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Thursday, June 19, 2014

ऐसा ही है
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अतृप्त मन, अधुरी ख्वाहिशों,
अधुरे सपनों का भार उठाए, 
जी रहा हूँ, एक अधुरा जीवन, 
जिसमें,
हर रोज थोड़ा-थोड़ा खर्च हो जाता हूँ,
हर रोज कुछ टूटता है,
और बिखरकर गुम हो जाता है,
मेरे जीवन के अंधेरी गुफाओं में,
अंतर में कहीं से आवाज आती है की,
मुक्त करो मुझे इन सबसे,
की अब सच में, बगावत सा करने लगे है,
खुद के भीतर बैठे, खुद के कुछ अंग,
अनमने से मुस्कुराते हुए,
अथाह दर्द छुपाते हुए,
एहसानों, अपमानों का बोझ उठाने,
धूप में निकले है आँसू सुखाने,
उलझी पडी धागों को सुलझाने में,
किसी और के लिये मुस्कुराने में,
पहले से भी ज्यादा उलझते जा रहे है,
खुद मूक पड़े है राहों में,
कराहते रिश्तों के बाहों में,
बेवज़ह, बेमतलब की बातों में,
खुद को उलझाये, खुद को ही बहलाने,
की नाकाम कोशिशों में लगे हुए है,
डरे, सहमे अरमानों को,
बेखौफ होने का मौका मिले तो,
तृप्त हो मन, तृप्त हो जीवन।..................मनोरंजन

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