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Monday, March 30, 2015

नसीहत

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रुको भाई, जरा ठहरो,
अपने उड़ने वाले घोड़े के बक़ल से,
पैर निकाल कर ज़मीं पर तो रखो,
देखो, कितना ख़ूबसूरत फ़िज़ा है,
जरा इत्मिनान से बैठो यहाँ,
और सब कुछ भुल कर इन नजरों को निरखो,
भरने दो अपनी साँसों में इस ख़ुश्बू को,
छुपा लो अपने मन के किसी कोने में इस ख़ूबसूरती को,
ताकि महसुस होता रहे ये ग़ुलशन तुम्हे पूरी यात्रा में
ठहरो, की ये भी बहुत मूल्यवान है,
तुम्हारी उड़ान की तरह ही,
एक दिन इसे महसुस करोगे तुम,
मगर तब तुम्हे इस उड़न घोड़े के बक़ल से,
पैर निकालने की फुरसत ना मिलेगी। @ मनोरंजन

चरित्रहीन

चरित्रहीन
.............
साँवली काया, भरा- भरा,
चेहरे पर मेहनत की चमक,
रौनक से लबरेज़,
वा लम्बी सी सब्जीवाली,
सर पर टोकरी रखे,
घर-घर जाकर बेचती है मौसमी फल और सब्जियाँ,
घर के अंदर तक चली जाती है,
माँजी, चाची, दीदी,बीबीजी पुकारती,
छोटे बच्चे, उसे देखते ही झूम उठते है,
क्योंकि, शायद सिखा नहीं उसने,
मुस्कुराहटों का कीमत वसूलना,
यों ही कुछ तरबूज़ के छोटे-छोटे-टुकड़ों से,
खरीद लेती है टोकरी भर कर खिलखिलाहटों को,
कभी आंगन में, कभी ड्योढ़ी पर, तो
कभी उस मर्दों के बैठको में,
रखवाई जाती है, उसकी टोकरी,
वे मर्द, जो रखते है गीद्ध दृष्टि,
अपने ही मोहल्ले के रिश्ते में लगती बहन, बेटियों पर,
वे मर्द, जो टटोलते है अपनी नजरों से उम्र के निशां,
अपने ही आँखों के सामने पैदा हुई लड़कियों के,
वे मर्द, जो रखते है, चौकस खबर,
ऐसी ही किसी लड़की की कोई छोटी, मोटी
नाज़ुक उम्र की नादानियों पर,
ताकि साबित कर चरित्रहीन, बदनामी का डर दिखा,
बनाते है रास्ता,
अपनी कुत्सित, विकृत कामनाओं को पूरा करने का साधन,
ऐसे ही मर्द, रखवाते है,
टोकरी उस सब्जी वाली का,
पुछते है भाव,
"कितने में दोगी"
हँस कर बोलती है वह,
किलो का आठ रुपया बाबूजी, चावल-गेहूँ से बराबर,
ठीक है, पहले टेस्ट कराओ,
माल अच्छा होगा तो, मुँह माँगी कीमत वसूल लेना,
फिर हँसती है वह और,
कट कर छोटा-छोटा टुकड़ तरबूज़ पकड़ाती है,
हाथ उठाते समय,
उन नजरों के लक्ष्य को भी बचाती है,
जानती है उन सभी शब्दों के मतलब,
फिर भी मुस्कुराती है,
शायद इसीलिये, कुछ लोग उसे चरित्रहीन कहते है,
पर लोग नहीं देख पाते,
भय से आतंकित, उसके हृदय को,
उसके चेहरे को,
जो सायं ढलते-ढलते- बनावटी हँसी, हंसते-हंसते,
थक चुके होते है,
और फिक्र से अच्छादित ,
लम्बे-लम्बे- डग भरती,
अपने भुखे बच्चों और खेत से लौटे पति के पास,
क्षण भर में पहुँच जाने की आतुरता,
दिखती है,
इस चरित्रहीन के आँखों में। @ मनोरंजन

