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Monday, March 23, 2015

बवंडर

बवंडर 
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तो तुम्हे भी ये लगता है की,
नित प्रति दिन मरते जा रहे ,
मेरे शब्दों के लिए,
मैं ही कशूरवार हूँ,
मैने ही ख़ुद क़त्ल किया है अपनी कविताओं का,
और किसी का कोई दोष ही नहीं है?
अरे, बवंडर उठता है,
विचारों का,
कुविचारो का,
आशंकाओं के घने बादल छा जाते है,
मेरे अवचेतन के आंगन में,
सब खिड़की, दरवाज़े बंद कर समेटना चाहता हूँ ख़ुद को अपनी कविताओं के साथ,
मगर बाहर के ये तूफ़ान,
जो, तुम लोगों ने खड़ा किया है,
धड़- धड़ा कर मेरे खिड़की के सीसे तोड़ देते है,
दरवाज़े तोड़ते हुए,
वो बवंडर दाख़िल हो जाता है मेरे अंदर,
सारे शब्द तित्तर-- बितर हो जाता है,
मेरा सब कुछ तहस-नहस करके,
खड़ा हो जाता है,
मेरे सामने एक प्रश्न बन कर,
चुनौती देते हुए पुछता है,
जीस क़लम से तुम लिखते हो,
उस क़लम से तुम किसी का ख़ून नहीं बहा सकते,
अरे, कहाँ का कानून है ये,
की मेरे चारों तरफ भय, भुख और भयानक तबाही मचा कर,
कहा जा रहा है की,
तुम प्रेम लिखो, विरह लिखो,
आँसू लिखो, दर्द लिखो, खुशी लिखो,
और तुम कहती हो की,
गुनाहगार मैं हूँ? @ मनोरंजन

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