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Monday, June 30, 2014

हवाएँ कैद है जहाँ
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बहुत वक्त गुजर गया,
उसकी कुछ खबर नहीं मिलती,
वहाँ से आने वाली हवाओं को,
कैद कर लिया है किसी ने शायद,
हर रोज होती है,
हजारों मौत जिसके शहर में,
उन्हे कोई चीख सुनाई देती नहीं,
मुर्दनी निंद में बेहोश पड़े है सब शायद.........मनोरंजन
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Saturday, June 28, 2014

स्मृति शेष-6
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दुनिया मुझे जानती है,
एक सुलझे हुए, समझदार इंसान के रूप में,
एक जिम्मेवार और शान्तिप्रिय इंसान के रूप में,
शालीन,सुशील, संवेदनशील इंसान के रूप में,
पर जब भी तुम्हारे सामने आता हूँ,
तो बन जाता हूँ एक बच्चा,
उदंड, गैर-जिम्मेवार और असंवेदनशील,
क्या बोलूँ? क्या ना बोलूँ?
के भँवर में उलझा,
अक्सर कुछ गलत बोल जाता हूँ,
अक्सर कुछ गलत कर जाता हूँ,
तुम समझ लो यही मेरा असली चेहरा है,
क्योंकि, मिलता हूँ जब भी तुमसे तो,
मेरा मन, पूरा मेरे व्यक्तित्वा का आकार ले लेता है,
और जब दुनिया के सामने जाता हूँ,
तो मेरा मन सिकोड़ कर अस्तित्वहीन हो जाता है,
कौन सी स्थिति अच्छी है "परी"?
कौन सा रूप तुम्हे पसंद है?
वो जब मेरा मन पूरा व्यक्तिवा का आकार ले लेता है,
या वो जिसमे मेरा मन सिकोड़ कर अस्तित्वहीन हो जाता है.......मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/


स्मृति शेष-5
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जानता हूँ,
प्यार बहुत मायने रखता है तुम्हारे लिये,
जिस्म नहीं,
ना मेरा ना तुम्हारा,
पर बोलती नहीं हो,
दुनिया भर की बातें बोलती हो,
सिर्फ इसे छोड़ कर,
सब कुछ माँगते हुए झिझकती नहीं,
पर अपना हक,
अपना अधिकार मुझ पर,
नहीं मांगती हो,
सारे फैसले तो तुम्ही करती हो,
फिर ये क्यों मेरे लिये छोड़ दिया?
ये तुम्हारे विश्वास की हार है,
या मेरे हिम्मत की हार है,
जो आज हम एक साथ नहीं है,
बावजूद इसके की प्यार मैं भी तुमसे करता हूँ,
और तुम भी करती हो मुझसे,
क्योंकि सिर्फ मेरे ही आँसू नहीं बहे थे उस दिन,
तुम्हे भी दर्द हुआ था,
तुम्हारी भी अवाज़, भरभरा गई थी,
और जानता हूँ मैं की बेज़ार होकर रोई भी थी तुम,
क्योंकि, प्यार बहुत मायने रखता है तुम्हारे लिये,
जिस्म नहीं।............................................................मनोरंजन
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दिल
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दिल ही मिला था अजीब,
चैन की जिंदगी होने ना दी नसीब,
जिसको चाहा उसे अपना ना सका,
जो मिले वो ना हुए इसके मुनासिब....
दिल ही मिला था अजीब।.............................................मनोरंजन
भुलने लगा हूँ
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बढ़ने लगी है भीड़,
मेरे जीवन कुछ इसतरह,
की भुलने लगा हूँ,
उन तमाम आम-व-खास को,
जिनका कुछ ना कुछ,
बाकी रह गया है मुझ पर,
भुलने लगा हूँ उन्हे,
जिनके मुस्कुराहटों का कर्ज़ अदा करना था,
भुलने लगा हूँ उन्हे,
जिनके आँसू अब तक उधार है, मुझ पर,
भुलने लगा हूँ उन कंधों को,
जिस पर चढ़ कर उफनती नदी को पार किया करता था,
भुलने लगा हूँ, उन आँचल को,
जिससे पोछ कर चेहरे के हर दाग साफ हो जाते थे,
की अब सच लगने लगा है की भूल चुका हूँ,
खुद अपने आप को इसकदर,
की आइने में,
खुद का चेहरा भी पहचान नहीं पता।........................मनोरंजन
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Wednesday, June 25, 2014

