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Monday, March 23, 2015

नियती

नियती
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बोझिल आँखों के पलकों पर,
लटके, तुम्हारे यादों के काले बदल, 
झर-झर, झरते नहीं, बरसते नहीं,
बस दुखते है,
पल-पल-हर पल,
मौसम बदलते रहता है,
पर इन आँखों के बादल छँटते नहीं,
हटते नहीं एक पल के लिये भी,
अब जबकी तुम भी ऐसा समझने लगी हो की,
मैं जो कुछ भी कहता हूँ,लिखता हूँ,
वो सब मेरी कविताओं के हर्फ़ होते है,
मेरे पलकों पर मँडराते ये काले बादल,
बरसने का हक भी खो देते है,
और अब ये लगता है की,
बिन बरसे ही रह जाना, इनकी नियती बन गई है।@ मनोरंजन

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