तुम नहीं समझोगे

तुम नहीं समझोगे 
......................
तुम, मेरे साथ सिर्फ चाय पीने आ जाती हो,
या आई. आई. टी का कैम्पस भा गया है तुम्हे?
यों ही हमेशा की तरह छेड़ा था तुम्हे,
पर पता नहीं,
उस दिन क्या हुआ तुम्हे,
मेरे अर्थहीन बातों पर खिलखिला कर हॅंसने वाला,
तुम्हारे चेहरे का रंग अचानक उतर गया था,
मेरे विनोदशीलता पर कुठाराघात करता,
तुम्हारे सख़्त कंठ से सिर्फ इतना ही निकला था,
"तुम नहीं समझोगे"
और बिना कुछ कहे,
जाने के लिए उठ खड़ी हो गई थी,
उस दिन तुम मोरों के पिछे भी ना भागी थी,
ना उन रंग-बिरंगे फुलों को तोड़ लाने की ज़िद की तुमने,
शायद, उसी नामा कूल दिन ने छीन ली,
तुमसे, सारी चंचलता, तुम्हारी शोखियाँ,
और मुझसे छीन लिया था,
मेरा चैन-ओ-सुकून,
मेरी स्वच्छंदता,
पर आज भी अपने यातनाओं के परकाष्ठा पर,
सोचने को बाध्य हो जाता हूँ,
क्या नहीं समझ सका मैं?
क्या मेरे शब्द, वाकई इतने तीक्ष्ण और हृदयविदारक थे,
जिसने दो दिलों को निचोड़ कर खोखला कर दिया .........@ मनोरंजन

Monday, March 23, 2015

कच्ची उमर का प्यार

कच्ची उमर का प्यार
...................................
कच्ची उमर का प्यार है, सब भूल जायेगा कुछ दिनों में, साकेत के पापा ने, रोती हुई माँ से कहा,
माँ के द्वारा बेटे की दुर्दशा के बारे में कुछ कहने पर वे ग़रजते हुए बोले उसके बचपने को अगर सर चढाओगी तो समाज में कहीं मुँह दिखाने के काबिल ना रहेंगे।
मगर साकेत का प्यार कच्चा ना था, ये उस दिन समझ में आई, जब गुड़िया डोली में बैठ कर, किसी और के बाहों का शृंगार बनाने चली गयी। साकेत बिल्कुल गुम- सुम हो गया था,साकेत ने स्कुल जाते वक्त भी हम दोस्तों से भी कुछ ना बोला, स्कुल के क्लासरूम में बैठे- बैठे- भावशून्य नजरो से दीवार को देखता रहा।
मास्टर जी ने पहले टोका, फिर जोर से डांटा, मगर साकेत पर कोई असर नहीं हुआ, ऐसा लग रहा था की मास्टर जी को अनसुना कर वह दीवार को देखता रहा। मास्टर जी गुस्से वाले थे, उन्हे लगा की इस लड़के की इतनी हिम्मत जो उन्हे अनसुना करें, मास्टर जी ने छड़ी उठा कर सटा-सॅट पांच-छह बेंत लगा दिया। मगर यह क्या , साकेत तो जैसे निर्जीव हो चुका हो, जैसे उसे कोई चोट ही नहीं लग रही, वह उसी तरह बैठे मास्टर जी को टकटकी लगा कर देखने लगा। मास्टर जी गुस्से और अपमान से आग बबूला हो गये और आफिस से छड़ियों का बंडल मांगा कर पांच-पांच-छह बेंत उसके सुकुमार बदन पर तोड़ दिया, मगर साकेत ने ना तो उफ्फ़ किया ना मास्टर जी को घूरना बंद किया। अब डरने की बारी मास्टर जी की थी, नीले निशान साकेत के बदन पर पड़ा था, मगर दर्द, तकलीफ और डर के मारे मास्टर जी थर-थर- काँपने लगे। पूरे स्कूल में हड़कंप मच गया, प्रिन्सिपल साहब दौड़े आए और हम सब दोस्तों को साकेत को लेकर घर जाने को कहा। रास्ते में साकेत ने एक बार अपना मुंह खोला और फिल्म के एक गाने का दो लाइन गाया " जान बहुत शर्मिंदा है" और फफक- फफक कर रोने लगा। हम सब किसी तरह उसे चुप करा कर घर लेकर गये। प्यार कच्चा नहीं था उसका, इस बात का साक्षी बना वो पुराना कुँआ, जिसके चबूतरे के पीछे बैठ कर वह गुड़िया के साथ बैठ कर घंटों बातें किया करता था, और जहाँ आज भी पत्थर पर गुदा पड़ा है नाम दोनो का। अगली सुबह उसी पुराने कुँए में तैरता मिला था कच्ची उमर का प्यार। @manoranjan

