राहवर
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अंधेरे में साथ छोड देता है
अपना साया भी,
पर कैसे तुम्हे समझ लेता अपना साया,
तुम तो समाहित थे मुझमें,
इसतरह की अपना साया भी गैर सा लगता था,
यकीन तो मुझे भी नहीं आता की,
जी रहा हूँ मैं,
ये अलग बात है की,
कभी धड़कने सच में रुक सी जाती थी,
तुम्हारे बिना जीने के एहसास से,
मगर मैं जी रहा हूँ, आज भी,
मगर तुम जानते हो, असान नहीं ये जीना,
क्योंकि कुछ रहें तब भी मुश्किल थी,
और अब भी है तुम बिन,
की अकेले चलने की आदत ही ना डाली मैने,
क्योंकि मुझे लगता था,
ताउम्र बने रहोगे मेरे राहवर तुम...........................मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
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