Followers

Thursday, June 19, 2014

तेज़ रफ़्तार वक्त
===========
बच्चे, कितने तेज़ी से बड़े हो रहे है,
वक्त इतने रफ़्तार से भाग रहा है की,
पिछड़ते जा रहे है,
हम जैसे कुछ, अतीत के अंधेरे में कैद साये,
कितनी तेज़ी से बदल रहे है,
मान्यताएं, वसूल और पारम्परायें,
कितनी तेज़ी से बदल जाते है,
मन के गहरे भीतर,
बड़े जतन से संजोयें भावनायें,
कितनी तेज़ी से बदल जाते है वो लोग,
जो, जीवनपर्यन आभिजात से लगते थे,
कितने तेज़ी से बदल रही है,
मेरे घर में रखी चीज़े,
सब कुछ बदल डालने की,
जैसे होड लगी है,
आँखों से ओझल होते जा रही है,
वो सारी अमानतें,
जो हमारे पुरुखों ने,
संजोए रखा था, ना जाने कितने सदियों से,
कब मेरे आँगन में, बन गए कई दरवाजे,
कैसे टुकडों में बट कर गली रह गई वो आँगन,
जीस आँगन में बिल्कुल तिरछा होकर,
लेट जाया करता था मैं,
लोग अब भी बैठते है,
गलीनुमा आँगन में, अपनी-अपनी तरफ सोफे डाले,
पर अब मैं कहाँ बैठूं?
कल बिटीया कह रही थी की,
पापा ने अगर अपने बच्चों के बारे में सोचा होता तो,
आज ये दिन ना दिखने पड़ते,
अब मैं कैसे समझाऊँ अपनी बिटीया को,
की मैने हमेशा अपने बच्चों के बारे में ही सोचा है,
पर बच्चे, इतनी जल्दी बड़े हो जायेंगे,

मुझे इसका एहसास नहीं था।................................मनोरंजन

No comments:

Post a Comment

Write here