स्मृति शेष-४
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जब बैठती हो विश्रामासन में,
अपने हाथों को जोड़ कर,
अपनी आँखों को बंद कर,
ईश्वर का ध्यान लगाती हो,
तो फैल जाती है एक जादुई,
उर्या की अनन्त रेखाएं तुम्हारे ललाट पर,
और बंध जाता हूँ मैं,
एक सुखद सम्मोहन में,
ऐसा लगता है की,
उर्या के वो अनन्त स्रोत,
मेरे अंदर समाहित होने लगते है,
और जिंदा होने लगते है,
मेरे अंदर के कुछ मरे हुए सूक्ष्म एहसास,
क्या ईश्वर से मेरे बारे में कुछ कहती हो?
पूछा था मैने, कई बार तुमसे,
पर हर बार टाल जाती हो,
उस दिन जब भगवान महादेव के,
नन्दी के कानों में हम दोनों बोल रहे थे अपनी प्रार्थना,
तब भी नहीं बताया था तुमने,
और कहा था की, भगवान से जो माँगते है, बताते नहीं,
असर काम हो जाता है,
पर मैने तुम्हे बता दिया था की,
नन्दी के कानों में मैने क्या मांगा था,
मेरी प्रार्थना का असर तो खत्म होना ही था,
क्योंकि मैने तुम्हे बता दिया था,
पर तुम्हारी प्रार्थना, क्यों पूरी ना हुई?
तुमने तो नियमों का सही तरह से पालन किया था।............मनोरंजन
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भूल जाती हूँ मैं
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अक्सर मेरे शिकायत करने पर बोलती है,
समझो ना तुम, सच बोल रही हूँ,
भूल जाती हूँ मैं................
और मैं तड़प कर मूर्छित सा हो जाता हूँ,
कैसे कोई भूल सकता है, अपने दिल-ए-अज़ीज को?
कैसे भूल सकती है वो कोई बात जो मुझसे जुडी हो?
कैसे भूल सकती है वो उसे,
कहती है,अपना सबसे अच्छा दोस्त जीसे,
साझा करती है, हर छोटी-बड़ी बातें जिससे.
पर पहनता हूँ जब, उसका आवरण,
बन जाता हूँ, एक लड़की,
एक लड़की,
जो महानगर की भीड़ में,
खुद को बचाए रखने को कर रही है ज़दोजहद,
जो अपना पाँव जमाए रखने को कर रही है नित संघर्ष,
ताकी जी सके अपने सपने को, 
पूरा कर सके अपने अरमान,
कर सके कुछ सार्थक, बना सके अपनी पहचान,
और इसके लिए, मिलती है रोज अनेको लोगों से,
जैसे मिलती है मुझसे,
सब उससे वैसे ही करते है बातें,
जैसे करता हूँ मैं, उससे,
वो सबको बताती है अपना सबसा अच्छा दोस्त,
दे देती है अपना हाथ, सबके हाथ में,
और सब पकड़ते भी है, उसके हाथ को,
पर किसी एकांत जगह को ले जाने के लिए,
कोई नहीं पकड़ता उसका हाथ,
जीवन भर निभाने के लिए,
और सालों से चलता रहा है ऐसा ही,
अब उसे आदत हो गई है,
और सबके चेहरे, उसे एक से ही दिखते है,
सबकी बातें एक सी ही लगती है,
तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है,
की मुझे,और मेरी कही बातों को भूल जाती है।.........मनोरंजन
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Tuesday, June 24, 2014



