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कल एक सपना देखा,
सपने में देखा मैने की,
उसने, मुझसे कुछ मांगा था,
मैं बार-बार दौड़ता हुआ,
कभी इधर, कभी उधर,
चारो दिशाओं में भाग रहा था,
और बार-बार हताश होकर वापस आ जाता,
मेरे चेहरे की निराशा, उसे और भी उग्र बना देती थी,
उसकी व्यग्रता बढ़ती जा रही थी,
हर बार उसका चेहरा बिल्कुल सपाट "मुझे बस चाहिये" वाला अंदाज में होता,
वह हर बार बिना मेरे हालत को समझे, मुझे किसी और दिशा में भेज देती थी,
इसीतरह दौड़ते भागते, मैं हाँफने लगा,
और मेरी नींद खुल गई,
नींद खुलते ही, मेरे मुँह से आवाज़ निकली,
"नहीं, ये सही नहीं है"
सही तो तब होता जब,
वह मुझे कोई एक राह/ दिशा ,
चुनने में मेरी मदत करती,
फिर उस राह पर मैं अटल हो आगे बढ़ता जाता,
इसतरह मेरे हाथ को थामे रहती,
फिर भले ही उसे वो चीज़ मिले ना मिले,
मेरे चेहरे पर निराशा की एक झलक भी ना आने देती तो ये सही होता। @ मनोरंजन
कल एक सपना देखा,
सपने में देखा मैने की,
उसने, मुझसे कुछ मांगा था,
मैं बार-बार दौड़ता हुआ,
कभी इधर, कभी उधर,
चारो दिशाओं में भाग रहा था,
और बार-बार हताश होकर वापस आ जाता,
मेरे चेहरे की निराशा, उसे और भी उग्र बना देती थी,
उसकी व्यग्रता बढ़ती जा रही थी,
हर बार उसका चेहरा बिल्कुल सपाट "मुझे बस चाहिये" वाला अंदाज में होता,
वह हर बार बिना मेरे हालत को समझे, मुझे किसी और दिशा में भेज देती थी,
इसीतरह दौड़ते भागते, मैं हाँफने लगा,
और मेरी नींद खुल गई,
नींद खुलते ही, मेरे मुँह से आवाज़ निकली,
"नहीं, ये सही नहीं है"
सही तो तब होता जब,
वह मुझे कोई एक राह/ दिशा ,
चुनने में मेरी मदत करती,
फिर उस राह पर मैं अटल हो आगे बढ़ता जाता,
इसतरह मेरे हाथ को थामे रहती,
फिर भले ही उसे वो चीज़ मिले ना मिले,
मेरे चेहरे पर निराशा की एक झलक भी ना आने देती तो ये सही होता। @ मनोरंजन
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