नदी के दो किनारों सा हमारा जीवन

नदी के दो किनारों सा हमारा जीवन
..........................................
तुम्हे लगता है की,
मैं बहुत खुश हूँ अपनी दुनिया में,
और मेरे पास तुम्हारे लिए वक़्त कहाँ होगा,
मैं समझता हूँ की,
अब इस हालात में,
जबकि मैं तुम्हारा नहीं किसी और का हूँ,
एक हद से ज्यादा अतिक्रमण तुम्हारे जीवन में,
मेरे द्वारा तुम पर की गई ज्यादाती होगी,
और इसतरह हम दोनों चले जा रहे,
नदियों के दो किनारो की तरह,
एक दूसरे के बीच अथाह जलधारा को समेटे,
कहीं तुम मेरे तरफ मुड जाती हो,
कहीं मैं तुम्हारी तरफ,
पर हम कहीं मिल नहीं पाते,
और इसतरह हम दोनों प्यासे के प्यासे रह जाते है,
नदियों के दो किनारों की तरह। @ मनोरंजन

उसने कहा था

उसने कहा था .....................
एक रचना का अंश ...................
...............................................
रिश्तों ने तो हरदम प्रताड़ित ही किया है, 
सिवा एक माँ के, जो आज भी मुझे,
अपने ज़िस्म--व -रूह की हिस्सा समझती है।
माँ मेरे रिश्ते में नहीं, मेरे ख़ून में है,
माँ, अगर रिश्ते में होती तो वह भी इसकी किमत चाहती,
पर माँ सिर्फ मेरी माँ नहीं है,
वो मेरे सहोदरों की भी माँ है,
पिता की पत्नी है, और भी कइयों के कुछ ना कुछ लगती है माँ,
इनमें से चोट चाहे किसी को भी लगे,
दर्द माँ को ही होता है,
और मैं अपनी माँ को दर्द नहीं दे सकता,
इसलिये सहता हूँ सब कुछ चुप चाप............@ मनोरंजन

यादें

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बचपन में सुने गए कुछ गीत के मुखडे जो आँखों को नम कर देते थे।...................
१. दुई भैया गइला हो देवर, एके काहे हो आइला,
अरे हमार स्वामी क़हाँ बिलमवल् ए देवर जी......
........... ये गीत एक देवर के द्वारा अपने भाभी , पर मोहित हो जाने और उसके बाद अपने भाई को जंगल में ले जाकर मार डालने की बेहद दर्द और करुणा से भरी कहानी पर आधारित एक मार्मिक गीत है जो अब भी आँखें नम कर देती है।
२. बाली उमरिया प्रभु जी योगी भैनी जी, दिनवा के करिहे 
पार....
...................ये गीत गाँव में आने वाले एक सुन्दर नवजवान योगी जब अपने सारंगी बजा कर गाते थे तो घर में औरतें रोने लगती थी।
३. कंकड़ चुन-चुन- महल बनायो, लोग कहे घर मेरा जी,
ना यह तेरा, ना यह मेरा, चिड़ियों का है बसेरा जी।..
यह गीत एक सई फ़कीर गया करते थे। उनकी आवाज़ बहुत खास थी। @ मनोरंजन

बवंडर

बवंडर 
...........
तो तुम्हे भी ये लगता है की,
नित प्रति दिन मरते जा रहे ,
मेरे शब्दों के लिए,
मैं ही कशूरवार हूँ,
मैने ही ख़ुद क़त्ल किया है अपनी कविताओं का,
और किसी का कोई दोष ही नहीं है?
अरे, बवंडर उठता है,
विचारों का,
कुविचारो का,
आशंकाओं के घने बादल छा जाते है,
मेरे अवचेतन के आंगन में,
सब खिड़की, दरवाज़े बंद कर समेटना चाहता हूँ ख़ुद को अपनी कविताओं के साथ,
मगर बाहर के ये तूफ़ान,
जो, तुम लोगों ने खड़ा किया है,
धड़- धड़ा कर मेरे खिड़की के सीसे तोड़ देते है,
दरवाज़े तोड़ते हुए,
वो बवंडर दाख़िल हो जाता है मेरे अंदर,
सारे शब्द तित्तर-- बितर हो जाता है,
मेरा सब कुछ तहस-नहस करके,
खड़ा हो जाता है,
मेरे सामने एक प्रश्न बन कर,
चुनौती देते हुए पुछता है,
जीस क़लम से तुम लिखते हो,
उस क़लम से तुम किसी का ख़ून नहीं बहा सकते,
अरे, कहाँ का कानून है ये,
की मेरे चारों तरफ भय, भुख और भयानक तबाही मचा कर,
कहा जा रहा है की,
तुम प्रेम लिखो, विरह लिखो,
आँसू लिखो, दर्द लिखो, खुशी लिखो,
और तुम कहती हो की,
गुनाहगार मैं हूँ? @ मनोरंजन