दूसरे दुनिया के लोग
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नयन-नक्श सुन्दर है उसके,
पर उसने, शायद इस सच को आत्मसात कर लिया है,
की उसका खाना उतना जरूरी नहीं,
जितना घर के पुरुष सदस्यों का है,
कपड़े भी ऐसी पहनती है,
जैसे जानती हो इस सच को,
की अच्छा है अगर कोई उसे गौर से ना देखे,
और मैं भी कहाँ देखने वाला था उसे,
अगर आँखों में आज काजल ना लगाया होता,
आज रक्षाबन्धन था ना,
बाकी दिनों की तरह अपने भाई के छोडे हुए,
बेढंगे कपड़े नहीं पहने थे उसने,
बल्की आज तो अपनी एकलौती और
बड़े सहेज कर रखी हुई छिट की फ्राक पहन रखी थी,
कितना उमंग और उत्साह दिख रहा था उसके चेहरे पर,
अपने भाई के कलाई पर राखी बांधने की, 
एक बार भी उसके मन में,
नहीं आया होगा शायद,
की जिस तरह उसका भाई जाता है स्कूल,
उसे भी जाने का पुरा हक है,
हक?
इस शब्द से तो शायद परिचित भी ना होगी वो,
बचपन से देखता रहा हूँ उसे ऐसे ही,
कभी उसके चेहरे पर शिकायत ना देखी,
उसके मन में ना आया होगा की,उसके सामने,
हो रहा लड़का-लड़की के बीच, इतना भेदभाव,
गलत भी होता है,
बल्की वो तो खुद इस धरणा में रच-बस गई है इसतरह,
की किसी काम को छुने भी ना देती है अपने भाई को,
एक दिन दिनू काका से पूछ ही लिया,
काका इतने काम क्यों कराते हो इससे?
दिनू काका ने कहा,
बाबु, काम ना करेगी तो कहाँ से जोडूंगा,
इसके दहेज के रूपये।.....
सिधा जबाब था, कुछ बोला ना गया,
बस मन में सोचा,
किसी दूसरी दुनिया के लोग ही है शायद..................मनोरंजन

संग-दिल मिजाज़
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सुन कर तेरे दुख और दर्द को,
आँसू ना आये मेरी आँखों से,
तो ना समझ लेना मुझे बेदर्द,
तू समझ लेना की आँसू है ही नहीं मेरे पास,
दर्द दिल में है मगर,
धूप ने सूखा दी है ये आँसू,
रात को जगते हुए में,
देखता हूँ रोज ख्वाब,
ख्वाब तो अनन्त है,
पर अंत में तो तुम्ही हो,
ख्वाब के शुरुआत में भी,
तुम ही थे मुझको है याद,
ख्वाब का एतबार कर लो,
आए मेरे संग-दिल मिजाज,

मैं समझता हूँ की,
तुम मेरी खामोशी सुनते हो,
सुनते हो तुम,
मेरे दिल से उठने वाली हर आवाज,
मैं तुम्हारी आँखों को देख,
जान जाता हूँ सब राज,
राज को तो राज रहने दो,
मेरे संग-दिल मिज़ाज।

मैं तुम्हारी उम्मीद पर,
खरा ना उतरा तो क्या,
तुम, मेरी उम्मीद के दम पर,
आगे को बढ़ते जा,
बढ़ते जा इस रह में,
हम मिलेंगें कभी-ना-कभी,
तब ही होगी सच में,
हम दोनों के सच का हिसाब।...................मनोरंजन
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Monday, June 23, 2014

