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Tuesday, June 17, 2014

स्मृति शेष-1
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मेरा गाँव से शहर जाने का वक्त,
पता नहीं तुम्हे कैसे मालूम हो जाता था,
गलियों से निकलते वक्त,
देखता था तुम्हे, अपने दरवाजे पर खडी,
तुम खडी रहती थी वहाँ तब तक,
जब सड़क के आखिरी छोर पर जाकर,
मैं आँखों से ओझल ना हो जाता,
तुम्हारे आँखों के समंदर में,
कभी झांक ना सका मैं,
पता नहीं क्यों डरता था,
पर तुम्हारी आँखों में भरे पानी,
तुम्हारी किताब के,
हर अक्षर से साक्षत्कार करा देते थे,
तुम्हारे सुर्ख होठ,
अब अपनी रंगत खोने लगे थे,
मैं तुम्हे देखता था कई बार पलट कर,
इस उम्मीद में की,
शायद मन की भाषा को आकार मिले,
और एक बार पूरी हुई,
मेरी मूराद,
जब तुमने अपने हाथों को हिला कर विदा दी मुझे,
मुझे नहीं पता की,
ये मेरी सदियों से अपूर्ण मूराद पूरी हुई थी,
या वक्त ने तुम्हारी हाथों का सहारा लेकर,
विदा कर दिया था मुझे,
तुम्हारी जिन्दगी से हमेशा के लिए................मनोरंजन

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