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Tuesday, August 26, 2014

जनता हूँ मैं,
की तुम बहुत अच्छे हो,
पर बुरा मैं भी नहीं,
ये तो व़क्त का तकाज़ा है,
जो हम साथ नहीं है,
व़क्त बदलता है तो,
हालात भी बदलते है,
और व़क्त बहुत तेज़ी से बदल रहा है,
अभी कुछ समय पहले तक,
हमें जो कुछ बेहद पसंद था,
अब हमें अर्थहीन सा लगता है,
कभी लगता था की,
हमारी दोस्ती इतनी गहरी है की,
इसे निभाने के लिये एक उम्र कम पड़ेगी,
पर कुछ अर्से में ही थक गये वो एहसास,
कसूर तुम्हारा नहीं,
और गुनाहगार मैं भी नहीं,
ये व़क्त ने दिये है जख़्म,
व़क्त ही भरेगा।.......................मनोरंजन

Monday, August 25, 2014

उसे लगता है की,
जिंदगी उसे खुद-ब-खुद,
वो सब दे देगी, जिसका वो पात्र है,
मगर जनता नहीं की,
ये दुनिया एक बाज़ार है,
जहाँ खुद अपनी कीमत लगानी होती है,
अगर बेचना ना आए तो,
बेमोल बिक जाता है आदमी,
और अगर ख़ुद को बेचने का गुर सिख लिया तो,
बेसकीमती, अनमोल बन जाता है आदमी....................मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
कुछ नज़्म आपके नज़र
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कसम खाते थे कल तक जिसकी वफ़ाओं का,
सुना है आज वो शख़्स बेवफा हो गया।
कल तक जिसके जुल्मों-सितम से सफ़ेद हो रहे थे लोग,
दौलत के दम पर आज वो, उनका रहनुमा हो गया।
जिसके हाथों के हूनर से मुस्कुराती थी धरा,
शहर में आकर वो मेहनतकश बेचारा हो गया।
नादानियाँ मैने नहीं की, मेरा तो राहवार था वह,
दौलत के चकाचौंध से वो मेरा रक़ीब बन गया।.................मनोरंजन
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Saturday, August 23, 2014

शायद अब........
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शायद अब दिल में रही नहीं तमन्ना,
किसी की प्यार पाने की,
किसी की झील जैसी आँखों में डूब जाने की,
किसी के ख्वाब का हिस्सा बनूँ,
बनूँ किसी का रफ़्ते-ए-ज़ीगर,
अब ललक ना रही किसी तारीफ भरे नजरानें की,
कुरुप हो गये है मेरे चाहत के रंग-ढंग,
विरूपित सी हो गयी है सूक्ष्म भावनाएँ,
कुविचार भर गया है मन में इस कदर की,
जुबां से निकले शब्दों से बू आ जाती है,
उमंग ना रही अब मधुर शब्दों से किसी को फांसने की,
और ना जुस्तजू बची,
किसी के मधुर शब्दों के जादू में बंध जाने की,
यकीन और भरोसा कभी तकियाकलाम हुआ करते थे,
पर अब कोशिशें खत्म हो गई, और चाहत भी,
किसी का यकीन और भरोसे को जीत पाने की,
मज़ा नहीं आता हर वक्त फूलों को महकने की,
इसलिये नये स्वाद और मिज़ाज के लिये,
काँटों से खेलता हूँ, पत्थर से लड़ता हूँ,
दर्द, तकलीफ़, गम और उदासी,
ये सब भी तो अच्छे है,
इच्छा नहीं होती हर वक्त,
बेशर्मी से मुस्कुराने की।..................................मनोरंजन 
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एक छोटी सी बात 
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मन, कर्म, वचन,
सोच,विचार और व्यवहार,
सिर्फ इतनी सी बातें है,
जिसके वजह से,
हम जीवन में सब कुछ पाते है
और,
इसी के वजह से सब कुछ खो देते है।
जीवन में सफल और असफल,
होने के कई कारण हो सकते है,
मगर जो चीज़ हमारे बस में है,
हम क्यों उसे विकृत करते है,
जबकि ये शाश्वत सत्य है की,
जो कुछ आदमी कहता है,
करता है, सोचता है और महसूस करता है,
उसका जीवन उसी के अनुरूप आकार लेता है।
मन का खोखलापन,
जुबां से निकले शब्दों में झलक जाता है,
कोई चाहे कितना ही अच्छा अभिनय करले,
कितना ही नाटक कर लोगों को झांसे में रख ले,
मगर इंसान के अंदर के भाव,
काफी हद तक चेहरे पर अंकित होते जाता है।.................................मनोरंजन
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Thursday, August 21, 2014

