लड़की है ना वो
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एक जमाना हो गया है,
किसी ने उसे घर से बाहर देखा नहीं,
हर साल सुनने में आता है की,
उसकी सादी तय हो रही है,
पर हर साल, कभी दहेज को लेकर,
तो कभी लड़की दिखाने की रस्म तक,
पहुँच कर बात बिगड़ जाती है,
दिखती नहीं वो, मगर लोगों के बीच,
अक्सर चर्चा होती रहती है,
जितने लोग उतनी बातें,
पर मैं जानता हूँ उसे,
शायद सबसे ज्यादा,
लोगों की बातें निरर्थक है,
सुन्दर सा चेहरा जो कभी,
खूबसूरत फूल की तरह खिला रहता था,
अब मुरझाकर छोटा सा हो गया है,
जब हंसती है तो, खीरे के बीज की तरह,
उसके छोटे-छोटे दाँत, जैसे मोटी बेखेर देते है,
पर वक्त ने शायद उसकी कद-काठी को भी सिकोड़ दिया है,
सब कहते है पूजा-पाठ में ज्यादा मन लगता है उसका,
ना खाने को कई बहाने है उसकी,
जाती है कभी-कभी अपने पड़ोस के घर में,
जहाँ रहती है उससे छोटी उम्र की सहेलिया,
जो अक्सर उसे विदूषी और धर्मपरायण समझ,
एक हद से ज्यादा सम्मान दे देती है,
उन सहेलियों से तो वो कुछ दिल की बात कर नहीं पाती,
घंटों भगवान के पास बैठी रहती है,
शायद उनसे कुछ कहती होगी।....................................मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
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एक जमाना हो गया है,
किसी ने उसे घर से बाहर देखा नहीं,
हर साल सुनने में आता है की,
उसकी सादी तय हो रही है,
पर हर साल, कभी दहेज को लेकर,
तो कभी लड़की दिखाने की रस्म तक,
पहुँच कर बात बिगड़ जाती है,
दिखती नहीं वो, मगर लोगों के बीच,
अक्सर चर्चा होती रहती है,
जितने लोग उतनी बातें,
पर मैं जानता हूँ उसे,
शायद सबसे ज्यादा,
लोगों की बातें निरर्थक है,
सुन्दर सा चेहरा जो कभी,
खूबसूरत फूल की तरह खिला रहता था,
अब मुरझाकर छोटा सा हो गया है,
जब हंसती है तो, खीरे के बीज की तरह,
उसके छोटे-छोटे दाँत, जैसे मोटी बेखेर देते है,
पर वक्त ने शायद उसकी कद-काठी को भी सिकोड़ दिया है,
सब कहते है पूजा-पाठ में ज्यादा मन लगता है उसका,
ना खाने को कई बहाने है उसकी,
जाती है कभी-कभी अपने पड़ोस के घर में,
जहाँ रहती है उससे छोटी उम्र की सहेलिया,
जो अक्सर उसे विदूषी और धर्मपरायण समझ,
एक हद से ज्यादा सम्मान दे देती है,
उन सहेलियों से तो वो कुछ दिल की बात कर नहीं पाती,
घंटों भगवान के पास बैठी रहती है,
शायद उनसे कुछ कहती होगी।....................................मनोरंजन
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