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Monday, March 23, 2015

इसतरह खुद को बचा के रख लुँगा

इसतरह खुद को बचा के रख लुँगा
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दर्द नहीं ख़ुशी लिखूँगा,
आँसू नहीं मुस्कान लिखूँगा, 
बेरुख़ियों, बदकिस्मतों से झुलसता जीवन नहीं,
स्नेह सहभागीता की छाया से मिली शीतलता लिखूँगा,,
लिखूँगा जीवन को,
महफिलों की रौनक लिखूँगा,
दोस्तों के ठहाकों को, उनकी महक लिखूँगा,
आत्मग्लानि, अफ़सोस, और संताप नहीं लिखूँगा,
जीत का जश्न और संभावनाओं का आकाश लिखूँगा,
मैं तन्हाइयों की उबासी नहीं लिखूँगा,
सफर की उदासी भी ना लिखूँगा,
मै प्यास नहीं, तृप्‍ति लिखूँगा,
देह और दौलत की अभिव्यक्ति लिखूँगा,
मैं वियोग नहीं, संजोग लिखूँगा,
विरह गीत नहीं,
मिलन क़ी सुमधुर संगीत लिखूँगा,
मैं अपनी उदासियों को,
निराशा और हताशा को नहीं लिखूँगा,
मैं उम्मीद क़ी लौ, आशा क़ी नई किरण लिखूँगा,
इसतरह जो नहीं लिखूंगा,
बचा कर रख लूँगा ख़ुद के गाढे वक़्त के लिए,
किसी अमुल्य धरोहर के रूप में,
छुपाये रखूंगा सारा आक्रोश,
आंदोलन और विद्रोह को ख़ुद के भीतर ,
इसतरह ख़ुद को बचाये रखूँगा.........@ मनोरंजन

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