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Monday, March 23, 2015

अच्छा लगता है

अच्छा लगता है 
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अच्छा लगता है,
बच्चों को किताबों के सागर से,
मोती चुगते देख कर,
मन को रोशनी से नहला जाते है वे लम्हे,
जब अभावग्रस्त और सीमित साधनो में पलने वाले कुछ बच्चे,
दिनभर के तमाम घरेलू कामों को निबटाकर,
सायं ढलते लालटेन की रोशनी में अंग्रेजी कविता के पंक्तियों को सस्वर याद करते सुनना,
अच्छा लगता है,
मासूम छोटे बच्चे को उन नये शब्दों से परिचित करना जिसे सीखने की उत्कट अभिलाषा में व़ह बार बार उच्चारित करता है,
अच्छा लगता है,
उसकी नन्ही उंगलियों को पकड़,
इस खूबसूरत और उसके लिए नई दूनिया के नयेपन से अवगत कराना,
अच्छा लगता है,
एक पिता को अपने बेटे के साथ खेत में काम करते वक़्त स्कूल के बारे में बातें करना,
अच्छा लगता है,
माँ का अपनी बिटिया के बालों को दो चोटी बनाते वक़्त,
कल्पना चावला के जीवन गाथा को रोचक ढंग से प्रस्तुत करना,
अच्छा लगता है,
आस्था में झुके चेहरे पर अलौकिक शांती को देखना,
रोज़मर्रा के भागम-भाग में दौड़ते,
किताब के एक दुकान पर एक प्रतियोगिता परीक्षा के लिये उपयोगी पत्रिका को उलटता पलटता एक लड़के के अंतर्मन के विवशता को भांप कर,
अपने पैसे से व़ह पत्रिका खरीद कर बहुत ही विनम्रता से ले लेने को आग्रह करती उस संभ्रांत महिला का चेहरा अच्छा लगता है,
अच्छा लगता है,
उस मित्र का अचानक ही मिल जाना,
जिससे अलग होकर जीना ही भूल चुके होते है,
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और अच्छा लगता है,
तुम्हारा, मेरी गलतियों को सही करते वक्त,
मेरे सर पर हौले से मारते वक्त,
पगले हो तुम बिल्कुल कहना ,
(एक लम्बी कविता का अंश आप मित्रों के नज़र) @ मनोरंजन

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