स्मृति शेष-४
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जब बैठती हो विश्रामासन में,
अपने हाथों को जोड़ कर,
अपनी आँखों को बंद कर,
ईश्वर का ध्यान लगाती हो,
तो फैल जाती है एक जादुई,
उर्या की अनन्त रेखाएं तुम्हारे ललाट पर,
और बंध जाता हूँ मैं,
एक सुखद सम्मोहन में,
ऐसा लगता है की,
उर्या के वो अनन्त स्रोत,
मेरे अंदर समाहित होने लगते है,
और जिंदा होने लगते है,
मेरे अंदर के कुछ मरे हुए सूक्ष्म एहसास,
क्या ईश्वर से मेरे बारे में कुछ कहती हो?
पूछा था मैने, कई बार तुमसे,
पर हर बार टाल जाती हो,
उस दिन जब भगवान महादेव के,
नन्दी के कानों में हम दोनों बोल रहे थे अपनी प्रार्थना,
तब भी नहीं बताया था तुमने,
और कहा था की, भगवान से जो माँगते है, बताते नहीं,
असर काम हो जाता है,
पर मैने तुम्हे बता दिया था की,
नन्दी के कानों में मैने क्या मांगा था,
मेरी प्रार्थना का असर तो खत्म होना ही था,
क्योंकि मैने तुम्हे बता दिया था,
पर तुम्हारी प्रार्थना, क्यों पूरी ना हुई?
तुमने तो नियमों का सही तरह से पालन किया था।............मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
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