इसतरह खुद को बचा के रख लुँगा

इसतरह खुद को बचा के रख लुँगा
..........................................
दर्द नहीं ख़ुशी लिखूँगा,
आँसू नहीं मुस्कान लिखूँगा, 
बेरुख़ियों, बदकिस्मतों से झुलसता जीवन नहीं,
स्नेह सहभागीता की छाया से मिली शीतलता लिखूँगा,,
लिखूँगा जीवन को,
महफिलों की रौनक लिखूँगा,
दोस्तों के ठहाकों को, उनकी महक लिखूँगा,
आत्मग्लानि, अफ़सोस, और संताप नहीं लिखूँगा,
जीत का जश्न और संभावनाओं का आकाश लिखूँगा,
मैं तन्हाइयों की उबासी नहीं लिखूँगा,
सफर की उदासी भी ना लिखूँगा,
मै प्यास नहीं, तृप्‍ति लिखूँगा,
देह और दौलत की अभिव्यक्ति लिखूँगा,
मैं वियोग नहीं, संजोग लिखूँगा,
विरह गीत नहीं,
मिलन क़ी सुमधुर संगीत लिखूँगा,
मैं अपनी उदासियों को,
निराशा और हताशा को नहीं लिखूँगा,
मैं उम्मीद क़ी लौ, आशा क़ी नई किरण लिखूँगा,
इसतरह जो नहीं लिखूंगा,
बचा कर रख लूँगा ख़ुद के गाढे वक़्त के लिए,
किसी अमुल्य धरोहर के रूप में,
छुपाये रखूंगा सारा आक्रोश,
आंदोलन और विद्रोह को ख़ुद के भीतर ,
इसतरह ख़ुद को बचाये रखूँगा.........@ मनोरंजन

स्त्री विमर्श

स्त्री विमर्श
.............
हम धूसर, विरान,
कुछ निर्जीव तमगों को लटकाए,
आसमां बन कर भी ख़ुश है,
तुम जीवन से लहलहाती,
हरियाली से भरपूर,
शस्य-श्यामली धारा बन कर भी ख़ुश क्यों नहीं?
ना जाने कितने दशकों से,
स्त्री विमर्श के नाम पर,
शब्दों को उलझाये जा रहे हो,
सशक्तिकरण के नाम पर,
निर्बलता का एहसास फैलाये जा रहे हो,
हमें तो कहीं नज़र ना आई वो अबला,
हमें तो कहीं नज़र ना आई तुम बेसहारा,
जुल्मों सितम ,सहने वाली,
जब भी देखा,
तुम्हारे आँचल को ममत्व, स्नेह और सहिष्णुता से भरा देखा,
हन मानता हूँ की कभी-कभी,
कुछ पुच्छल तारे, धूमकेतु, कुछ धूल के कण मेरे,
टूट कर गीरते है, तुम्हारे किसी हिस्से पर,
मगर वो समग्र आकाश तो नहीं होता,
तुम्हारे भी तो कुछ हिस्से सिर्फ बर्फ के बने है,
तुम्हारे भी कुछ हिस्से उगलते है आग की ज्वाला,
तुम ही तो जिम्मेवार होती हो उन आँधी, तूफानों, और अनेकानेक त्रसादियों के लिये,
विध्वंस लाकर उजाड़ देती हो उस जीवन को,
जिसे सृजित किया होता है हम दोनो ने,
तुम्हारी सारी कहीं इसलिये तो नहीं की,
हम तुम्हारे उपर क्यों है,
पर ये शिकायत, तुम्हे उस वक्त तो नहीं होती,
जब दूर कहीं भरती हो अपने आग़ोश में,
अपने आकाश को,
हाँ उनकी शिकायत वाज़िब है,
जिनका आकाश अभी मिला नहीं उससे,
पर इसके लिये तो मत कोसो सृष्टि को,
क़ुदरत ने ही हमें ऐसा बनाया,
तुम धारा ही बनी रहो,
अपनी समग्र धरणी के गुणों से परिपूर्ण,
मैं बना रहूँ आशमां,
अपनी तमाम अधूरेपन के साथ,
पूरा होने को आतुर,
तकता रहूँ हर पल तुम्हारी ओर,
इसी में हमारे सृजन की सार्थकता है। @ मनोरंजन
..............मुझे लगता है, इसमें काफी सुधार की गुंजाइस है, मित्र जनो के सुझाव का हार्दिक स्वागत है।