शिकवा
====
जीना तो पड़ेगा ही,
यों जिंदगी को जया ना कर सकेंगें,
हाँ अब दर्द-ए-दिल,
किसी से बंया ना कर सकेंगे,
और अब वक्त ही कहाँ होगा इतना,
चोट लगते रहेंगे,
जख़्म बनाते रहेंगे,
पर किसी से शिकवा ना कर सकेंगे।
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एक शब्द
 ====== 
सोच रहा हूँ,
 वो लब्ज़ जो तुम्हे लिखना है,
 वो जादू की पुड़िया में लिपटे कुछ शब्द,
 जो तुम्हारे मन से भुला दे,
 वो सारी कड़वी यादें,
 जो तुम अपने जीवन के सफर में,
 समेटती रही अपने आँचल में,
 खोंईछे की तरह,
 क्या ऐसा कोई शब्द हो सकता है,
 जो किसी के मन के गहराइयों में उतर कर,
 बीती हुई कड़वी यादों को विस्मृत कर दे, 
मुझे लगता है, कोई शब्द तो ऐसा है जरूर, 
तभी तो कितने ही सारे लोग, जो पहले मुस्कुराते नहीं थे,
 मुस्कुराने लगते है, एक अर्से के बाद,
 कोई वो शब्द कह देता है उनके कानों में,
 फिर सारी कड़वी यादें विस्मृत हो जाती है।..................मनोरंजन
 यकीन
=====
मुझसे शिकायत,
सिर्फ तुम्हे ही नहीं है,
मेरी जिंदगी से जुड़ा हर शय,
मुझसे शिकायत करता है,
कसूर किसी का नहीं है शायद,
ये वक्त का तकाज़ा है,
मैं रफ़्ता-रफ़्ता बनता गया,
गुनाह गार सभी का,
जिनकी खुशियों की वजह कभी,
मैं ही हुआ करता था,
उनके आँसूओं की वजह भी,
मैं ही बना।
कोई तो है जिसने,
निचोड़ लिया मेरे मन की खुशी,
जिसके आने पर सांसों में,
भर जाती थी जिंदगी,
और जाते हुए ऐसे लगता था,
जैसे प्राण खिंचे लिये जा रहा है कोई,
ऐसा नहीं की मैने कभी बताया नहीं उसे,
उसने सुना भी गौर से पर,
उसे यकीन ना हुआ,
एक शख़्स जिसे यकीन हो जाता है,
अक्सर लोगों के झूठ पर भी,
उसे मेरे सच पर यकीन ना हुआ,
तो कसूर किसका है?....................मनोरंजन
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Wednesday, August 20, 2014