लड़की है ना वो
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एक जमाना हो गया है,
किसी ने उसे घर से बाहर देखा नहीं,
हर साल सुनने में आता है की,
उसकी सादी तय हो रही है,
पर हर साल, कभी दहेज को लेकर,
तो कभी लड़की दिखाने की रस्म तक,
पहुँच कर बात बिगड़ जाती है,
दिखती नहीं वो, मगर लोगों के बीच,
अक्सर चर्चा होती रहती है,
जितने लोग उतनी बातें,
पर मैं जानता हूँ उसे,
शायद सबसे ज्यादा,
लोगों की बातें निरर्थक है,
सुन्दर सा चेहरा जो कभी,
खूबसूरत फूल की तरह खिला रहता था,
अब मुरझाकर छोटा सा हो गया है,
जब हंसती है तो, खीरे के बीज की तरह,
उसके छोटे-छोटे दाँत, जैसे मोटी बेखेर देते है,
पर वक्त ने शायद उसकी कद-काठी को भी सिकोड़ दिया है,
सब कहते है पूजा-पाठ में ज्यादा मन लगता है उसका,
ना खाने को कई बहाने है उसकी,
जाती है कभी-कभी अपने पड़ोस के घर में,
जहाँ रहती है उससे छोटी उम्र की सहेलिया,
जो अक्सर उसे विदूषी और धर्मपरायण समझ,
एक हद से ज्यादा सम्मान दे देती है,
उन सहेलियों से तो वो कुछ दिल की बात कर नहीं पाती,
घंटों भगवान के पास बैठी रहती है,
शायद उनसे कुछ कहती होगी।....................................मनोरंजन
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तूने पुकारा मुझे तो,
ये यकीन हुआ की,
आज भी मैं कहीं-ना-कहीं जिंदा हूँ,
तुम्हारी आवाज की खनक ने,
ये जाता ही दिया,
की साँस बाकी है अभी,
मैं, तुममे जिंदा हूँ...................मनोरंजन

Sunday, June 22, 2014

चुल्हे की आग
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चुल्हे पर रोटी सेंकती मां,
आँच को कभी कम, कभी तेज़ कर देती है,
मां जानती है,
चुल्हे के आग को किस तरह,
सकारात्मक परिणाम के लिये नियंत्रित करना है,
पर बाबा नहीं जानते,
और समझाने पर समझते भी नहीं,
चुल्हे की आग, बाबा के चेहरे पर,
हर वक़्त दहकते रहती है,
और उनके परिधि में आने वाले लोगों की,
कोमल भावनायें, उस आग में झुलसते रहती है!..

और झुलसते रहे है,
वो सारे सुक्ष्म एहसास,
जो एक पिता को पुत्र से,
और एक भाई को भाई से,
नैसर्गिक तौर पर जोडे रखता है,
और मरने लगे है वो सारे एहसास,
जिसके लिये एक बहन,
बड़े उत्साह और श्रद्धासे बांधती है,
अपने भाई के हाथ पर राखी,
बाबा बुरे नहीं है,
परिवार के लिये ही जीते है,
पर जड़ता और अति-मोह ने उन्हे,
उन्मंद  और सद्-क्रोधी बना दिया है,
उनके इस चरित्र की दंश,
सबके अंदर इसतरह पैवस्त हो गया है,
की हर कोई घर में अब जलने लगा है
उसी चूल्हे की आग में,
जिस पर रोटियाँ सेंक कर,
माँ ने बडी चाव से किया था,
अपने परिवार का पालन-पोसन,
बनाया था एक छोटा सा घरौंदा अपना,
पर मुझे डर है,
बाबा के चेहरे पर दहकती वह आग,
कहीं घरौंदे को ना छू ले।
.........मनोरंजन

Saturday, June 21, 2014

एक बार जीवन में प्यार कर लो प्रिये।
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लगती हो रात में,प्रभात की किरण सी,
किरण से भी कोमल,कपास की छुवन सी,
छुवन सी लगती हो किसी लोकगीत के,
लोकगीत जिसमें बसी हो गंध प्रीत के,
प्रीत को नमन,एक बार कर लो प्रिये,
एक बार जीवन में प्यार कर लो प्रिये।