आदतें

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आदतों ने ही तो सब बंटाधार कर दिया,
वरना जीना तो कितना सहज था,
सरल था,
सब आसान था,
नैसर्गिक था,
ये कुछ पाने की हसरत ने ही तो सब छीन लिया,
कुछ बनने की चाहत ने व्यक्तित्व को ही विकृत कर दिया,
ये हसरतें, ख़्वाहिशें ना होती तो,
जीवन प्रवाहमय होता,
आनंदमय होता,
सुखमय और,
सृजनात्मक होता.........@ मनोरंजन

अच्छा लगता है

अच्छा लगता है 
...............................
अच्छा लगता है,
बच्चों को किताबों के सागर से,
मोती चुगते देख कर,
मन को रोशनी से नहला जाते है वे लम्हे,
जब अभावग्रस्त और सीमित साधनो में पलने वाले कुछ बच्चे,
दिनभर के तमाम घरेलू कामों को निबटाकर,
सायं ढलते लालटेन की रोशनी में अंग्रेजी कविता के पंक्तियों को सस्वर याद करते सुनना,
अच्छा लगता है,
मासूम छोटे बच्चे को उन नये शब्दों से परिचित करना जिसे सीखने की उत्कट अभिलाषा में व़ह बार बार उच्चारित करता है,
अच्छा लगता है,
उसकी नन्ही उंगलियों को पकड़,
इस खूबसूरत और उसके लिए नई दूनिया के नयेपन से अवगत कराना,
अच्छा लगता है,
एक पिता को अपने बेटे के साथ खेत में काम करते वक़्त स्कूल के बारे में बातें करना,
अच्छा लगता है,
माँ का अपनी बिटिया के बालों को दो चोटी बनाते वक़्त,
कल्पना चावला के जीवन गाथा को रोचक ढंग से प्रस्तुत करना,
अच्छा लगता है,
आस्था में झुके चेहरे पर अलौकिक शांती को देखना,
रोज़मर्रा के भागम-भाग में दौड़ते,
किताब के एक दुकान पर एक प्रतियोगिता परीक्षा के लिये उपयोगी पत्रिका को उलटता पलटता एक लड़के के अंतर्मन के विवशता को भांप कर,
अपने पैसे से व़ह पत्रिका खरीद कर बहुत ही विनम्रता से ले लेने को आग्रह करती उस संभ्रांत महिला का चेहरा अच्छा लगता है,
अच्छा लगता है,
उस मित्र का अचानक ही मिल जाना,
जिससे अलग होकर जीना ही भूल चुके होते है,
.
.
.
.
.
और अच्छा लगता है,
तुम्हारा, मेरी गलतियों को सही करते वक्त,
मेरे सर पर हौले से मारते वक्त,
पगले हो तुम बिल्कुल कहना ,
(एक लम्बी कविता का अंश आप मित्रों के नज़र) @ मनोरंजन

हम साथ नहीं तो क्या हुआ

हम साथ नहीं तो क्या हुआ
.................................
जिंदगी तुम बिन अधूरी तो है,
पर ज़श्न ए संघर्ष की तरह,
आस्था और गर्व की तरह,
अबोध बच्चे के हर्ष की तरह,
हम साथ नहीं तो क्या हुआ,
ख़्वाब जहाँ हकीकत से मिलता है कभी,
जैसे धरा मिलती हुई दिखती है आसमान से कहीं,
कमल के फुल पर जैसे,
सबनम की बूंदें,
साथ भी हर पल और
हर पल ज़ुदा-ज़ुदा सा,
जैसे आँसू की बूंदे ठहरी हो पलकों पर,
रहती हो तुम मुझ में,
मेरे जीवन के सतह पर। @ manoranjan