माँ नहीं थकती कभी
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माँ नहीं थकती कभी,
सुबह सोकर उठने के बाद से,
रात में सबको खिला-पीला कर सुला लेने के बाद,
चंद घंटों की नीम बेहोशी की सी नींद में सोने तक,
माँ कराहती भी नहीं,
तब तक जब तक की शरीर,
बिल्कुल ही साथ देना बंद कर दे,
क्योंकि माँ को किसी से दाज नहीं,
डाह नहीं किसी से,
उसे इस बात की परवाह नहीं की,
सारे काम वो खुद करेगी,
या कोई उसका हाथ बटायेगा,
सब उसके ही तो है,
उसके लिये कोई अपना और कोई पराया नहीं,
माँ नहीं सोचती,
हमारी पत्नियों की तरह,
इसिलिये माँ थकती नहीं,
और माँ कराहती भी नहीं।..............................मनोरंजन
manoranjan234.blogspot.in


खामोशियों को कहने दो
=============
आँसू तो अब भी आते है,
मगर इसे तुम्हे दिखाने का हक खो दिया है मैने,
जीस ख़जाने को पाने को बेक़रार था इतना,
तुम बिन सिर्फ पत्थर के ढ़ेर बन गया है ये,
तुम्हारे अक्स को ढून्ढता रहता हूँ हर वक्त,
इस पत्थर के दरारों में,
जीस अक्स के अस्तित्व को ही नकार दिया था मैने,
खता किसकी थी?
या तो तुम ही मेरे साथ होकर साथ नहीं थी,
या मैं ही अपने अस्तित्व का,
एहसास करा सका ना तुम्हे,
बहुत कह चुका हूँ मैं,
और बहुत सुन चुके हो तुम,
अब रहने दो अनकहा, जो रह गया है बाकी,
हमारे खामोशियों में दफ़न होकर,
अब बजने दो खामोशियों को ही,
कुछ भी नहीं बदला है,
तब में और अब में,
बस पहले ज़ुबां थकते नहीं थे,
अब वक्त थक जाता है,
ज़ुबां पर सब रिक्त है।......................मनोरंजन
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Monday, August 18, 2014

हे माधव
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मुक्त गगन की चाह ने, बदली जीवन की धारा,
कभी चैन से सोया नहीं, कभी जीता, कभी हारा।
पाया भी बहुत और खोया भी, हँसा कभी, कभी रोया,
तुमको ही साथ पाया हे माधव, जब नहीं रहा कोई सहारा।।..............मनोरंजन
काश
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लगता है साम ढलने लगी है,
अंदर एक गहन अंधेरा पसरने लगा है,
फिर टूटे हुए ख्वाबों को संजोने की कोशिश करूंगा,
और सुबह तक फिर ये ख्वाब बिखर जायेंगे,
ख़ौफ होने लगी है उजालों से,
सूर्य की किरनें, आँखों में चुभने लगी है,
कदम उठाने से पहले ही ठिठक जाता हूँ,
निराशा का आलम यह है की,
सिर्फ "काश" बन कर रह जाती है,
दिल की हर तमन्नाएं,
एक बहुत जानी-पहचानी सी आवाज़,
पीछे से पुकारती है मुझे,
और कहती है,
बहुत जा चुके हो दूर,
अब वापस आ जाओ,
मगर मैं, उस अवाज़ को अनसुना कर,
नए ख़्वाब बुनने में लग जाता हूँ.....................मनोरंजन
मेरे बच्चे तुम कुछ ऐसा बनना
================
अगर कुछ बनना ही चाहते है तो,
नेक बनिये, अजीज-ए-दिल हरेक बनिये,
नेक होना, दब्बू, कायर और डरपोक होना नहीं होता,
दिल में स्वभिमान, आत्मसम्मान की ज्योती जलाये रखिये।

मधुर बनिये, दिल से मज़बूत बनिये,
मज़बूत बनने के लिए,
किसी को डराने, धमकाने या तडपाने की जरूरत नहीं,
मज़बूत तो वह है,
जो जरूरतमंदों का सहारा होता है,
किसी डुबते हुए का किनारा होता है।

सरल, सुशील और शलीन बनिये,
शालिनता के किस्से नहीं बनते,
समाचार पत्रों के हेडलाइन्स नहीं बनते,
शालिनता तो वह है,
जो किसी अशांत मन में उतर कर शीतलता प्रदान कर्ता है।

