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Monday, March 23, 2015

कच्ची उमर का प्यार

कच्ची उमर का प्यार
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कच्ची उमर का प्यार है, सब भूल जायेगा कुछ दिनों में, साकेत के पापा ने, रोती हुई माँ से कहा,
माँ के द्वारा बेटे की दुर्दशा के बारे में कुछ कहने पर वे ग़रजते हुए बोले उसके बचपने को अगर सर चढाओगी तो समाज में कहीं मुँह दिखाने के काबिल ना रहेंगे।
मगर साकेत का प्यार कच्चा ना था, ये उस दिन समझ में आई, जब गुड़िया डोली में बैठ कर, किसी और के बाहों का शृंगार बनाने चली गयी। साकेत बिल्कुल गुम- सुम हो गया था,साकेत ने स्कुल जाते वक्त भी हम दोस्तों से भी कुछ ना बोला, स्कुल के क्लासरूम में बैठे- बैठे- भावशून्य नजरो से दीवार को देखता रहा।
मास्टर जी ने पहले टोका, फिर जोर से डांटा, मगर साकेत पर कोई असर नहीं हुआ, ऐसा लग रहा था की मास्टर जी को अनसुना कर वह दीवार को देखता रहा। मास्टर जी गुस्से वाले थे, उन्हे लगा की इस लड़के की इतनी हिम्मत जो उन्हे अनसुना करें, मास्टर जी ने छड़ी उठा कर सटा-सॅट पांच-छह बेंत लगा दिया। मगर यह क्या , साकेत तो जैसे निर्जीव हो चुका हो, जैसे उसे कोई चोट ही नहीं लग रही, वह उसी तरह बैठे मास्टर जी को टकटकी लगा कर देखने लगा। मास्टर जी गुस्से और अपमान से आग बबूला हो गये और आफिस से छड़ियों का बंडल मांगा कर पांच-पांच-छह बेंत उसके सुकुमार बदन पर तोड़ दिया, मगर साकेत ने ना तो उफ्फ़ किया ना मास्टर जी को घूरना बंद किया। अब डरने की बारी मास्टर जी की थी, नीले निशान साकेत के बदन पर पड़ा था, मगर दर्द, तकलीफ और डर के मारे मास्टर जी थर-थर- काँपने लगे। पूरे स्कूल में हड़कंप मच गया, प्रिन्सिपल साहब दौड़े आए और हम सब दोस्तों को साकेत को लेकर घर जाने को कहा। रास्ते में साकेत ने एक बार अपना मुंह खोला और फिल्म के एक गाने का दो लाइन गाया " जान बहुत शर्मिंदा है" और फफक- फफक कर रोने लगा। हम सब किसी तरह उसे चुप करा कर घर लेकर गये। प्यार कच्चा नहीं था उसका, इस बात का साक्षी बना वो पुराना कुँआ, जिसके चबूतरे के पीछे बैठ कर वह गुड़िया के साथ बैठ कर घंटों बातें किया करता था, और जहाँ आज भी पत्थर पर गुदा पड़ा है नाम दोनो का। अगली सुबह उसी पुराने कुँए में तैरता मिला था कच्ची उमर का प्यार। @manoranjan

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