उदाशियाँ

उदाशियाँ
...............
मन हर रोज प्रफुलित रहे,
ऐसा तो हो नहीं पता,
पसर गई है उदाशियाँ,
जीवन में इसकदर तुम्हारे बाद,
की ढूँढनी पड़ती है खुशी,
उम्मीद की टिमटिमाते दीये की रोशनी में,
और मिलती है ग़र कुछ टुकड़ों में तो,
वो तुम्हारे सुपुर्द करने की ख़्वाहिश में,
पुनः उदाशियों में बदल जाती है,
लोगों को शिकायत है मुझसे की,
मैं क्यों परोसता हूँ उदाशियाँ?
पर क्या करूं?
सिखा ही नहीं मैने मुस्कुराना तुम्हारे बिना,
अब लोगों की आकांक्षाओं, उम्मीदों और
मेरी ख्वाहिशों के नीचे दबने लगी है जिंदगी,
कुछ भी मेरा नहीं बचा अब,
सिवा तुम्हारे यादों से लिपटी उदाशियों के।@ मनोरंजन

अच्छा लगता है

अच्छा लगता है.........कुछ और पंक्तियाँ 
.................................................
अच्छा लगता है,
निराशा के दलदल में,
धंसते जा रहे किसी शख़्स को,
उत्साहवर्धन हेतु,
एक तिनका पकड़ाना,
अच्छा लगता है,
जब मुस्कुराता है वो,
जिसके चेहरे की उदासी,
मुझसे देखी नहीं जाती,
अच्छा लगता है,
जब किसी बुज़ुर्ग के कांपते हुए हाथ,
दुआ देने को मेरे सर को सहलाते है,
अच्छा लगता है,
अंधेरी रात के बाद,
उदित होते सुरज के,
लालिमा को निहारना,
अच्छा लगता है,
किसी के अंधेरे मन के एक कोने में,
हौले से जाकर मोमबती जलाना,
अच्छा लगता है,
जब परिश्रम को जीतते और,
अहंकार को हारते देखता हूँ,
अच्छा लगता है,
जब बढ़ते देखता हूँ उन्हे,
जिनमें बच्चों सा लगन, उत्साह
और अपनी चाहत को पाने की ललक हो,
अच्छा लगता है,
वो संगीत,
जिसमें मिट्टी की ख़ुश्बू,
और ह्रदय की नमी मिश्रित हो,
अच्छा लगता है,
अपने धुन में मस्त,
किसी कलाकार के हाथों,
कोई आद्वितीय, अनुपम सी कलाकृति को,
बनते देखना,
और अच्छा लगता है,
तुम्हारा ये कहना की,
कितना कुछ मिलता-जुलता है हम दोनों में,
जैसे हमारे दर्द और आँसू,
और मुस्कुराने के वज़ह। @ मनोरंजन

कितना भयंकर आश्चर्य है?

कितना भयंकर आश्चर्य है?
.................................
.अब यकीन हो गया,
लड़कियां, इतनी सरल हृदय होती है की,
छोटी- छोटी बातों पर भी खिलखिला कर हॅंसने लगती लगती है,
और लोग ख़ामख़ाह ही,
उनकी हँसी का कोई ख़ास अर्थ निकलने में लग जाते है,
लड़कियां तो कहीं एक छोटे बच्चे को रोता हुआ देख कर भी,
हुलस कर हँसने हुए कहती है,
"अरे देख रोता हुआ कितना प्यारा लग रहा है"
तो कभी चलायमान सीड़ियों पर,
ज़ो नीचे से उपर जाती है,
उपर से एक- दो कदम पैर रख कर,
ठहाका लगा कर हँस पड़ती है,
मेरी डेढ़ साल की बेटी,
जैसे ही देखती है की, कोई उसका फोटो खींच रहा है,
खट से अपनी बतीसी चमका देती है,
सच, कितना आसान है,
लड़कियों को हँसाना,
और कितना भयंकर आश्चर्य है की,
इतना आसान होते हुए भी,
असंख्यों लड़कियों कि हँसी,
ना जाने कहाँ गायब हो गई है।@ मनोरंजन

अब आगे क्या ?

