पुरुष,स्त्री और प्रकृति- एक आलेख
======================
तुम्हारा वो प्रेमी,
जिसे तुम अपना सबसे अच्छा दोस्त बताती थी,
और जो तुम्हे देखना चाहता था मुस्कुराते हुए,
जीवन भर,
उसकी हार हो गयी है परी,
और जीत गया है,
उसके अंदर का पुरुष,
आकांक्षी तो था, वो हमेशा से ही,
पर, अब जाकर वो प्रकट हुआ है,
सीधा खड़ा हो गया है,
तुम्हारे प्रेमी और सबसे अच्छे दोस्त को पटखनी देकर,
पुरुष हमेशा जीतता है,
और प्रेमी हमेशा हरता है,
पुरुष ने सिखा ही नहीं कभी झुकना,
प्रेम के उन नाजुक क्षणों में भी,
वो जीतना चाहता है,
जब तुम समर्पित कर देते हो,
अपने आप को समपूर्णता से,
वह तब भी होना चाहता है सिर्फ पुरुष,
उसे अपने जीत का जश्न मनाना पसंद है,
भले ही वो जीत, तुम्हारे समर्पण की हार हो,
हर बार तुम कोशिश करती हो की,
तुम्हारे बातों का केन्द्र-बिंदु,
तुम्हारे सपने हो, खुशियाँ हो,
आने वाले कल की कुछ योजना,
और बीते हुए गुजरे पल की कुछ सुखद यादें हो,
पर हर बार, तुम्हारी बातें,
उसके कानों तक आकर लौट जाती है,
उसका अहंकार,उसका स्व-केन्द्रित सोच,
उसे कुछ सुनने नहीं देती,
उसके अंदर बज रहे कामनाओं के ढोल के शोर में,
दब जाती है, तुम्हारी हर अवाज,
तुम्हारी पहचान,
और एक अनाम लेखिका की उक्ति की पुष्टी हो जाती है,
की पुरुष सर से पांव तक सिर्फ लिंग होता है,
उदंड, असहिष्णु, स्वर्थी और संवेदनहीन,
पर स्त्री, सर से पांव तक सिर्फ योनी नहीं होती,
उनके उपर के हिस्से में सहनशीलता, संवेदना,
उससे निचे, प्रेम और समर्पण,
फिर उदर के हिस्से में ममत्व,
स्नेह और सहभागिता होती है।..................मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/