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Wednesday, June 18, 2014

स्मृति शेष-२
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एक बार गया था मैं,
तुमसे मिलने,तुम्हारे घर पर,
थोड़ी औपचारिकताओं के बाद,
माँ ने इशारा कर दिया था,
तुम्हारे कमरे की तरफ,
देखा तुम असीम सुकून की नींद सो रही हो वहाँ,
तुम्हारे चेहरे पर ठहरी हुई,
शांती और स्निग्धता को देख ऐसा लगा,
जैसे हरी दूब के उपर एक ओश की बूंद टंगी है,
और जरा सी हरकत से बिखर जायेंगे,
तुम्हारा दुपट्टा, जो तुमने ओढ़ रखा था,
पंखे की हवा से फिसल कर कमर तक आ गया था,
मेरा मन हुआ की,
एक बार तुम्हारी बांहों को छूकर,
तुम्हे जगाऊँ,
फिर देखा अपनी अंगुलियों को,
मुझे लगा, कपास के फूलों सा तुम्हारा बदन,
मेरी अंगुलियों के स्पर्श से मलिन हो जायेंगे,
और मैं उल्टे पाँव, वापस हो गया।............................................मनोरंजन


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