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Sunday, June 22, 2014

चुल्हे की आग
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चुल्हे पर रोटी सेंकती मां,
आँच को कभी कम, कभी तेज़ कर देती है,
मां जानती है,
चुल्हे के आग को किस तरह,
सकारात्मक परिणाम के लिये नियंत्रित करना है,
पर बाबा नहीं जानते,
और समझाने पर समझते भी नहीं,
चुल्हे की आग, बाबा के चेहरे पर,
हर वक़्त दहकते रहती है,
और उनके परिधि में आने वाले लोगों की,
कोमल भावनायें, उस आग में झुलसते रहती है!..

और झुलसते रहे है,
वो सारे सुक्ष्म एहसास,
जो एक पिता को पुत्र से,
और एक भाई को भाई से,
नैसर्गिक तौर पर जोडे रखता है,
और मरने लगे है वो सारे एहसास,
जिसके लिये एक बहन,
बड़े उत्साह और श्रद्धासे बांधती है,
अपने भाई के हाथ पर राखी,
बाबा बुरे नहीं है,
परिवार के लिये ही जीते है,
पर जड़ता और अति-मोह ने उन्हे,
उन्मंद  और सद्-क्रोधी बना दिया है,
उनके इस चरित्र की दंश,
सबके अंदर इसतरह पैवस्त हो गया है,
की हर कोई घर में अब जलने लगा है
उसी चूल्हे की आग में,
जिस पर रोटियाँ सेंक कर,
माँ ने बडी चाव से किया था,
अपने परिवार का पालन-पोसन,
बनाया था एक छोटा सा घरौंदा अपना,
पर मुझे डर है,
बाबा के चेहरे पर दहकती वह आग,
कहीं घरौंदे को ना छू ले।
.........मनोरंजन

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