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Monday, March 23, 2015

काव्यात्मक नहीं मैं

बहुत पेनफुल है रे भाई, दिल का टूटना,
..............और उससे भी ज्यादा पेनफुल है, हृदयहीन लोगों से रिश्ता/वास्ता रखना।
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.काव्यात्मक नहीं मैं
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सृजनशीलता का तक़ाजा तो है की कुछ सार्थक लिखा जाये, पर
दर्द को कैसे लिखें की,
पढ़ने वालों की आँखें ही नहीं रूह भी नम हो जाये,
जहां हर कोई प्रकृति प्रदत जल, जमीन और हवा तक का सौदा करते है,
उन्हे कैसे लिखें की,
इस प्यास की इंतिहां ही नहीं,
ऐसे कौन से शब्द उकेरूँ पन्नों पर,
जो दिलों के अतल गहराइयों में उतर कर,
इस एहसास का धारा प्रवाहित कर सके की,
सच में बहुत सुकून है,
अनगिनित मायूस चेहरे पर,
खुशी का एक टूकड़ा धूप चमकाने  में। @ मनोरंजन

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