पाँच पुत्रियों का एक पिता
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पाँच पुत्रियों का एक पिता,
चलते-चलते झुक जाता है,
जैसे ढो रहा हो अपने पाँचों बेटियों को,
कंधे पर बैठा के,
साँसें उखड़ जाती है,
हाँफने लगता है,
बैठ जाता है कहीं भी,
बिना इसके परवाह किये की,
जीस जगह वह बैठा है,
उस जगह का आसमान,
उसके बेटी के लायक भी है की नहीं,
योग्यता-अयोग्यता की समझ कुंड हो चुकी है उसकी,
उसे बस आसमान एक टुकड़ा चाहिये,
अपने बेटी का सर ढ़कने के लिये,
बेटियों की माँ,
अक्सर अब चुप ही रहती है,
पता नहीं कितने साल हो गये,
उसे चुप हुए,
कोई, किसी बेटी की शिकायत लेकर आता है,
सुन लेती है चुप-चाप,
कभी कुछ बोलती नहीं,विरोध नहीं करती,
अगर ये शिकायत उसके बेटे की होती तो,
शायद झगड़ पड़ती,
हर हाल में बचाव करती अपने बेटे की,
शायद, अगर वो गलत होता तब भी
पर अब चुप रहती है,
पुत्रहीन होने का दंश उसे,
कुछ बोलने नहीं देता,
ऐसे में,
लड़कियां ही संभालती है मोर्चा,
टूट पड़ती है सब एक साथ,
शिकायत करने वाले की,
आवाज दब जाती है उनके शोर में,
लड़कियों ने, शायद सीख लिया है जीना,
सीख लिया है,
उन दबावों को झटक कर आगे बढ़ना,
जो जबरदस्ती लादे गए है उन पर,
खूब हंसती है,
खूब बातें करती है,
जैसे मरना चाहती हो ठोकर,
समाज के द्वारा, थोपे गए,
हर दाकियानुसी सोच को,
जो हर वक्त उनकी हंसी,
उनकी अजादी को,
कैद कर देने को अमदा है,
अच्छे लगते है वो लोग उनसे,
नहीं पुछते बहनों की संख्या,
बस बनते है दोस्त,
और दोस्तों की तरह बातें करे,
कभी शरीरिक व्याधा आने पर,
बुला लेती है बड़ी बेटी मां-पिता को अपने पास,
दमाद भी रखता है अच्छा ख्याल,
पर सदियों से जमी जंग से,
जकडन से मुक्त नहीं हो पाते बेटियों के मां-पिता,
दमाद से बातें करते वक्त,
थोड़े सकुचा से जाते है,
कोई काम के लिये कहते वक्त,
याचक सा भाव उभर आता है,
उनके चेहरे पर,
जो अधिकार और हक अपनी पुत्रवधु पर होता है,
दिखा नहीं पाते वैसा ही हक दमाद के उपर,
पुत्रहीन होने की पिडा,
छट नहीं पाती उनके चेहरे से,
सदियों से चली आ रही,
ये परंपरा,
इतनी असानी से, अचानक नहीं सुलझ सकती,
लड़कियों को लड़नी होगी,
लंबी और प्रबुध लड़ाई,
बेशर्मी, कदाचार, कोलाहल और भोंडेपन से नहीं,
सलिनता से, संस्कारों की दृढ़ता से,
काबिलियत से, सुकर्मों से,
पलटनी होगी इस सोच को,
अपने लिये नहीं,
आने वाली पिढी के लिये................मनोरंजन
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पाँच पुत्रियों का एक पिता,
चलते-चलते झुक जाता है,
जैसे ढो रहा हो अपने पाँचों बेटियों को,
कंधे पर बैठा के,
साँसें उखड़ जाती है,
हाँफने लगता है,
बैठ जाता है कहीं भी,
बिना इसके परवाह किये की,
जीस जगह वह बैठा है,
उस जगह का आसमान,
उसके बेटी के लायक भी है की नहीं,
योग्यता-अयोग्यता की समझ कुंड हो चुकी है उसकी,
उसे बस आसमान एक टुकड़ा चाहिये,
अपने बेटी का सर ढ़कने के लिये,
बेटियों की माँ,
अक्सर अब चुप ही रहती है,
पता नहीं कितने साल हो गये,
उसे चुप हुए,
कोई, किसी बेटी की शिकायत लेकर आता है,
सुन लेती है चुप-चाप,
कभी कुछ बोलती नहीं,विरोध नहीं करती,
अगर ये शिकायत उसके बेटे की होती तो,
शायद झगड़ पड़ती,
हर हाल में बचाव करती अपने बेटे की,
शायद, अगर वो गलत होता तब भी
पर अब चुप रहती है,
पुत्रहीन होने का दंश उसे,
कुछ बोलने नहीं देता,
ऐसे में,
लड़कियां ही संभालती है मोर्चा,
टूट पड़ती है सब एक साथ,
शिकायत करने वाले की,
आवाज दब जाती है उनके शोर में,
लड़कियों ने, शायद सीख लिया है जीना,
सीख लिया है,
उन दबावों को झटक कर आगे बढ़ना,
जो जबरदस्ती लादे गए है उन पर,
खूब हंसती है,
खूब बातें करती है,
जैसे मरना चाहती हो ठोकर,
समाज के द्वारा, थोपे गए,
हर दाकियानुसी सोच को,
जो हर वक्त उनकी हंसी,
उनकी अजादी को,
कैद कर देने को अमदा है,
अच्छे लगते है वो लोग उनसे,
नहीं पुछते बहनों की संख्या,
बस बनते है दोस्त,
और दोस्तों की तरह बातें करे,
कभी शरीरिक व्याधा आने पर,
बुला लेती है बड़ी बेटी मां-पिता को अपने पास,
दमाद भी रखता है अच्छा ख्याल,
पर सदियों से जमी जंग से,
जकडन से मुक्त नहीं हो पाते बेटियों के मां-पिता,
दमाद से बातें करते वक्त,
थोड़े सकुचा से जाते है,
कोई काम के लिये कहते वक्त,
याचक सा भाव उभर आता है,
उनके चेहरे पर,
जो अधिकार और हक अपनी पुत्रवधु पर होता है,
दिखा नहीं पाते वैसा ही हक दमाद के उपर,
पुत्रहीन होने की पिडा,
छट नहीं पाती उनके चेहरे से,
सदियों से चली आ रही,
ये परंपरा,
इतनी असानी से, अचानक नहीं सुलझ सकती,
लड़कियों को लड़नी होगी,
लंबी और प्रबुध लड़ाई,
बेशर्मी, कदाचार, कोलाहल और भोंडेपन से नहीं,
सलिनता से, संस्कारों की दृढ़ता से,
काबिलियत से, सुकर्मों से,
पलटनी होगी इस सोच को,
अपने लिये नहीं,
आने वाली पिढी के लिये................मनोरंजन
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