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इसमें तनिक भी संदेह नहीं की,
तुम मेरे दिल ए अज़ीज हो,
संगदिल भी हो,
तुम बहुत अच्छे दोस्त हो,
पर क्या करूँ मैं?
ये समय अमृता-इमरोज़ का नहीं,
ना मिर्ज़ा- साहिबा का है,
भौतिकतावाद के दानव ने,
निगल लिया है,
हर रिश्ते के रूह को,
अब जो बच गया है,
वो स्थूलता है,
और इस स्थूल काया की जरूरतें है,
ये जरूरतें और उन्हे पुरा करने की ज़दोजहद,
पोषित नहीं होने देते प्रेम को,
अंकुरित तो होता है,
अपने शाश्वाकता के साथ,
पर झुलस जाता है,
अपनी पूर्णता को प्राप्त होने से पहले ही,
या निकल कर फेंक दिया जाता है,
अनचाहे गर्भ की तरह,
जनता हूँ,
शाश्वत प्रेम में,
झुकना लाज़मी ही होता है,
पर अब झुकने विकल्प ना रहा मेरे पास,
मैं उर्ध्वामुखी हो,
तुम्हारी ओर देखने को बाध्य हूँ,
अपनी पूर्णता को प्राप्त होने को आतुर,
अब झुकने की बारी तुम्हारी है। @ मनोरंजन
इसमें तनिक भी संदेह नहीं की,
तुम मेरे दिल ए अज़ीज हो,
संगदिल भी हो,
तुम बहुत अच्छे दोस्त हो,
पर क्या करूँ मैं?
ये समय अमृता-इमरोज़ का नहीं,
ना मिर्ज़ा- साहिबा का है,
भौतिकतावाद के दानव ने,
निगल लिया है,
हर रिश्ते के रूह को,
अब जो बच गया है,
वो स्थूलता है,
और इस स्थूल काया की जरूरतें है,
ये जरूरतें और उन्हे पुरा करने की ज़दोजहद,
पोषित नहीं होने देते प्रेम को,
अंकुरित तो होता है,
अपने शाश्वाकता के साथ,
पर झुलस जाता है,
अपनी पूर्णता को प्राप्त होने से पहले ही,
या निकल कर फेंक दिया जाता है,
अनचाहे गर्भ की तरह,
जनता हूँ,
शाश्वत प्रेम में,
झुकना लाज़मी ही होता है,
पर अब झुकने विकल्प ना रहा मेरे पास,
मैं उर्ध्वामुखी हो,
तुम्हारी ओर देखने को बाध्य हूँ,
अपनी पूर्णता को प्राप्त होने को आतुर,
अब झुकने की बारी तुम्हारी है। @ मनोरंजन
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