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Wednesday, June 25, 2014

भूल जाती हूँ मैं
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अक्सर मेरे शिकायत करने पर बोलती है,
समझो ना तुम, सच बोल रही हूँ,
भूल जाती हूँ मैं................
और मैं तड़प कर मूर्छित सा हो जाता हूँ,
कैसे कोई भूल सकता है, अपने दिल-ए-अज़ीज को?
कैसे भूल सकती है वो कोई बात जो मुझसे जुडी हो?
कैसे भूल सकती है वो उसे,
कहती है,अपना सबसे अच्छा दोस्त जीसे,
साझा करती है, हर छोटी-बड़ी बातें जिससे.
पर पहनता हूँ जब, उसका आवरण,
बन जाता हूँ, एक लड़की,
एक लड़की,
जो महानगर की भीड़ में,
खुद को बचाए रखने को कर रही है ज़दोजहद,
जो अपना पाँव जमाए रखने को कर रही है नित संघर्ष,
ताकी जी सके अपने सपने को, 
पूरा कर सके अपने अरमान,
कर सके कुछ सार्थक, बना सके अपनी पहचान,
और इसके लिए, मिलती है रोज अनेको लोगों से,
जैसे मिलती है मुझसे,
सब उससे वैसे ही करते है बातें,
जैसे करता हूँ मैं, उससे,
वो सबको बताती है अपना सबसा अच्छा दोस्त,
दे देती है अपना हाथ, सबके हाथ में,
और सब पकड़ते भी है, उसके हाथ को,
पर किसी एकांत जगह को ले जाने के लिए,
कोई नहीं पकड़ता उसका हाथ,
जीवन भर निभाने के लिए,
और सालों से चलता रहा है ऐसा ही,
अब उसे आदत हो गई है,
और सबके चेहरे, उसे एक से ही दिखते है,
सबकी बातें एक सी ही लगती है,
तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है,
की मुझे,और मेरी कही बातों को भूल जाती है।.........मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/

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