प्यार एक पवित्र पुंज, प्यार पुण्य धाम है,
पुण्य धाम, जिसमें की राधिका है, श्याम है,
श्याम की मुरलिया की हर गूंज प्यार है,
प्यार ईस, प्यार श्रधा, प्यार देव नाम है,
इस देव नाम को साँसो में भर लो प्रिये,
एक बार जीवन में, प्यार कर लो प्रिये।

प्यार एक प्यास, प्यार अमृत का ताल है,
ताल में नहाए हुए, चन्द्रमा की चाल है,
चाल वनवासिनी हिरनियों का प्यार है,
प्यार देव मंदिर का आरती का थाल है,
थाल आरती है विचार कर लो प्रिये,
एक बार जीवन में प्यार कर लो प्रिये।

प्यार के शरण में जाओगी, तो तर जाओगी,
प्यार ठूकराकर, बहुत पछताओगी,
पछताओगी जो किया, अपमान रंग-रूप का,
रंग-रूप, जीवन में दूबारा नहीं पाओगी,
प्यार ठूकराकर, मत करो विकल सी,
विकल सी हृदय में, मचा दो हलचल सी,
एक बार अंतर की पुकार सुन लो प्रिये,
एक बार जीवन में प्यार कर लो प्रिये।........................मनोरंजन

Friday, June 20, 2014

ना तुम्हे कुछ हासिल हुआ,
ना मयशर हुई मुझे खुशी,
बेवजह जल कर राख हो गए,
ना फैली सुगंध, ना मिली रोशनी।.....मनोरंजन
पुरुष,स्त्री और प्रकृति- एक आलेख
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तुम्हारा वो प्रेमी,
जिसे तुम अपना सबसे अच्छा दोस्त बताती थी,
और जो तुम्हे देखना चाहता था मुस्कुराते हुए,
जीवन भर,
उसकी हार हो गयी है परी,
और जीत गया है,
उसके अंदर का पुरुष,
आकांक्षी तो था, वो हमेशा से ही,
पर, अब जाकर वो प्रकट हुआ है,
सीधा खड़ा हो गया है,
तुम्हारे प्रेमी और सबसे अच्छे दोस्त को पटखनी देकर, 
पुरुष हमेशा जीतता है,
और प्रेमी हमेशा हरता है,
पुरुष ने सिखा ही नहीं कभी झुकना,
प्रेम के उन नाजुक क्षणों में भी,
वो जीतना चाहता है,
जब तुम समर्पित कर देते हो,
अपने आप को समपूर्णता से,
वह तब भी होना चाहता है सिर्फ पुरुष,
उसे अपने जीत का जश्न मनाना पसंद है,
भले ही वो जीत, तुम्हारे समर्पण की हार हो,
हर बार तुम कोशिश करती हो की,
तुम्हारे बातों का केन्द्र-बिंदु,
तुम्हारे सपने हो, खुशियाँ हो,
आने वाले कल की कुछ योजना,
और बीते हुए गुजरे पल की कुछ सुखद यादें हो,
पर हर बार, तुम्हारी बातें,
उसके कानों तक आकर लौट जाती है,
उसका अहंकार,उसका स्व-केन्द्रित सोच,
उसे कुछ सुनने नहीं देती,
उसके अंदर बज रहे कामनाओं के ढोल के शोर में,
दब जाती है, तुम्हारी हर अवाज,
तुम्हारी पहचान,
और एक अनाम लेखिका की उक्ति की पुष्टी हो जाती है,
की पुरुष सर से पांव तक सिर्फ लिंग होता है,
उदंड, असहिष्णु, स्वर्थी और संवेदनहीन,
पर स्त्री, सर से पांव तक सिर्फ योनी नहीं होती,
उनके उपर के हिस्से में सहनशीलता, संवेदना,
उससे निचे, प्रेम और समर्पण,
फिर उदर के हिस्से में ममत्व,
स्नेह और सहभागिता होती है।..................मनोरंजन
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Thursday, June 19, 2014