बहादुर बनिये, बेफिक्र बनिये,
बेफिक्र होना, बेपरवाह और बदतमीज़ होना नहीं होता,
बेफिक्र तो वह है जो,
अपनी जिम्मेवारियों और कर्तव्यों को पूरा कर,
सुकुन की निंद लेता है।

अनुशासित और अज्ञाकारी बनिये,
अनुशासित होकर किसी भी तरह,
आपके स्वतंत्रता, स्वच्छंदता का हनन नहीं होता,
बल्कि जीवन रूपी पौधा अनुशासित होकर,
नित नई उंचाइयों को छूता है,
और मधुर फलदायी होता है।

सकारात्मक, सुलझे और समझदार बनिये,
समझदार होना, चलाक होना नहीं होता,
किसी को ठगने, धोखा देने,
और किसी की कमजोरियों का,
फायदा उठाने वाला समझदार नहीं होता,
बल्कि समझदार तो वह है जो,
किसी की उलझी हुई जिन्दगी को सुलझा दे,
किसी के जीवन से दर्द, गम और निराशा को मिटा कर,
उसके जीवन में आनंद और हर्षोउल्लास की ज्योती जला दे।

दयालु, दानशील और दिलेर बनिये,
दिलेरी, बेफजूल के शर्तों,
और आन-बान-शान की खातीर,
अपने जीवन को खतरे में डालने में नहीं है,
बल्कि, किसी के होठों पर मुस्कुराहट और 
जीवन में खुशी लाने के लिए,
अपने आप को पुरी निष्ठा, इमानदारी और निस्वार्थ भाव से,
समर्पित कर देने में है।
क्योंकी,
पुरी निष्ठा, इमानदारी और निस्वार्थ भाव से,
किसी को कुछ देकर,
जो खुशी और आनंद मिलता है,
वह किसी भी तरह,
दौलत, शोहरत और कामयाबी को पाकर नहीं मिलता।.............मनोरंजन 
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Wednesday, August 13, 2014

झूठा सच
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उनके व्यक्तित्व का जादू कुछ ऐसा है,
की उनका हर झूठ, सच सा लगता है,
और मेरा हर सच भी झूठ बन जाता है।
फक्र उन्हे भी हो खुद पर, इसके लिए,
ना जाने कितनी बार तोड़ा है खुद को मैने,
उनकी मुस्कुराहटें सजी रहे, उन्हे होठों पर,
ना जाने कितने आँसू मैने बहाए इसके लिए,
वो सच कहते है की, मैने उन्हे कुछ ना दिया,
तभी ना बचा कुछ भी मेरा, उनके पास,
जबकि उनके दिये दर्द को, संजोये है मैने,
अपने जीवन की सबसे मूल्यवान निधि की तरह,
गुनगुनाता हूँ उनकी यादों को,
अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि की तरह।.......................मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/