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इसमें तनिक भी संदेह नहीं की,
तुम मेरे दिल ए अज़ीज हो,
संगदिल भी हो,
तुम बहुत अच्छे दोस्त हो,
पर क्या करूँ मैं?
ये समय अमृता-इमरोज़ का नहीं,
ना मिर्ज़ा- साहिबा का है,
भौतिकतावाद के दानव ने,
निगल लिया है,
हर रिश्ते के रूह को,
अब जो बच गया है,
वो स्थूलता है,
और इस स्थूल काया की जरूरतें है,
ये जरूरतें और उन्हे पुरा करने की ज़दोजहद,
पोषित नहीं होने देते प्रेम को,
अंकुरित तो होता है,
अपने शाश्वाकता के साथ,
पर झुलस जाता है,
अपनी पूर्णता को प्राप्त होने से पहले ही,
या निकल कर फेंक दिया जाता है,
अनचाहे गर्भ की तरह,
जनता हूँ,
शाश्वत प्रेम में,
झुकना लाज़मी ही होता है,
पर अब झुकने विकल्प ना रहा मेरे पास,
मैं उर्ध्वामुखी हो,
तुम्हारी ओर देखने को बाध्य हूँ,
अपनी पूर्णता को प्राप्त होने को आतुर,
अब झुकने की बारी तुम्हारी है। @ मनोरंजन

सिर्फ शब्द ही शाश्वत है पार्थ

सिर्फ शब्द ही शाश्वत है पार्थ
......................................
केवल शब्द ही,
अजर है,
अमर है,
सार्थक है,
बाकी सब नाश्वर है पार्थ!
तुम जो भी कर्म करते हो,
शब्द संरचना हेतु ही करते हो,
शब्दों के बिना,
हर कर्म निरर्थक है पार्थ!
सोचो क्या मिला किसी शाहंशाह को?
उतना ही ना,
जीतना एक फ़कीर को भी नशीब हो जाता है,
सब शब्दों का व्यापार है पार्थ!
ये भय, भूख और भगवान,
भक्ति, आसक्ति और निर्वाण,
सब शब्दों की बाज़ीगरी है पार्थ!
शब्दों ने ही किसी को फुल कहा,
किसी को कहा कांटा,
कई दिलों को जोड़ा,
कई दिलों को बांटा,
शब्दों ने ही प्रेम सिखाया,
और नफरत भी,
जब शब्द नहीं थे,
तब तो सिर्फ देह हुआ करती थी,
शब्दों ने ही इश्क को ईश्वर सा बनाया,
सब शब्दों की महिमा है पार्थ!
शब्दों ने धरती बांटी,
नदियाँ बांटी,
सागर बांटा,
शब्दों ने इंशानों को इंशानों से बांटा,
शब्दों ने ही दीवारें खड़ी की किस्म-किस्म के,
पहले हया, हिया और हसरतें पैदा की,
फिर उन्हे ढकने को परदें बनवाये,
शब्द बहुत ताकतवर है पार्थ!
शब्दो को सिखना, गुनना और बुनना,
एक कला है पार्थ!
ये कला ही जीवन का ध्येय है,
बाकी सब मोह-माया है पार्थ! @ मनोरंजन

Geet (3)

==============
कुछ भी दुनिया में ना बदलेगा,
सब कुछ ऐसा ही रहेगा,
जो हो रहा है आज, कल भी वही होगा।
कहीं एक तार वीणा के टूट जाने से,
इस दुनिया के संगीत थमता नहीं,
कहीं एक आवाज के घुट जाने से,
बहारों के गीत थमते नहीं,
कल भी पंछी चहकेंगे, नया सवेरा होगा,
जो हो रहा था आज तक, कल भी वही होगा। @

बुरा ख़्वाब

=============
कल एक सपना देखा,
सपने में देखा मैने की,
उसने, मुझसे कुछ मांगा था,
मैं बार-बार दौड़ता हुआ,
कभी इधर, कभी उधर, 
चारो दिशाओं में भाग रहा था,
और बार-बार हताश होकर वापस आ जाता,
मेरे चेहरे की निराशा, उसे और भी उग्र बना देती थी,
उसकी व्यग्रता बढ़ती जा रही थी,
हर बार उसका चेहरा बिल्कुल सपाट "मुझे बस चाहिये" वाला अंदाज में होता,
वह हर बार बिना मेरे हालत को समझे, मुझे किसी और दिशा में भेज देती थी,
इसीतरह दौड़ते भागते, मैं हाँफने लगा,
और मेरी नींद खुल गई,
नींद खुलते ही, मेरे मुँह से आवाज़ निकली,
"नहीं, ये सही नहीं है"
सही तो तब होता जब,
वह मुझे कोई एक राह/ दिशा ,
चुनने में मेरी मदत करती,
फिर उस राह पर मैं अटल हो आगे बढ़ता जाता,
इसतरह मेरे हाथ को थामे रहती,
फिर भले ही उसे वो चीज़ मिले ना मिले,
मेरे चेहरे पर निराशा की एक झलक भी ना आने देती तो ये सही होता। @ मनोरंजन

