लिखता नहीं,
बस बयाँ करता हूँ,
अपने जीवन के उन,
अनवरत, अंतहीन रातों में,
दर्द के सरगोशियों के बीच,
अनन्त सपनों को जन्म देने,
और फिर अपने ही हाथों दफ़न करने का दास्तां,
ना जाने क्यों, तुम्हारे कानों तक,
उन सुहाने सपनों की आहट पहुँचने की,
जिजीविषा बलवती हो उठती है,
ये जानते हुए भी की,
तुम्हारे लिये,उन सपनों का कोई अर्थ नहीं,
और कोई निहितार्थ नहीं,
उन्हे तुम तक ,पहुंचाने की।@ मनोरंजन
बस बयाँ करता हूँ,
अपने जीवन के उन,
अनवरत, अंतहीन रातों में,
दर्द के सरगोशियों के बीच,
अनन्त सपनों को जन्म देने,
और फिर अपने ही हाथों दफ़न करने का दास्तां,
ना जाने क्यों, तुम्हारे कानों तक,
उन सुहाने सपनों की आहट पहुँचने की,
जिजीविषा बलवती हो उठती है,
ये जानते हुए भी की,
तुम्हारे लिये,उन सपनों का कोई अर्थ नहीं,
और कोई निहितार्थ नहीं,
उन्हे तुम तक ,पहुंचाने की।@ मनोरंजन
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