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Monday, March 23, 2015

अकविता

अकविता
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नहीं.....
नहीं लिख सकता मैं कोई कविता,
जब भी लिखूँगा, आवेग ही लिखूँगा,
कोरी, झुठी, बनावटीपन के सरोकारों को लिखते हुए,
अँगुलियाँ काँपने लगती है मेरी,
मेरे अंदर में बैठा कोई,
आकर ,मेरे सामने बैठ जाता है,
धिक्कारने लगता है मुझे,
छंद-- राग, और तुकबंदी मिलते देख,
ठहाका लगा कर हँसता है और,
हिक़ारत की नजरों से देखता हुआ कहता है,
"क्यों तू भी कवि बन गया ना?"
बुज़दिल.....क़ायर.....अकर्मण्य,
नहीं,
नहीं लिख सकता लिज़लिज़े प्रेम के असफ़लता के किस्से,
हृदयहीन मतलबपरस्ती, कोरे आँसू, ओज़विहीन, शौर्यहीन मोहब्बत दास्तां,
रूह तक को विषाक्‍त कर देने वाली,
जब भी लिखूँगा,
अंधेरे पर रोशनी की फ़तेह लिखूँगा।....( अंश) @ मनोरंजन

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