काव्यात्मक नहीं मैं

बहुत पेनफुल है रे भाई, दिल का टूटना,
..............और उससे भी ज्यादा पेनफुल है, हृदयहीन लोगों से रिश्ता/वास्ता रखना।
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.काव्यात्मक नहीं मैं
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सृजनशीलता का तक़ाजा तो है की कुछ सार्थक लिखा जाये, पर
दर्द को कैसे लिखें की,
पढ़ने वालों की आँखें ही नहीं रूह भी नम हो जाये,
जहां हर कोई प्रकृति प्रदत जल, जमीन और हवा तक का सौदा करते है,
उन्हे कैसे लिखें की,
इस प्यास की इंतिहां ही नहीं,
ऐसे कौन से शब्द उकेरूँ पन्नों पर,
जो दिलों के अतल गहराइयों में उतर कर,
इस एहसास का धारा प्रवाहित कर सके की,
सच में बहुत सुकून है,
अनगिनित मायूस चेहरे पर,
खुशी का एक टूकड़ा धूप चमकाने  में। @ मनोरंजन

अकविता

अकविता
.............
नहीं.....
नहीं लिख सकता मैं कोई कविता,
जब भी लिखूँगा, आवेग ही लिखूँगा,
कोरी, झुठी, बनावटीपन के सरोकारों को लिखते हुए,
अँगुलियाँ काँपने लगती है मेरी,
मेरे अंदर में बैठा कोई,
आकर ,मेरे सामने बैठ जाता है,
धिक्कारने लगता है मुझे,
छंद-- राग, और तुकबंदी मिलते देख,
ठहाका लगा कर हँसता है और,
हिक़ारत की नजरों से देखता हुआ कहता है,
"क्यों तू भी कवि बन गया ना?"
बुज़दिल.....क़ायर.....अकर्मण्य,
नहीं,
नहीं लिख सकता लिज़लिज़े प्रेम के असफ़लता के किस्से,
हृदयहीन मतलबपरस्ती, कोरे आँसू, ओज़विहीन, शौर्यहीन मोहब्बत दास्तां,
रूह तक को विषाक्‍त कर देने वाली,
जब भी लिखूँगा,
अंधेरे पर रोशनी की फ़तेह लिखूँगा।....( अंश) @ मनोरंजन

नियती

नियती
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बोझिल आँखों के पलकों पर,
लटके, तुम्हारे यादों के काले बदल, 
झर-झर, झरते नहीं, बरसते नहीं,
बस दुखते है,
पल-पल-हर पल,
मौसम बदलते रहता है,
पर इन आँखों के बादल छँटते नहीं,
हटते नहीं एक पल के लिये भी,
अब जबकी तुम भी ऐसा समझने लगी हो की,
मैं जो कुछ भी कहता हूँ,लिखता हूँ,
वो सब मेरी कविताओं के हर्फ़ होते है,
मेरे पलकों पर मँडराते ये काले बादल,
बरसने का हक भी खो देते है,
और अब ये लगता है की,
बिन बरसे ही रह जाना, इनकी नियती बन गई है।@ मनोरंजन

व्यर्थ से अर्थ निचोड़ना

लिखता नहीं,
बस बयाँ करता हूँ,
अपने जीवन के उन,
अनवरत, अंतहीन रातों में,
दर्द के सरगोशियों के बीच,
अनन्त सपनों को जन्म देने,
और फिर अपने ही हाथों दफ़न करने का दास्तां,
ना जाने क्यों, तुम्हारे कानों तक,
उन सुहाने सपनों की आहट पहुँचने की,
जिजीविषा बलवती हो उठती है,
ये जानते हुए भी की,
तुम्हारे लिये,उन सपनों का कोई अर्थ नहीं,
और कोई निहितार्थ नहीं,
उन्हे तुम तक ,पहुंचाने की।@ मनोरंजन