Saturday, August 9, 2014

पता नहीं क्यों?
==========
पता नहीं क्यों,
मगर जब भी, मेरे जीवन के,
भुली हुई स्मृतियों में से,
कोई बहुत ही सुन्दर सी, रोचक और प्यारी सी,
बात मेरे जेहन में आ जाती है,
तो उसे तुम्हे बताने की उत्कट अभिलाषा होती है,
जिसे सुन कर तुम्हारे होठों पर,
बिल्कुल बच्चों सी,
निश्छल, निर्मल मुस्कुराहट कौंध जाए,
मैं सोचता हूँ रात-रात भर,
ढुंढ़ता हूँ वो किस्से,
जिसे सुना कर तुम्हारे होठों पर,
उस उन्मुक्त मुस्कुराहट हो देख सकूँ,
जिसे देखने के लिए तरसता रहा हूँ हर पल।
पता नहीं क्यों,
मगर जब भी मेरे जीवन की,
गहरे दुख, पिडा, उदासी और निराशा
भरे लम्हे, मुझे असीम दर्द,
के गहराइयों में दुबोने लगते है,
तो वो बात तुम्हे बताने की,
बेचैनी सी हो जाती है,
पता नहीं क्यों मगर,
तुम्हारे आँखों में,
अपने लिए दर्द, सहानुभूति और फिक्र,
देखने की ललक सी लगी रहती है मन में।
पता नहीं क्यों मगर,
हजार परेशानियों के बीच भी,
तुम्हारे लिए परेशान होने को,
कुछ रह जाता है मन में,
और जब तक रात ढलने तक,
तुमसे बात ना कर लूँ,
हर पल लगता है,
कहीं परेशान होगी तुम,
कुछ बुरे से ख्वाब भी आते है,
की कहीं अकेले में बैठी रो रही हो तुम,
पता नहीं क्यों मगर,
ये सोच कर मन इतना व्यग्र हो जाता है की,
भूल जाता हूँ वो सब कुछ,
जो गुस्से में मैने कहा था,
तुमने कहा था,
भूल जाता हूँ वो सारे प्रण,
जो तुमसे बात ना करने के बरे में होता,
भूल जाता हूँ वो सारे वादे,
जो खुद से, और तुमसे किए होते है,
तुम्हे और ज्यादे परेशान ना करने के बारे में। 
पता नहीं क्यों मगर,
जिन्दगी चल तो रही है बदस्तूर,
मगर जीने का एहसास नहीं होता तुम बिन।..........................मनोरंजन
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तुम्हे जीत प्यारी है,
मुझे जीतने का जज़्बा,
तुम्हे मंजिल की चाह है,
और मुझे पसंद है रास्ता..
अधुरा सच
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उसे इस बात की तकलीफ थी की,
मैं, उससे अपना दिया हुआ माँग रहा था,
दोस्ती में ये जायज नहीं था,
बाकी दोस्ती के खातीर, 
वो अपना जान भी देने का दम भरता था,
उसे पता था, मुझे नहीं पड़ेगी उसकी जान की जरूरत,
कुछ और मंगता तो उसे लगता था,
मैं अपना दिया हुआ वसूल करना चाह रहा हूँ,
सच को देखना, सुनना, समझना ही नहीं चाहता था,
मेरा सच और मेरी दोस्ती,
दोनों दो विपरित धाराओं में बह रहे थे,
जीतना प्यार मुझे अपनी दोस्ती से थी,
मुझे अपना सच भी उतना ही प्यारा था,
पर दुर्भाग्य मेरा, किसी एक को ही चुनना था,
बहना था किसी एक के साथ ही मुझे,
मैने सच को चुना,
और तडपता रहा हूँ दोस्त के लिए हर पल।.....................मनोरंजन
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Wednesday, August 6, 2014

सुनहरा बचपन
==========
कहाँ से लाकर  दूँ अपनी लाडो को,
खूबसूरत, सुनहरा तुम्हारा बचपन,
कंक्रिटो के इस जंगल में,
आँगन कहाँ से लाउं,
इस दो कमरों की दिवारों में,
कहाँ दूँ तुम्हे अजादी की,
दौड सको चौपाया बन कर।
जब भी दौडती हो,
टकरा जाती हो,
बेफजुल से पड़े,
दुनिया भर के ठून्से पड़े समानों से,
कहाँ से लाकर दूँ,
दादी माँ का वो दुलार,
चुटकियों की वो अवाज और टीटकारी,
बाबा के दाढ़ी के बालों को,
छुने का मन तो तुम्हे भी करता होगा,
कंधे पर बैठ कर चौपाल पर,
जाने को तुम्हारा भी मन करता होगा,
कहाँ से लाउं वो चौपाल,
दुकानों से भरे इस शहर में।
कहाँ घुमाने लेकर जाऊ,
कहाँ दिखाऊ मेला तुमको,
किसके साथ खेलोगी बेटा,
आँख मिचौली, टिकम-टेका,
बच्चे सब तो कैद पड़े है,
शराफत के दिवारों में,
विज्ञापन की होड लगी है,
दिल से लेकर दिमाग तक को,
सुन्दर और तेजस्वी बनाने की,
दवा बिक राही है बजरों में,
तुम भी सिख जाओगी जीना,
सीमटी हुई दिवारों में, 
सीमट गया है जहाँ तुम्हारे लिए,
सीमट गया है,
तुम्हारा बचपन।
कहाँ से लाकर दूँ लाडो को,
खूबसूरत, सुनहरा तुम्हारा बचपन।...................................मनोरंजन
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अब नहीं होता कुछ पहले जैसा
====================

