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Monday, March 30, 2015

चरित्रहीन

चरित्रहीन
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साँवली काया, भरा- भरा,
चेहरे पर मेहनत की चमक,
रौनक से लबरेज़,
वा लम्बी सी सब्जीवाली,
सर पर टोकरी रखे,
घर-घर जाकर बेचती है मौसमी फल और सब्जियाँ,
घर के अंदर तक चली जाती है,
माँजी, चाची, दीदी,बीबीजी पुकारती,
छोटे बच्चे, उसे देखते ही झूम उठते है,
क्योंकि, शायद सिखा नहीं उसने,
मुस्कुराहटों का कीमत वसूलना,
यों ही कुछ तरबूज़ के छोटे-छोटे-टुकड़ों से,
खरीद लेती है टोकरी भर कर खिलखिलाहटों को,
कभी आंगन में, कभी ड्योढ़ी पर, तो
कभी उस मर्दों के बैठको में,
रखवाई जाती है, उसकी टोकरी,
वे मर्द, जो रखते है गीद्ध दृष्टि,
अपने ही मोहल्ले के रिश्ते में लगती बहन, बेटियों पर,
वे मर्द, जो टटोलते है अपनी नजरों से उम्र के निशां,
अपने ही आँखों के सामने पैदा हुई लड़कियों के,
वे मर्द, जो रखते है, चौकस खबर,
ऐसी ही किसी लड़की की कोई छोटी, मोटी
नाज़ुक उम्र की नादानियों पर,
ताकि साबित कर चरित्रहीन, बदनामी का डर दिखा,
बनाते है रास्ता,
अपनी कुत्सित, विकृत कामनाओं को पूरा करने का साधन,
ऐसे ही मर्द, रखवाते है,
टोकरी उस सब्जी वाली का,
पुछते है भाव,
"कितने में दोगी"
हँस कर बोलती है वह,
किलो का आठ रुपया बाबूजी, चावल-गेहूँ से बराबर,
ठीक है, पहले टेस्ट कराओ,
माल अच्छा होगा तो, मुँह माँगी कीमत वसूल लेना,
फिर हँसती है वह और,
कट कर छोटा-छोटा टुकड़ तरबूज़ पकड़ाती है,
हाथ उठाते समय,
उन नजरों के लक्ष्य को भी बचाती है,
जानती है उन सभी शब्दों के मतलब,
फिर भी मुस्कुराती है,
शायद इसीलिये, कुछ लोग उसे चरित्रहीन कहते है,
पर लोग नहीं देख पाते,
भय से आतंकित, उसके हृदय को,
उसके चेहरे को,
जो सायं ढलते-ढलते- बनावटी हँसी, हंसते-हंसते,
थक चुके होते है,
और फिक्र से अच्छादित ,
लम्बे-लम्बे- डग भरती,
अपने भुखे बच्चों और खेत से लौटे पति के पास,
क्षण भर में पहुँच जाने की आतुरता,
दिखती है,
इस चरित्रहीन के आँखों में। @ मनोरंजन

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