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Monday, March 23, 2015

उसने कहा था

उसने कहा था .....................
एक रचना का अंश ...................
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रिश्तों ने तो हरदम प्रताड़ित ही किया है, 
सिवा एक माँ के, जो आज भी मुझे,
अपने ज़िस्म--व -रूह की हिस्सा समझती है।
माँ मेरे रिश्ते में नहीं, मेरे ख़ून में है,
माँ, अगर रिश्ते में होती तो वह भी इसकी किमत चाहती,
पर माँ सिर्फ मेरी माँ नहीं है,
वो मेरे सहोदरों की भी माँ है,
पिता की पत्नी है, और भी कइयों के कुछ ना कुछ लगती है माँ,
इनमें से चोट चाहे किसी को भी लगे,
दर्द माँ को ही होता है,
और मैं अपनी माँ को दर्द नहीं दे सकता,
इसलिये सहता हूँ सब कुछ चुप चाप............@ मनोरंजन

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