तेज़ रफ़्तार वक्त
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बच्चे, कितने तेज़ी से बड़े हो रहे है,
वक्त इतने रफ़्तार से भाग रहा है की,
पिछड़ते जा रहे है,
हम जैसे कुछ, अतीत के अंधेरे में कैद साये,
कितनी तेज़ी से बदल रहे है,
मान्यताएं, वसूल और पारम्परायें,
कितनी तेज़ी से बदल जाते है,
मन के गहरे भीतर,
बड़े जतन से संजोयें भावनायें,
कितनी तेज़ी से बदल जाते है वो लोग,
जो, जीवनपर्यन आभिजात से लगते थे,
कितने तेज़ी से बदल रही है,
मेरे घर में रखी चीज़े,
सब कुछ बदल डालने की,
जैसे होड लगी है,
आँखों से ओझल होते जा रही है,
वो सारी अमानतें,
जो हमारे पुरुखों ने,
संजोए रखा था, ना जाने कितने सदियों से,
कब मेरे आँगन में, बन गए कई दरवाजे,
कैसे टुकडों में बट कर गली रह गई वो आँगन,
जीस आँगन में बिल्कुल तिरछा होकर,
लेट जाया करता था मैं,
लोग अब भी बैठते है,
गलीनुमा आँगन में, अपनी-अपनी तरफ सोफे डाले,
पर अब मैं कहाँ बैठूं?
कल बिटीया कह रही थी की,
पापा ने अगर अपने बच्चों के बारे में सोचा होता तो,
आज ये दिन ना दिखने पड़ते,
अब मैं कैसे समझाऊँ अपनी बिटीया को,
की मैने हमेशा अपने बच्चों के बारे में ही सोचा है,
पर बच्चे, इतनी जल्दी बड़े हो जायेंगे,

मुझे इसका एहसास नहीं था।................................मनोरंजन
ऐसा ही है
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अतृप्त मन, अधुरी ख्वाहिशों,
अधुरे सपनों का भार उठाए, 
जी रहा हूँ, एक अधुरा जीवन, 
जिसमें,
हर रोज थोड़ा-थोड़ा खर्च हो जाता हूँ,
हर रोज कुछ टूटता है,
और बिखरकर गुम हो जाता है,
मेरे जीवन के अंधेरी गुफाओं में,
अंतर में कहीं से आवाज आती है की,
मुक्त करो मुझे इन सबसे,
की अब सच में, बगावत सा करने लगे है,
खुद के भीतर बैठे, खुद के कुछ अंग,
अनमने से मुस्कुराते हुए,
अथाह दर्द छुपाते हुए,
एहसानों, अपमानों का बोझ उठाने,
धूप में निकले है आँसू सुखाने,
उलझी पडी धागों को सुलझाने में,
किसी और के लिये मुस्कुराने में,
पहले से भी ज्यादा उलझते जा रहे है,
खुद मूक पड़े है राहों में,
कराहते रिश्तों के बाहों में,
बेवज़ह, बेमतलब की बातों में,
खुद को उलझाये, खुद को ही बहलाने,
की नाकाम कोशिशों में लगे हुए है,
डरे, सहमे अरमानों को,
बेखौफ होने का मौका मिले तो,
तृप्त हो मन, तृप्त हो जीवन।..................मनोरंजन

Wednesday, June 18, 2014

गीत
===
एक गीत के बोल, जिसके शब्द तो शायद उतने नये नहीं है, पर राग(धुन) बिल्कुल नये है, मैने कम्पोज किया है,इतना सुंदर है की आज-कल हर वक्त मैं इसे ही गुनगुनाते रहता हूँ( कोई कॉपी मत कर लेना, पंजीकृत करा रखा है, ऐसे पचास गीत मैने)....................
(आरे  कोई तनिक हमसे कंटेक्ट करो भइया, और लाकर दो एक-दुई लाख रूपायिया)

