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Monday, March 30, 2015

तुम नहीं समझोगे

तुम नहीं समझोगे 
......................
तुम, मेरे साथ सिर्फ चाय पीने आ जाती हो,
या आई. आई. टी का कैम्पस भा गया है तुम्हे?
यों ही हमेशा की तरह छेड़ा था तुम्हे,
पर पता नहीं,
उस दिन क्या हुआ तुम्हे,
मेरे अर्थहीन बातों पर खिलखिला कर हॅंसने वाला,
तुम्हारे चेहरे का रंग अचानक उतर गया था,
मेरे विनोदशीलता पर कुठाराघात करता,
तुम्हारे सख़्त कंठ से सिर्फ इतना ही निकला था,
"तुम नहीं समझोगे"
और बिना कुछ कहे,
जाने के लिए उठ खड़ी हो गई थी,
उस दिन तुम मोरों के पिछे भी ना भागी थी,
ना उन रंग-बिरंगे फुलों को तोड़ लाने की ज़िद की तुमने,
शायद, उसी नामा कूल दिन ने छीन ली,
तुमसे, सारी चंचलता, तुम्हारी शोखियाँ,
और मुझसे छीन लिया था,
मेरा चैन-ओ-सुकून,
मेरी स्वच्छंदता,
पर आज भी अपने यातनाओं के परकाष्ठा पर,
सोचने को बाध्य हो जाता हूँ,
क्या नहीं समझ सका मैं?
क्या मेरे शब्द, वाकई इतने तीक्ष्ण और हृदयविदारक थे,
जिसने दो दिलों को निचोड़ कर खोखला कर दिया .........@ मनोरंजन

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