बातें तो वो अब भी,
कर लेती है मुझसे,
बल्की पहले से ज्यादा सलिनता से,
तमीज़ से, और समझदारी से,
पता नहीं इतनी तमीज़ कहाँ से सीख ली उसने,
कुछ तो टूटा है उसके अंदर,
अब उसे मेरे फोन का इंतजार नहीं रहता,
अब नहीं करती शिकायत,
मेरे कई दिन बाद फोन करने पर भी,
अब नहीं कहती,
सारी दुनिया के लिये तो तुम्हारे पास समय है,
एक मुझे छोड कर,
अब नहीं देखती आँखों को तिरछा करके,
और आँखों से नहीं बहने देती अब एक बूंद भी पानी,
जो पहले हर बात में,
उसके गलों पे लुडक आते थे ना जाने कहाँ से,
अब सह जाती है,
सबकुछ चुपचाप,
नहीं होती परेशान कहीं भी जाने में,
जो कल तक कहती थी,
कैसे चली जाऊ अकेली,
चलो मेरे साथ,
अब नहीं जताती,
किसी भी तरह का हक मुझ पर,
गुस्सा आती थी जीस बात पर हरदम,
और अब गुस्सा नहीं आती,
उसके किसी  भी बात पर,
बस मन तडपता है उसकी नजरों में,
इतना महत्वीन हो जाने के एहसास से।....................मनोरंजन
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Monday, August 4, 2014

अए मुस्कुराहट
==========
अए मुस्कुराहट,
तुम फिर लौट कर आना,
मेरी बिखरी हुई जिन्दगी के,
एक टुकडे को चुमने,
मेरी उखडी हुई संसों को सहलाने के लिए,
जब तुम थी मेरे वजूद में,
तो गुस्सा आती थी तुम्हारी हर आदा पर,
तुम्हारे बिना कोई अस्तित्व ही ना रहा मेरा,
वजूद छोटा पड गया है सिमट कर,
अए मुस्कुराहट,
तुम एक बार जरूर लौट कर आना,
मेरे वजूद को आलिंगन में लेने के लिए,
ये आँखें शून्य आसमान टकटकी लगाये रहती है,
जैसे ढून्ढ रही हो तुम्हे निले आसमान में,
जो कल तक तुम्हारी हर आदा पर तुम्हे चिढाती थी,
वो आज तुम्हारे बिना सुना होकर पथरा सी गई है,
अए मुस्कुराहट,
तुम एक बार लौट कर आना,
इन आँखों को एक बार चुने के लिए,
तू थी मेरे अस्तित्व में तो,
हर अंग-अंग में थिरकन थी,
ख्वाब भी कितने हसीन और सुहानी आती थी,
तुम्हारे अनुपस्थिति में बागी हो गए है हर अंग,
सपनें भी कितना निर्मम और विरूपित हो गए है,
अए मुस्कुराहट,
तुम एक बार जरूर आना,
मेरे हर अंग-अंग को पुलकित करने,
अए मुस्कुराहट,
तुम एक बार लौट कर आना,
मेरी बिखरी हुई जिन्दगी के एक टुकडे को चुमने।..............................मनोरंजन
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दोस्त
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पता नहीं,
आपको यकीन हो की नहीं,
पर कुछ दोस्त सचमुच,
जीवन की सबसे बड़ी ताकत होते है,
जीवन में खुशियाँ उससे होती है,
या हर खुशी में वो समिल होता है,
वो जब जीवन में होता है तो,
जीवन में उमंग, उत्साह, कुछ करने का ज़ज्बा,
और हिम्मत रहती है,
और वो ना हो तो सब खत्म सा हो जाता है,
जीवन में निराशा और उदासी के,
बदल छा जाते है,
मन हर वक्त उसे ढून्ढता है, 
खुशी में भी और गम में भी,
दुख में भी और सुख में भी,
निराशा में भी और उदासी में भी,
और गर उससे सम्पर्क करना सम्भव ना हो,
तो फिर जीवन मशिनों की तरह खट-पट करते चलता तो है,
पर जीवन का एहसास खत्म हो जाता है।......................................मनोरंजन
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वो और हम मिले एक इतेफ़ाक से,
वो हमें देख मुस्कुरा दिये,
हम उन्हे देख मुस्कुरा दिये,
जुबां से कोई शब्द ना निकली,
और हम धीरे से मुस्कुरा दिये।..........मनोरंजन