तुम हो तो सब कुछ है,
तू नहीं तो कुछ भी नहीं है,
बंजर सी जिंदगी है,
वीराना सा सफ़र है,
अब तो सिर्फ दर्द ही जीवन में है-२।...................मनोरंजन

स्मृति शेष-२
========
एक बार गया था मैं,
तुमसे मिलने,तुम्हारे घर पर,
थोड़ी औपचारिकताओं के बाद,
माँ ने इशारा कर दिया था,
तुम्हारे कमरे की तरफ,
देखा तुम असीम सुकून की नींद सो रही हो वहाँ,
तुम्हारे चेहरे पर ठहरी हुई,
शांती और स्निग्धता को देख ऐसा लगा,
जैसे हरी दूब के उपर एक ओश की बूंद टंगी है,
और जरा सी हरकत से बिखर जायेंगे,
तुम्हारा दुपट्टा, जो तुमने ओढ़ रखा था,
पंखे की हवा से फिसल कर कमर तक आ गया था,
मेरा मन हुआ की,
एक बार तुम्हारी बांहों को छूकर,
तुम्हे जगाऊँ,
फिर देखा अपनी अंगुलियों को,
मुझे लगा, कपास के फूलों सा तुम्हारा बदन,
मेरी अंगुलियों के स्पर्श से मलिन हो जायेंगे,
और मैं उल्टे पाँव, वापस हो गया।............................................मनोरंजन


राहवर
====
अंधेरे में साथ छोड देता है
अपना साया भी,
पर कैसे तुम्हे समझ लेता अपना साया,
तुम तो समाहित थे मुझमें,
इसतरह की अपना साया भी गैर सा लगता था,
यकीन तो मुझे भी नहीं आता की,
जी रहा हूँ मैं,
ये अलग बात है की,
कभी धड़कने सच में रुक सी जाती थी,
तुम्हारे बिना जीने के एहसास से,
मगर मैं जी रहा हूँ, आज भी,
मगर तुम जानते हो, असान नहीं ये जीना,
क्योंकि कुछ रहें तब भी मुश्किल थी,
और अब भी है तुम बिन,
की अकेले चलने की आदत ही ना डाली मैने,
क्योंकि मुझे लगता था,
ताउम्र बने रहोगे मेरे राहवर तुम...........................मनोरंजन
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Tuesday, June 17, 2014

 गुमनाम
======
हम कब,
मैं और तुम हो गये,
पता ही ना चला,
कब वक्त रिसने लगा,
और बूँद-बूँद टपकते गये वो सारे अहसास,
जो हमें, एकसूत्र में समाहित किये हुए थे,
कब पेड़ के पत्तों ने, फूलों ने,
इंकार करना सीख लिया हमारे इशारे को,
पता ही ना चल पाया,
कब गुमनाम हो गये हम,
इस शहर के भीड़ में,
कुछ है इस शहर की फिज़ा में,
बड़ी तेज़ी से मौसम बदल जाते है,
अभी बसंत अपने पूरे यौवन पर आया भी ना था,
की पतझड़ शुरू हो गये,
बहुत गर्म है इस शहर की हवा,
इतने आँसू पीकर भी,
इतनी शुष्क है की,
एक इंच मुस्कुराहट के बदले,
सुर्ख़ होठ सूख कर सफ़ेद हो जाते है,
अब नहीं दिखता पूरा चांद, आसमान में,
तारें भी नहीं दिखते,
घास पर लेटे-लेटे,
पूरी रात निकल जाती है,
लगता है, आसमान सिमट कर,
तब्‍दील हो गया है,
मेरे अँधेरे कमरे की छत में,
जीसपर दिखती है,
कुछ छिपकिली, कुछ अनजाने कीड़े,
डर कर छुपा लेता हूँ,
अपना चेहरा तकिये में,
मैं इतना डरने कब से लगा,
पता ना चल पाया...........................मनोरंजन