुत दिन पुरानी है, जब मैं पैसे घर पर मनीऑर्डर से भेजा करता था। उस दिन सुबह-सुबह ही खा-पीकर पोस्टऑफिस जाने के लिए निकल गया। रस्ते भर मन प्रसन्न रहा, क्योंकि तब घर पर पैसे भेजने का एक अलग ही उत्साह रहता था मन में, मन प्रसन्न हो तो आस-पास का माहौल भी खुशनुमा लगता है, और ऐसे में अपने आप पर गर्व सा महसूस भी होता है कि भाई हम भी कुछ खास है। तो इसीतरह के एहसास लिए हुए मैं पोस्टऑफिस में दाखिल हुआ। वहाँ भीड़ बहुत ज्यादा नहीं थी, मैं लाइन में लग गया। थोड़ी देर के बाद एक लड़का आया, कपडे उसके बिल्कुल गंदे हो रखे थे, वह ख़ुद भी मैला था नहीं गन्दा ही था, उसको देख कर ही बताया जा सकता था कि वह पढ़ा-लिखा नहीं है। पता नहीं इतने सारे लोगों में उसने मुझ में ही क्या देखा कि आकर मेरे पास कहा, भैया थोड़ा मेरा मनीऑर्डर का फार्म भर दो, पैसे घर पर भेजने है। मैं एक बार फिर गर्व के एहसास से भर गया और थोड़ी मदत करने के नियत से मैंने उसका फार्म लेकर भरना शुरू किया, उसने 200 रूपया फार्म पर लिखवाया, मुझे लगा सचमुच बेहद ग़रीब लड़का है, मुझे उससे हमदर्दी भी होने लगी । अब जहाँ पर हम दोनों लोग थे वहाँ से बाकी के लोग थोड़े दूर हो गए थे। उस लडके ने अपने जेब से रूमाल में बंधा एक नोटों की गड्डी निकली और कहा कि भैया ये पैसा हमको बैंक में जमा करना है, कैसे करेंगे? मैंने कहा कि इसके लिए तो तुम्हे बैंक जाना पड़ेगा, पर इतने पैसे तेरे पास आए कहाँ से? मैंने पूछा । उसने कहा कि वह किसी घर में नौकर का काम करता है, उसका मालिक उसे महीने का पगार नहीं देता है, इसलिए मैंने मौका पाकर उसके घर से ये नोटों का बण्डल चुरा लिया है। मेरे मन का समाजवाद तड़प उठा जो अभी बिल्कुल अंकुरित अवस्था में ही था। मेरा उम्र भी उस समय 18 -19 साल से ज्यादा ना था, ऊपर से शरीर भी बेहद कमज़ोर और दुबला-पतला था, शायद इसलिए उसने मुझे ही चुना था अपने मदत के लिए। उस लडके के आँखों ने और उसकी बातों ने मेरे ऊपर एक जादू सा कर दिया था, वह जो भी कह रहा था, मैं बस उसे सुने जा रहा था। उसने कहा कि, भैया आप मुझे कुछ पैसे दे दो क्योंकि मैं अभी घर भाग रहा हूँ, और आप ये मेरा नोट का गड्डी ले लो, क्योकि मुझे तो बैंक में पैसा जमा करने आता नहीं है। उसने अपने जेब से निकाल कर रूमाल में बंधी 100 -100 रुपये की गड्डी मुझे दिखा दी। मेरे मन में लालच आ गया और मैंने उसे अपने पास के 1700 रूपया दे दिया और उसका नोटों का गड्डी लेकर लगभग दौड़ता हुआ घर पहुँचा। ख़ुशी के मरे मेरा दम फुला जा रहा था। मैंने अपने कमरे में जाकर एकदम से दरवाज़ा बंद कर लिया और उस रूमाल में बंधी नोटों की गड्डी को खोल। उस गड्डी में सिर्फ एक नोट 100 का था,बाकी उसके नीचे कागज को नोट के साइज़ में काट कर इसतरह रखा गया था की गड्डी को उलट-पुलट कर देखने पर भी पता नहीं चलता था कि 100 के नोट के अंदर कागज का पुलिंदा रखा है। बस और क्या अब जो होना था मेरे मन को, दिमाग को और मेरे चेहरे को होना था। सब सिर्फ सेकेण्ड भर में झुलस कर काला पड़ गया,..... @ मनोरंजन