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Saturday, June 28, 2014

भुलने लगा हूँ
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बढ़ने लगी है भीड़,
मेरे जीवन कुछ इसतरह,
की भुलने लगा हूँ,
उन तमाम आम-व-खास को,
जिनका कुछ ना कुछ,
बाकी रह गया है मुझ पर,
भुलने लगा हूँ उन्हे,
जिनके मुस्कुराहटों का कर्ज़ अदा करना था,
भुलने लगा हूँ उन्हे,
जिनके आँसू अब तक उधार है, मुझ पर,
भुलने लगा हूँ उन कंधों को,
जिस पर चढ़ कर उफनती नदी को पार किया करता था,
भुलने लगा हूँ, उन आँचल को,
जिससे पोछ कर चेहरे के हर दाग साफ हो जाते थे,
की अब सच लगने लगा है की भूल चुका हूँ,
खुद अपने आप को इसकदर,
की आइने में,
खुद का चेहरा भी पहचान नहीं पता।........................मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/

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