सूख ना जाये कविताएँ
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तेज धूप और पसीने से,
मुरझा जाती है कविताएँ,
इसलिये जगता हूँ,
रात के तीसरे पहर तक,
रात सोई होती है,
अंधेरे के आगोश में,
पशु-पंक्षी सब लौट जाते है,
अपने-अपने घोसलों में,
जब सो चुके होते है सब,
अपने-अपने नीड़ में,
तब मेरा मन अवारगी के,
झोकों से डोलने लगता है,
निकल पड़ता हूँ,
उन सुनसान सड़कों पर,
जहाँ कोई आता-जाता नहीं है,
हवा के झोकें, पेड़ के पत्तों से टकरा कर,
एक संगीत सा कानों में घोल देते है,
मुझे ऐसा महसूस होता है की,
मैं अज़ाद हूँ, हर तरह से,
हर शय से जुदा,
मैं पूर्ण रूप से मैं होता हूँ,
चुनता हूँ वहीं से कुछ शब्द,
और दर्ज कर देता हूँ,
इसे पन्नों पर,
फिर तड़के जग जाना पढ़ता है,
क्योंकि, बचा कर रखना चाहता हूँ,
अपनी कविताओं को तेज धूप और पसीने से,
एक व्यग्रता सी है,
अपनी कविताओं को दर्ज कराने की,
मुझे डर है की,
अगर अभी ना दर्ज कराया,
तो कहीं सूख ना जाये मेरी कविताएं,
जैसे सूख गये मन के सारे एहसास।.......................मनोरंजन
http://manoranjan234.blogspot.in/
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