शहद के टब
========
बाबा अक्सर कहते है,
गरीब आदमी जीवन भर,
दाल-रोटी के लिये,
संघर्ष करते रह जाता है,
और जीवन में कुछ खास करने को,
फुर्सत ही नहीं मिल पाती,
बाबा ने, मुझे इस दाल- रोटी के चक्कर से,
बचाने के लिये ही शहर भेजा था,
बाबा का सोचना कितना सही है,
कहना मुश्किल है,
मगर सच तो ये है की,
मैं कभी भी दाल-रोटी, नमक, तेल और हल्दी,
के चक्कर से मुक्त नहीं हो पाया,
मैं हर वक्त इससे बाहर निकलने के के लिये,
शहद के टब में गिरी मक्खी की तरह,
तडपते रहा,
मैं अपने कोशिशों में शायद,
अपने पंख गंवा कर भी सफल ना हो पाया,
आज भी मैं तडप रहा हूँ, 
इस शहद के टब से बाहर निकलने के लिये,
इसके बवजूद की,
मैंने खुद अपनी मार्जी से,
अपनी खुशी से इसमें डुबकी लगाया था।.........................मनोरंजन
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Saturday, August 2, 2014

रिश्ते बेमतलब ही हो तो बेहतर,
जब हम रिश्तों में मतलब ढूंढने लगते है,

तो हम रिश्ते की आत्मा को मर डालते है।
रात
===
रात भी चीज़ है अजीब,
सुनो इसकी दास्तां।
कहीं पर फूल खिलते है,
कहीं पर जलती है आग,
कहीं, एक खुश्बू का झोका,
कुरेद जाता है पुराना याद,
रात भी चीज़ है अजीब,
सुनो इसकी दास्तां।
कोई ख्वाब देख रहा होता है,
किसी के सामने होता है चांद,
किसी के देखे हुए ख्वाब का,
जल रहा होता है अरमान,
रात भी चीज़ है अजीब,
सुनो इसकी दास्तां।
कहीं एक सरसराहट,
सोख लेती है जिस्म से जान,
कहीं चूडियों की खनखनाहट,
से टूटता है ध्यान,
रात भी चीज़ है अजीब,
सुनो इसकी दास्तां।
कहीं किसी की महफिलें,
बढ़ती है शराफत की शान,
कहीं किसी की रातें,
कटती है, देख कर आसमान,
रात भी चीज़ है अजीब,
सुनो इसकी दास्तां।................मनोरंजन

कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलती
===================
एक लम्बे अर्से के बाद,
उस मित्र का फोन आया,
जो दिल के बहुत करीब था,
मगर जीवन के भेड़चाल में,
कहीं विस्मृत सा हो गया था,
ढूंढा होगा कहीं से मेरा नम्बर,
लिया होगा किसी परिचित से,
ये इस बात को पुख्ता करती है,
की हमारे दरमियां बहुत कुछ,
घटित होने के बावज़ूद भी,
बचा रह गया था मैं उसके अंदर,
उसकी अवाज सुन कर,
मन  में एक खूबसूरत संगीत,
की धून बजने लगी,
अनायास मेरे कानों के आस-पास,
वीणा सी झंकृत होने लगी,
ऐसा लगा जैसे हजार सूर्य,
प्रदीप्त हो गये हो,
मेरे जीवन के हर कोने में,
कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलती,
मन के सच्चे भाव और
उसे ज़ाहिर करने का अंदाज,
सच्ची मोहब्बत और उसका स्वरूप,
प्रेम में बहे आँसू की बूंदें,
और होठों की निच्‍छल मुस्कुराहट,
आज सालों बाद भी हम,
उसी तरह बात कर रहे थे,
जैसे सालों पहले किया करते थे,
ऐसा लग रहा था,
इस दौरान जीवन में कुछ बदला ही नहीं,
कुछ लोग और उनके साथ जुड़ी,
हमारे दिल की भावनाएं कभी नहीं बदलती।......मनोरंजन
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Friday, August 1, 2014

सूख ना जाये कविताएँ
==============
तेज धूप और पसीने से,
मुरझा जाती है कविताएँ,
इसलिये जगता हूँ,
रात के तीसरे पहर तक,
रात सोई होती है,
अंधेरे के आगोश में,
पशु-पंक्षी सब लौट जाते है,
अपने-अपने घोसलों में,
जब सो चुके होते है सब,
अपने-अपने नीड़ में,
तब मेरा मन अवारगी के,
झोकों से डोलने लगता है,
निकल पड़ता हूँ,
उन सुनसान सड़कों पर,
जहाँ कोई आता-जाता नहीं है,
हवा के झोकें, पेड़ के पत्तों से टकरा कर,
एक संगीत सा कानों में घोल देते है,
मुझे ऐसा महसूस होता है की,
मैं अज़ाद हूँ, हर तरह से,
हर शय से जुदा,
मैं पूर्ण रूप से मैं होता हूँ,
चुनता हूँ वहीं से कुछ शब्द,
और दर्ज कर देता हूँ,
इसे पन्नों पर,
फिर तड़के जग जाना पढ़ता है,
क्योंकि, बचा कर रखना चाहता हूँ,
अपनी कविताओं को तेज धूप और पसीने से,
एक व्यग्रता सी है,
अपनी कविताओं को दर्ज कराने की,
मुझे डर है की,
अगर अभी ना दर्ज कराया,
तो कहीं सूख ना जाये मेरी कविताएं,
जैसे सूख गये मन के सारे एहसास।.......................मनोरंजन
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सदियों से लम्बी उदासी
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खुशी का कोई मंत्र ही ढूंढना पड़ेगा,
बहलाने से तो बहलता नहीं दिल,
फुसलाने पर बिदक जाता है,
अजमाकर देख लिया हर वो सूत्र,
जो बाबा ने बताया था,
खुद को काम में डुबा दिया,
व्यस्त कर लिया अपना दिनचर्चा,
बाबा जी का योगा भी किया,
मगर मेरे धमनियों में,
मेरे लहू के साथ बहती उदासी,
मेरे चेहरे पर, मेरे व्यक्तित्व में,
मेरे चाल म़ें और मेरे अस्तित्व में,
झलकने लगी,
मुझे पता है, इस उदासी को दूर करने का उपाय,
मगर वो उपाय ही कर पता तो,
ये सदियों से लम्बी उदासी क्यों होती?............................मनोरंजन
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